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“..क्योंकि जिंदगी अपने निकृष्टतम रूप में भी मौत के सर्वश्रेष्ठ ढंग से बेहतर होती है”- कैसे?

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अनुराग भइया का लेख पढ़ने के लिए इसे क्लिक करें मैं ने अनुराग भइया का लेख पढ़ा । जिसमें उन्होंने लिखा था,  “जिंदगी अपने निकृष्टतम रूप में भी मौत के सर्वश्रेष्ठ ढंग से बेहतर होती है ।”  आइए देखते हैं कैसे?  सर्वप्रथम जीवन के मूल्य को समझते हैं, तत्पश्चात मृत्यु के उस पार की सूक्ष्म दुनियाँ के बारे में जानते हैं, आखिर क्या होता है मृत्यु के उस पार! अर्नाल्ड बेनेट ने एक जगह लिखा है कि, ‛सांसारिक सुख जिसे कहते हैं उसका न मिलना ज्यादा श्रेयस्कर है मृत्यु के समय आत्मा की यह धिक्कार सुनने से कि तुममें हिम्मत की कमी थी, तुम ठीक उस समय भाग खड़े हुए जब तुम्हें सर्वाधिक हिम्मत दिखानी थी ।’ डॉ रामधारी सिंह 'दिनकर' “ हिम्मत और ज़िन्दगी” में लिखते हैं कि, ‛ज़िन्दगी के असली मज़े उनके लिए नही हैं जो फूलों की छाँव में सोते हैं. बल्कि फूलों की छाँव के नीचे अगर जीवन का कोई स्वाद छिपा है तो वह भी उन्ही के लिए है जो दूर रेगिस्तान से आ रहे हैं जिनका कंठ सूखा हुआ, होंठ फटे हुए और सारा बदन पसीने से तर है. पानी में जो अमृत वाला तत्व है, उसे वह जानता है जो धूप में खूब सूख चूका है, वह नही जो रेगिस्तान मे...

विदा!

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  क्या बस शरीर के दूर हुए जाने में छिपी विदा है? या फिर मन के टूटने और जुड़ने में छिपी विदा है? यदि शरीर के दूर हुए जाने से उदित विदा है! तो दिनेश से इतनी दूर भी, कैसे जुड़ी विभा है? कुछ तो है सूक्ष्म, जो नग्न नयन की हद से दूर खड़ा है! जिस तरह सूर्य-शशि को विलोक,खिंच जाता जलधि सदा है! - विनय एस तिवारी

कनकाभ-मेघ

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मैं ने नहीं देखा है हिमालय का स्वर्णमयी शिखर । मैंने उसका सौंदर्य प्रत्यक्षानुभूत नहीं किया है, किन्तु मैंने उसे देखने पर होने वाले अनुभव को महसूस किया है। क्योंकि मैंने देखा है ‛कनकाभ-मेघ!’ हाँ, जिस प्रकार सूर्यातप से नहाए गिरीराज स्वर्णमयी दिखते हैं, ठीक उसी प्रकार जब बरसात के मौसम में दिनेश आच्छादित होते हैं श्यामल बादलों से, और उनकी रश्मियाँ सीधे धवल कपासी बादलों पर पड़ती हैं, तो ये धवल मेघ हो जाते हैं स्वर्णमयी । और वह श्यामल-स्वर्णमयी बादलों का दृश्य नीले आकाश में दिखता है तो आँखें विस्मय से भर जाती है, मन नियति की इस अद्भुत सजीव चित्रकारी से मोहित हो जाता है, और अनायास स्वर फूट पड़ता है ‛अहा!’                                            (कनकाभ-मेघ, प्रतीकात्मक तस्वीर) यह विस्मय लगभग ऐसे ही होता है जब पहली बार कोई बालक-मन पुस्तकों से इतर, वास्तविकता में देखता है पहली बार ‛इंद्रधनुष’ । आह! उसकी अद्भुत रंगीयता बालक-मन को ऐसे मोह लेती है जैसे ऋषियों को मोह लेता है सच्चिदानंद ‛ब्...

प्रेरणा

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                              पेंटिंग राजा रवि वर्मा - एक भारतीय नारी  जब भी घोर निराशा मन को प्राणहीन कर छा जाती है, तभी किसी की स्मित शशि-छवि, मुझे प्राणमय कर जाती है । देवी! वह मलयज चन्दन सी, मोहमयी शीतल छाया सी, सुरकन्या सी आभा लेकर, कल्प-तरु जैसी काया भी, झगझोड़ जगा मुझको आँधी सी, नव-जीवन देकर जाती है । - विनय एस तिवारी

पलास के फूल सी तुम

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                        पलास का वृक्ष और उसकी छाँव शुभे! तुम्हारी आंखों को, मैं झील-ए-शराब नहीं कहता! इसका अर्थ यह नहीं, कि मुझे उनकी गहराइयों का भान नहीं! कि उनके सौंदर्य की पहचान नहीं! बल्कि इसलिए, क्योंकि ये उपमाएँ दूषित हो चली हैं, पुरातन हो चली हैं । मैं तुम्हारे चेहरे को चंद्र-सम नहीं कहता, इसलिए नहीं, कि तुम्हारे सौंदर्य पर मैं मोहित नहीं! या मैं आतुर नहीं होता, तुम्हें सर्वोत्कृष्ट रूपसी कहने को ! बल्कि इसलिए, क्योंकि इस उपमा का सर्वाधिक निरादर किया है मानव ने । इसलिए मैं तुम्हारी उपमा करता हूँ, ‛पलास के फूल से!’ जैसे गर्मी की तपन में भी, दिलाते हैं- मन को सुकून ये पलास के सुन्दर पुष्प-गुच्छ । इनकी लालिमा, तुम्हारे रक्तवर्णी चेहरे का प्रतीक है । इनकी शीतलता, तुम्हारी मधुरता का प्रतीक है । इसीलिए मुझे प्रिय हैं दोनों- तुम्हारा पलासी-मुख औ पलास-वृक्ष । - विनय एस तिवारी

मेरे ही व्यक्तित्व-पथ के सहयात्री-- ‛अज्ञेय’

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जिसका जन्म होता है उसका मृत्यु भी वरण करती है किन्तु ऐसा तो कम ही होता है! दुनियाँ के हर संस्कृति, सभ्यता और नैसर्ग की अनेकेन अभिव्यंजनाओं के सौंदर्य के पारखी, साहित्य के दैदीप्यमान सितारे, जिनका मैं सह-पथिक, मेरे सर्वप्रिय कवि-लेखक सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‛अज्ञेय’ दुनियाँ की तमाम जगहों को पार करते-करते अपने जन्मदिवस 07 मार्च को भी पार कर के ही स्वर्गलोक की यात्रा 04 अप्रैल को आरम्भ किये । जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी होती है किन्तु ऐसा तो कम ही होता है न!! कि कोई दुनियाँ की यात्रा करते-करते अपने जन्म दिनाङ्क को पार करके ही स्वर्ग की यात्रा आरम्भ करे । मेरे सह-पथिक, सह-व्यक्तित्व अज्ञेय को पुण्यतिथि पर नमन । अज्ञेय की पसंदीदा अंग्रेजी रचनाओं में एक, जिसे अनूदित किया है मैंने हिन्दी में अज्ञेय ख़ातिर-- "My candle burns at both ends It will not last the night; But ah, my foes, and oh, my friends - It gives a lovely light." “मेरे जीवन की दीप्ति ज्वलित है दोनों छोरों से, ये समूची रात नहीं जल पाएगी; किन्तु आह! ओ शत्रु मेरे, और ओह! मित्र मेरे, यह ...

ग्रीष्म की साँझ

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                                    (गर्मी की एक साँझ)                       मेरे लिए, गर्मियों की शामें अक्सर उदासीनता से भरी होती हैं । यह गर्मियों की साँझ ही है , जब मेरे लिए एकांत की चाहना सर्वाधिक प्रबल होती है । साँझ की रक्तवर्णी रंगीयता, इसके साथ आकाश की अभेद्य आकाशीय-नीलिमा, और हर तरफ सूखे-वृक्ष, जिनकी हरित-पत्तियों को तपन ने भष्म कर दिया है, इन्हें देख कर जाने क्यों मन अवसाद से भर जाता है! जबकि हम जानते हैं, कि कल सूरज फिर निकलेगा, फिर घाम होगा और फिर साँझ । नियति का यह क्रम नियत है । जाने क्यों, सूर्य का विदा होना, अपने साथ उत्सुकता और उन्मुक्तता को भी साथ ले जाता है! और भर देता है एक अज्ञात व्याकुलता से मुझे । “मैं देख रहा हूँ, सूर्य-अस्त होते पश्चिम में, उभर रहा वैराग्य अचानक, मन-अवसादी! हाय! विभा तेरा जाना, यूँ तोड़ रहा है, ज्यों, दिनेश मेरा अंतस ही निचोड़ रहा है ।” ये सच है, कि रात इस धरित्री को एक नए रंग में रँग दे...