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शकुनश

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जहाज में घूमने वाले जहाजियों और भेड़ों के रेवड़ के साथ नित नए और दिल को छू लेने वाले जगहों में घूमते गड़रिये के अलावा एक और पेशा होता है जो घुमक्कड़ी जीवन शैली जीते हैं वो होते हैं ' फेरीवाले ' ।                  लड़के का नाम था 'अत्रेय' । अपनी बैलगाड़ी में रोजमर्रा के साजो सामान भर कर वह अक्सर एक गांव से दूसरे गांव घूम-घूम कर बेचता था । उसके साथी उसकी गाड़ी खींचने वाला ऊँट,और एक कोरे कागज की किताब जिसमे अक्सर वो उसे पसंद आने वाले लोंगों के चित्र और दिल को छू लेने वाली रेतों के टीलों की आकृतियां बादलों में छिपे सूरज की दो बादलों के बीच से  आती रश्मि जो धरती और आकाश के बीच सेतु बनाती थी उकेरता रहता था ।और सर पर चिलचिलाती धूप से बचने के लिए एक टोपी जो निशानी थी किसी के प्रेम की ।                 इसकी एक और विशेषता थी चेहरा पढ़ने की कला । किसी का भी चेहरा देख कर मनःस्थिति पढ़ सकता था ।        ...

एक अनकहा रिश्ता

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उस दिन कॉलेज में मेरा पहला दिन था । इसीलिए मैं थोड़ी जल्दी कॉलेज पहुँच गई थी और मेरी स्कूल फ्रेंड तृशा भी मेरे साथ थी, मैं मेडिवल हिस्ट्री डिपार्टमेंट में घूम रही थी जो मेरा सब्जेक्ट भी था, मैंने सोचा जब तक क्लासेस नहीं खुल जातीं घूम लिया जाए...।  मैं क्लास से कुछ दूरी पर थी क्लास खुल गई थी कुछ बच्चे भी आ गए थे,  तभी एक लड़का बाहर से हॉल में आया ,एक अजीब सी ऊर्जा थी उसमें ,उसका चेहरा खिला था .. ज़ीरो साइज दाढ़ी कर रखी थी उसने जो एक विशेष नक्श में थी, उसने कैप लगा रखा था । कुलमिलाकर वो बहुत स्मार्ट लग रहा था । मेरे पांव रुक गए मैं उसे देखती रही.. अनायास मैं भगवान से मनाने लगी ' हे भगवान ! वो मेरी ही क्लास में हो..' । वो उसी क्लास में गया -मेरी क्लास में । मैं इतनी खुश हो गई थी कि मुट्ठी बाँध कर नाच उठी थी । वो मुझसे दो टेबल पीछे बैठा था लेकिन मेरा मन तो उसमें ही था.. मैं बदल गई थी एकदम से.. तृशा परेशान हो गई थी और उसने कहा कि तुझे प्यार तो नहीं हो गया...? हाँ.. सच में मुझे प्यार हो गया था... मैंने ध्यान दिया वो भी मुझे देखता था.. और गाहें-बगाहें हमारी नज़र मिल जाती तो मुझ...

डॉ ऋषिकांत पाण्डेय - एक विश्वविद्यालय

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प्रोफ़ेसर ऋषिकांत इलाहबाद विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के विभागाध्यक्ष हैं.. छोटी कद-काठी ,सफ़ेद बाल.. उनकी ऊर्जा उनके निकट आते ही महसूस होने लगती है । हालाँकि मेरी बुद्धि अभी इतनी विकसित नहीं हुई है कि मैं दर्शन और दर्शन के इतने बड़े विद्यार्थी के विषय में विचार व्यक्त कर सकूँ... लेकिन ये उनके प्रति प्रेम है जो किसी दायरे या सीमा से बढ़कर मजबूर करता हैं उनपर मानसिक तौर पर समर्पण के लिए..उनकी श्रेष्ठता समझने के लिए ।  वे स्वयं एनालिटिकल फिलॉसॉफी के विद्यार्थी रहे हैं.. अॉस्ट्रिन के ऊपर उनका रिसर्च भी रहा है...लेकिन जितना बेहतरीन मुईर, विटगेन्स्टिन, क्वाइन, स्ट्रॉसन आदि को पढ़ाते हैं उतना ही बेहतरीन इंडियन फिलॉसॉफी या फिलॉसॉफी ऑफ़ रिलिजन पढ़ाते हैं.. उनकी तो एक पुस्तक तक फिलॉसॉफी ऑफ़ रिलिजन पर है "धर्म दर्शन" जो पियर्सन पब्लिकेशन से प्रकाशित है । मुझे लगता है धर्म दर्शन पर रूचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए.... मुझे उनके निकट जाने का सौभाग्य तो प्राप्त नहीं हुआ किन्तु मैं उनकी क्लासेज में जरूर उपस्थित रहता था.. मुझे उनकी क्लास में एक अनिर्वचनीय मज़ा आता था....

उस शाम

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ब हुत दिन से मेरा मन कर रहा था कि गोविंदगढ़ में एक शाम गुजारूं.. इसलिए नहीं..कि वह मध्यप्रदेश के सबसे बड़े तालाबों में एक है , बल्कि इसलिए क्योंकि यह तालाब ज़िन्दगी का एक बिम्ब उकेर देता है.. प्राकृतिक परिदृश्य अनुपम है । मेरे 12वीं का आखिरी पेपर गणित का था जो दुबारा 24 मार्च 2014 को हुआ.. वो दिन मेरे स्कूल लाइफ का अंतिम और अविस्मरणीय दिन था.. हमने गोविंदगढ़ जाने रूपरेखा 24 को ही बनाया था लेकिन एक दिन बाद जाना तय हुआ । हम दो लोग थे एक तो मैं ही था दूसरा विराट था । मैं विराट के घर में ही रहता था..और अब हम दोनों अच्छे-खासे दोस्त हैं...। हम उसी की मोटरसाइकल से जा रहे थे......         हम चल पड़े थे प्रकृति की गोद में.. मानो वह हमारा इंतज़ार कर रही हो और हमें गोद में भर लेने को उत्सुक हो.. हम थोड़ा रफ़्तार में जा रहे थे क्योंकि सूरज ढलने वाला था और हमें अंदेशा था कि कहीं सूरज डूब न जाए.. लगभग आधी दूरी पहले से मोटेरसाइकल मैं चला रहा था जब हम उस मोड़ में मुड़ने लगे जो गोविंदगढ़ की ओर जाता है तो वहां कुछ पुलिस वाले दिखे मैं थोड़ा सहमा और आगे बढ़ गया........

एक उलझन सी मन में

एक उलझन सी मन में हुई आज फिर ,आज फिर मैं पूरी रात सो न सका , जिससे बे-इन्तहां है मोहब्बत हुई ,खुद को उसकी अदा में भिगो न सका, जब भी सोया हूँ रातों की हदबंदी में ,है छलक जाता यादों का एक साज़ फिर धीरे-धीरे चलो री पवन आज फिर, देखो पतवार भी आज प् न सका.. उसकी मौजूदगी के हर एहसास में प्यार की बांसुरी मैं बजा न सका.. चाँद तू भी बढ़ा रौशनी खुद की तो !  उसकी वेड़ी में जो फूल गूंथा था मैं ,गिर गया हो कहीं भूल से आज फिर.. आज फिर मैं उसे ढूढ़ने चल पड़ा..आज फिर मैं पूरी रात सो न सका ।    ✍ विनय इस तिवारी ©

ट्रैफिक जाम

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मैं अपनी एक पुरानी डायरी जो रद्दी वाले को पुराने अख़बार देते वक्त मिली थी पलट रहा था । उसमे कुछ पुराने कॉन्टेक्ट नंबर थे..और कुछ लोगों के नाम जो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले सबसे अच्छे लोग थे । मैं एक-एक करके पन्ने पलटता जाता मानो अपने ज़िन्दगी की किताब पलट रहा हूँ ...धीरे-धीरे अंगुलियां एक नाम पर ठहर गईं ।     ' रिया ' एक नाम जो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले नामों में सबसे अच्छा नाम है । वैसे रिया नाम भी कितना क्यूट लगता है न..?? सोचो वो कितनी खूबसूरत रही होगी ।       पहली बार देखा था उसे केमेस्ट्री की कोचिंग में... मैं भी साईकिल से था और वो भी । ओल्ड मॉडल लेडीज साईकिल को हाँथों में थामे हुए पैदल आ रही थी । पिंक कलर के सूट के ऊपर हल्की कत्थई शॉल ओढ़े थी कम्बख्त ठण्ड भी उस दिन बहुत पड़ रही थी । ठण्ड से उसके गाल और लाल हो गए थे । इतनी मासूम और शांत लड़की पहली बार देखा था मैंने !!  उसे देखते देखते कब दो महीने निकल गए पता ही नहीं चला.., हम दोनों का बैच बदल गया था हमारी मुलाकात महज़ रास्तों में पल भर के लिए होती थी । और उन्हीं दो पलो...

एक अविस्मरणीय दिन -- 9 जुलाई 2010

आज सात साल बाद मैं फिर उसी नौवीं 'सी' के सामने नीम के चबूतरे पर बैठ गया ..और देखने लगा 9th c के पीछे वाले दरवाजे पे चॉक से लिखा मेरा नाम जो मैंने ही लिखा था.. जहाँ से स्कूल के शुरूआती दिन साँस लेने लगे और मैं डूब गया एक बीती किन्तु अनमोल और अद्भुत दुनियां में..।                         # सात साल पहले  9 जुलाई 2010 एक अविस्मरणीय और बेशकीमती दिन था मेरे लिए । हाँ.. ये वही दिन था जिस दिन मार्तण्ड नम्बर 1 (एक्सीलेंस) स्कूल में मेरा पहला दिन था । यह एक और दिन था... जब मैं अपना नाम दुनियां के उन विद्यार्थियों के साथ दर्ज़ करा चुका था जो अपने घर से दूर रह कर किसी खास मकसद के लिए पढ़ते हैं । इस पहले दिन मेरे भइया मुझे ले गए । "यार..9th 'c' किधर है..?"-मैंने एक लड़के से पूँछा । "नीम के पेड़ के सामने वाला है.." -उसने उंगली दिखाते हुए कहा । "तुम लोग 9th 'c' के हो..?" - भइया ने वहां खड़े लड़कों से पूँछा । "हाँ..हम 9th 'c' के ही हैं " - एक मोटे लड़के ने कहा । मैं और ...