Sunday, 13 September 2026

इत्यलम् (मेरी डायरी)


13 सितंबर 2026

प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा

आज Facebook पर मेरे एक Philosophy Professor की एक पोस्ट पढ़ी। उन्होंने Utkal University के Department of Philosophy में अपने PG के दिनों की, यानी 1980 के दशक के उत्तरार्ध की, एक पुरानी तस्वीर साझा की थी। AI की सहायता से उस तस्वीर को फिर से जीवंत करते हुए उन्होंने जैसे अपने उस युवा विद्यार्थी-जीवन में लौटने का अनुभव किया था।

पोस्ट पढ़ते हुए लगा—मनुष्य कितना भी आगे बढ़ जाए, अपने अतीत की ओर लौटने की इच्छा शायद कभी समाप्त नहीं होती। कुछ स्मृतियाँ सचमुच पुरानी नहीं होतीं; वे भीतर कहीं सुरक्षित रहती हैं और अवसर मिलते ही फिर जीवित हो उठती हैं।

मैंने उनकी पोस्ट पर टिप्पणी की—

“A beautiful journey back in time, Sir! Some memories never really grow old—they only wait to be brought alive again. Truly, the reel meets the real!”

Professor ने उत्तर दिया—

“Thank you so much for your warm and thoughtful words!”

उनका यह उत्तर अच्छा लगा। विशेषकर “warm and thoughtful” शब्दों ने ध्यान खींचा। लगा कि उन्होंने मेरी टिप्पणी को केवल औपचारिक प्रशंसा के रूप में नहीं, बल्कि उसके भाव और विचार को भी देखा।

लेकिन इसी पोस्ट पर हुई आगे की बातचीत और भी रोचक थी।

किसी ने ओड़िया में टिप्पणी की कि उस समय सीढ़ियों के दोनों ओर रेलिंग नहीं थी।

मैं वहीं ठिठक गया।

यह एक बहुत छोटी-सी बात थी, लेकिन उसमें एक बड़ी बात छिपी थी।

AI अतीत को उपलब्ध तस्वीरों और सूचनाओं के आधार पर कल्पना में फिर से बना सकता है। वह किसी पुराने दृश्य को सुंदर ढंग से प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन उस समय वास्तव में वहाँ क्या था—सीढ़ियों पर रेलिंग थी या नहीं, भवन कैसा था, वातावरण कैसा था—इन बातों की सबसे प्रामाणिक जानकारी उस व्यक्ति के पास ही हो सकती है, जिसने उस समय वहाँ स्वयं उपस्थित होकर उसे देखा और जिया हो।

मैंने इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए टिप्पणी की कि AI अतीत को कल्पना में फिर से जीवंत कर सकता है, लेकिन उस समय की वास्तविक स्मृतियाँ तो उन्हीं लोगों के पास होती हैं जो उस समय वहाँ उपस्थित थे। ऐसी स्मृतियाँ AI द्वारा बनाई गई reel को और अधिक वास्तविक बना देती हैं।

Professor ने मेरी बात को समझा और अपने उत्तर में लिखा कि उस समय वहाँ उपस्थित लोगों की ऐसी स्मृतियाँ AI-generated past को अधिक realistic बनाती हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि AI उपलब्ध visual material के आधार पर interpolation और extrapolation करता है। चूँकि उस समय की Department की ऐसी पुरानी तस्वीर उपलब्ध नहीं थी जिसमें रेलिंग न हो, इसलिए AI ने वर्तमान तस्वीर को आधार बनाया और कल्पना से उन्हें late 80s में पहुँचा दिया।

यह पढ़कर मन में एक संतोष-सा हुआ।

मेरी छोटी-सी टिप्पणी अब एक परिचर्चा का रूप ले चुकी थी।

Professor ने आगे अपनी एक इच्छा भी बताई—वे अपने उस समय के शिक्षकों के साथ AI की सहायता से एक group photograph बनवाना चाहते हैं। उनके पास उन दिनों की कोई group photograph नहीं है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि शायद किसी पुराने साथी ने ऐसी कोई तस्वीर संभालकर रखी हो।

इस बात ने मुझे और सोचने पर मजबूर किया।

आज AI के पास अतीत के दृश्य को फिर से बनाने की अद्भुत क्षमता है। लेकिन जिस अतीत को हम खो चुके हैं, उसकी एक छोटी-सी वास्तविक तस्वीर पाने के लिए आज भी हमें उन्हीं मनुष्यों की स्मृति की ओर देखना पड़ता है, जिन्होंने वह समय जिया था।

AI अतीत को दिखा सकता है, लेकिन स्मृति ही उसे जीवित करती है।

शायद यही इस छोटी-सी Facebook परिचर्चा का सबसे सुंदर निष्कर्ष है।

एक साधारण-सी पुरानी तस्वीर से शुरू हुई बात स्मृति, वास्तविकता, AI और मानवीय अनुभव तक पहुँच गई।

और मुझे ऐसी बातचीत अच्छी लगती है।

शायद Philosophy भी कुछ ऐसी ही है—सामान्य-सी दिखाई देने वाली किसी बात में छिपे हुए प्रश्न को पकड़ लेना और फिर उसके पीछे थोड़ा दूर तक चलते चले जाना।

                                               ______________


15 सितम्बर 2026

चितहरा रेलवे स्टेशन क्रॉस करते हुए ।              09:14 AM 

मानिकपुर से सतना की ओर — राम की वनभूमि में ।

आज मानिकपुर से सतना की ओर जा रहा हूँ। रास्ते में चारों ओर फैली ये पहाड़ियाँ और जंगल देखकर मन बार-बार उसी युग में चला जाता है, जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने अपने वनवास के वर्षों में इन वनांचलों में भ्रमण किया था।

मन में एक विचित्र-सा विचार उठता है—ये भूमि कितनी सौभाग्यशाली रही होगी!

इन पहाड़ियों ने कभी राम के चरणों को स्पर्श किया होगा।
इन वृक्षों ने उन्हें अपने बीच से गुजरते देखा होगा।
इन जंगलों ने माता सीता और लक्ष्मण जी की उपस्थिति को अनुभव किया होगा।
और यहाँ की मानव सभ्यताएँ—वे कितनी भाग्यशाली रही होंगी, जिन्हें राम के सान्निध्य का अवसर मिला होगा।

आज हम इन स्थानों से गुजरते हुए केवल पहाड़ और जंगल देखते हैं, लेकिन यदि स्मृति और श्रद्धा की आँखों से देखें तो यही वनभूमि इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म की एक जीवित स्मृति बन जाती है।

राम केवल एक आदर्श पुरुष या नायक ही नहीं थे; वे योद्धा भी थे। उन्होंने जिन राक्षसों का सामना किया, उन्हें केवल किसी एक जाति या समुदाय के रूप में देखना शायद उस कथा के व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। वे उन कुप्रवृत्तियों और अत्याचारों के प्रतीक भी हैं, जिनसे किसी भूमि और समाज को मुक्त करना आवश्यक होता है।

और फिर माता सीता...

उनकी रसोई और उनकी उदारता की कल्पना ही मन को छू जाती है। वनवास में भी उनका जीवन केवल अपने लिए नहीं था। उनके हाथों से बना भोजन और उसमें निहित आत्मीयता शायद यह सिखाती है कि अभाव के बीच भी उदारता संभव है और साधारण-सी रसोई भी प्रेम का तीर्थ बन सकती है।

इन्हीं विचारों में डूबा हुआ आगे बढ़ता हूँ तो मानिकपुर के बाद ट्रेन जैतवारा स्टेशन पर रुकती है। यहाँ से अगला स्टेशन सतना है।

अब दृश्य कुछ बदल जाता है। वही धरती, वही क्षेत्र—लेकिन सामने आज का मनुष्य है।

जैतवारा से ट्रेन में तरह-तरह के यात्री चढ़ते-उतरते हैं। कोई छात्र है, जो पढ़ाई के लिए जा रहा है। कोई महिला डॉक्टर को दिखाने जा रही है, कोई किसी दूसरे आवश्यक काम से। कुछ लोग अपने कार्यालय की ड्यूटी के लिए यात्रा कर रहे हैं। इनके बीच प्रौढ़ और बुजुर्ग यात्री भी हैं।

वास्तव में, यह बड़ा विविधतापूर्ण यात्री स्टेशन है।

किसी की यात्रा शिक्षा के लिए है, किसी की स्वास्थ्य के लिए, किसी की रोज़गार के लिए और किसी की जीवन की दूसरी आवश्यकताओं के लिए। सबके अपने-अपने उद्देश्य हैं, अपनी-अपनी चिंताएँ हैं और अपनी-अपनी मंजिलें हैं।

कुछ क्षणों के लिए लगता है—कभी इसी धरती पर राम अपने वनवास की यात्रा कर रहे थे और आज इसी धरती पर असंख्य सामान्य मनुष्य अपनी-अपनी छोटी-बड़ी जीवन-यात्राओं पर निकले हुए हैं।

युग बदल गया, यात्री बदल गए, यात्राओं के उद्देश्य बदल गए—
पर यात्रा अब भी जारी है।

और शायद यही इस भूमि की सबसे बड़ी विशेषता है—
यह केवल राम की स्मृतियों को ही नहीं सँजोए हुए है, बल्कि आज भी असंख्य मनुष्यों के जीवन की यात्राओं की साक्षी बनी हुई है।

ट्रेन अब सतना की ओर बढ़ रही है।...

- विनय शंकर तिवारी

No comments:

Post a Comment

इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...