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ब्रह्मचिन्ता

  ब्रह्मचिन्ता - योग का एक अलभ्य ग्रन्थ ।____________________________________  योग का वह ग्रन्थ, जिसके बारे में केवल पता चलता है पॉल ब्रन्टन की पुस्तक ‛गुप्त भारत के रहस्य' से । बनारस में एक बड़े ज्योतिषी हुए थे सुधी बाबू । ऐसे ज्योतिषी जिनके पास एक आध्यात्मिक शक्ति भी थी, समाधि भी । सुधी बाबू यानि श्री सुधीर रंजन । पॉल ब्रंटन के अनुसार, सुधी बाबू बताते हैं कि ‛ब्रह्मचिन्ता’ का अस्तित्व गुप्त रखा गया । इस ग्रन्थ को तिब्बत में पाया गया था । वहाँ इसे पवित्र समझा गया और इसका अध्ययन केवल उस वक्त केवल गिने चुने लोग ही करते थे ।  ऐसा कहा जाता है कि भृगु महराज ने हजारों वर्ष पूर्व इस महाग्रंथ की रचना की थी । भृगु ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे । ये एक महान ज्योतिषी थे जिन्होंने ‛भृगुसंहिता’ की रचना की जो आज भी उपलब्ध है । तथा इसकी पांडुलिपि नेपाल में उपलब्ध है । इन्हीं भृगु जी के प्रपौत्र भगवान परशुराम थे । इन्हीं भृगु  जी ने ‛ब्रह्मचिन्ता’ की भी रचना की । सुधी बाबू के अनुसार, उनके समय में भी यह योगमार्ग अत्यंत विलक्षण और अलभ्य होने के कारण नवीन भी माना जाता था। ब्रह्मचिन्ता का...

अरे यायावर! रहेगा याद!

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                                                    दिनाँक 07 मार्च 2020 मे रे अतिप्रिय कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‛अज्ञेय’ जी का जन्म आज ही तो हुआ था । ‛एक बूँद सहसा उछली, अरे यायावर रहेगा याद?, शेखर-एक जीवनी जैसी अनेकेन रचनाओं का उद्भव अज्ञेय रूपी हिमालय से ही तो हुआ है । बहुरंगी और अद्भुत व्यक्तित्व-जिसके अंदर एक घुमक्कड़, कवि, दार्शनिक, अपने शब्दों से चित्र बनाने की अद्भुत कला के स्वामी विद्यमान थे, जिनकी रचनाओं में दार्शनिक विचारशीलता, समीक्षा, संस्कृति की छाप को समेटे अभी भी चल रही हैं । अज्ञेय जी की रचना- अरे यायावर! रहेगा याद? केवल यात्रा विवरण नहीं है, वरन वह तो भारत के हर भौगोलिक क्षेत्र का सांस्कृतिक, और दार्शनिक विवेचना है, जिसका हर भारतीय को अध्ययन करना चाहिए । इसीलिए अज्ञेय मुझे प्रिय हैं, क्योंकि उनके माध्यम से आप केवल भौगोलिक यात्रा नहीं करते, बल्कि समूची संस्कृतियों की बहुरंगीयता को जीते हुए चलते हैं, फिर चाहे पूर्वोत्तर भारत का वर्ण...

जब रात्रि बिखेरती है दूब की नोक पर मोती

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ओ स की बूँद मुझे सबसे प्रिय लगती है, दूब की नोक पर । तिस पर मध्य रात्रि में पूर्णिमा की चाँदनी, जिसका प्रकाश ओस की बूँदों पर पड़ते ही प्रकीर्णित होता है, और बिखेर जाता है मोतियों सी चमक । मैंने तो जब घास पर ओस की बूँदों को देखा.., तो अनायास ही कह उठा  ‛मोतियों का गाँव!’ जैसे नैसर्ग ने दूब की नोक पर सजाई हो ओस के दीपों की वर्णमाला । जिसे कोई प्रकृति खोजी, कवि या दार्शनिक ही पढ़ सकता है, और बुन सकता है इस वर्णमाला से अनन्त किताबें । वो किताबें जो अक्षर से विहीन हों, क्योंकि भाषा की सीमा तो इस संसार तक सीमित है । इसके ऊपर की सत्ताओं को ‛अनुभव’ किया जा सकता है मात्र । ये दीपक प्रकृति का सौंदर्य है,श्रृंगार है धरित्री का । जिसे मात्र अपने अन्वेषियों के लिए ही सजाती हैं वसुंधरा । जैसे ललनाएँ सजती हैं, अपने सौंदर्य के अन्वेषी के लिए, अपने प्रियतम के लिए, या जैसे मूर्तियाँ अपने शिल्पकार के लिए, जो उकेरता है उनका सौंदर्य । कोई छैनी से, तो कोई शब्दों से । इसी में इनकी विराटता है, इसी में इनकी श्रेष्ठता है, इसी में इनका सौंदर्य है । -- विनय एस तिवारी

स्नेह और वैराग्य की सीमा रेखा उतनी ही पतली है जितनी आकर्षण और प्रेम की या जितनी क्रूरता और यातना की

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                            [ तस्वीर : नृत्य में मग्न बौद्ध भिक्षु ]              " स् नेह और वैराग्य की सीमा रेखा उतनी ही पतली है जितनी आकर्षण और प्रेम की या जितनी क्रूरता और यातना की ।" ...क्योंकि स्नेह से तटस्थ (ऑब्जेक्टिव) हो जाना ही तो वैराग्य है । स्नेह तो वासना से लगभग मुक्त होता है लेकिन फिर भी मोह व्याप्त तो रहता ही है और जब मोह भी विदा हो जाता है तब वैराग्य का जन्म होता है ।  वैराग्य संसार से भागना कदाचित भी नहीं है, जैसा कि कृष्ण कहते हैं, आचार्य रजनीश कहते हैं, बुद्ध कहते हैं । वैराग्य तो कर्म के लिए कर्म करना है, कर्ता भाव से मुक्त होना है । जैसे भक्ति और प्रपत्ति में, भक्ति में भक्त समर्पित रहता है किंतु उसमें परमात्मा से एक आनंद की चाह बनी रहती है किंतु वह चाह समाप्त हो जाती है तब वो अवस्था कहलाती है प्रपत्ति । ठीक ऐसे प्रेम और स्नेह में,  प्रेम वासनाओं के व्याप्ति की अवस्था है किंतु स्नेह, जब प्रेम में वासनाएँ क्षीण हो जाएं । और जब वासनाएँ शून्य हो...

माँ गङ्गा, प्रोज्जवल चाँदनी और अज्ञेय की पुस्तक

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प्रयागराज में मेरे द्वारा खींची तस्वीर में माँ गङ्गा, चाँद और चाँदनी आह! सौंदर्य...। बाहर खुली चाँदनी छिटकी थी, इतनी प्रोज्जवल कि निरभ्र आकाश में भी तारा एक-आध ही दिखता था । झील चमक रही थी । रंगों का वह खेल- केवल एक रंग, श्वेत का खेल- बल्कि केवल मात्र आकाश का और उसी की अनुपस्थिति का वह खेल देखकर शेखर स्तब्ध रह गया । झिलमिलाती हुई झील पर धुँधले श्यामल पहाड़, और दूर पर कोहरे सी मधुर स्निग्ध ज्योतिर्मयी हिम-श्रेणी.. उस विस्तीर्ण, अत्यंत निस्तब्ध रात में इस दृश्य को देखते हुए बोध की लहरें-सी उसके शरीर में दौड़ने लगीं; मानो वह इस जीवन के स्वप्न से उद्बुद्ध होकर, किसी ऊँची यथार्थता के लोक में चला जा रहा है.. उसे रोमांच हो आया । उसने आँखें मूँद लीं, मानो आंखें मूँद कर ही वह इस दृश्य को बनाए रख सकता है, खुली आँखों के आगे वह छिन्न हो जाएगा..। #शेखर_एक_जीवनी, भाग दो । - अज्ञेय

फाफामऊ- दो संस्कृतियों का मिश्रण

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तस्वीर: फाफामऊ पुल से माँ गङ्गा और उनसे विदा लेता सूर्य फा फामऊ, एक मध्यवर्ती कस्बा है । मध्यवर्ती, ग्रामीण और शहरी संस्कृति का । ग्रामीण संस्कृति जहाँ लोग ज्यादा प्राकृतिक रवैये को अपनाते हैं, वहीं, शहरी बनावटी नयनाभिराम जीवन । दोनों में ठीक उतना ही अंतर है, जितना वन और उद्यान में है, जितना हिमालय, विंध्याचल या सतपुड़ा के वनों और राष्ट्रपति भवन के उद्यान में है । एक प्राकृतिक दूसरा मानवीय शिल्पता से युक्त । दरअसल इसमें समायोजन है, दो जीवन निर्वाह करने के रास्तों का, यह मिलाप बिंदु है इन दोनों जीवननिर्वाह के तरीकों का । जैसे संध्या, (समय में) दिन और रात के बीच की स्थिति है, इसमें दिन का उजाला भी है और रात का अँधेरा भी । फाफामऊ और प्रयागराज को जोड़ता लॉर्ड कर्जन पुल फाफामऊ, गँगा पार करने के बाद पहला बाज़ारीय कस्बा है,जहाँ दूर गाँव से भी और शहर से भी लोग आते हैं अपने आवश्यता की वस्तुएँ खरीदने साथ ही साथ ग्रामीण आते हैं अपनी उत्पादित सामग्रियों को समर्पित करने जनकल्याण के लिए । पाल-पोष कर उत्पादित करके समर्पित कर जाते हैं ये कृषक और ले जाते हैं इसके स्थान पर नई जीवन निर्वाह की सामग्रियाँ । ठ...

#फरवरी

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【तस्वीर: दोपहर, माँ गङ्गा और चाँदी जैसा सूर्य और रश्मियाँ 】 इ स समय, सूर्य के प्रकाश का रंग पिलछौंह् से श्वेत की ओर निरंतर अग्रसर है, यानी सूर्य देव उत्तरायण होने की ओर अग्रसर हैं, इस समय ठण्ड के विदा लेने और ग्रीष्म के स्वागत की उत्सुकता निरंतर बलवती हो रही है । मुझमें शुष्क और अलसाई साँझ को नग्न आंखों से देखने का कौतूहल बढ़ता जा रहा है । फरवरी मुझे प्रिय है । इसलिए नहीं, कि यह बसन्त का मौसम है । बल्कि इसलिए क्योंकि फरवरी एक ऐसा माह है- जिसमें सूर्य की हम दो छटाएँ देख सकते हैं, एक धूप दूसरा घाम। हम देख सकते हैं, सूर्य द्वारा अस्ताचल की अवस्थित को दक्षिण से पश्चिम की ओर खिसकाते हुए । मैं देख सकता हूँ अपनी आँखों से सूर्य को विदा ले कर जाते हुए, दूर क्षितिज तक । क्योंकि विदा ही तो अंतिम सत्य है । हम सभी मिलते हैं और एक वक्त बाद विदा हो जाते हैं । इसलिए विदा प्रिय है मुझे, क्योंकि किसी के चले जाने से जो व्यक्ति में एक खालीपन उभरता है, वह वास्तविक होता है, बनावटी नहीं । यह धूप से घाम होने की कथा है, विवरण है । धूप, सूर्य का वह प्रकाश है जो कोमल है । जिसके स्नेह-लेप के लिए शीत ऋतु में जाने क...