Tuesday, 28 January 2020

नरगिस के फूल सरीखे, सुन्दर आंखों वाली लड़की के जन्मदिवस पर!





मुझे वह पहली कक्षा में नहीं मिली थी। दरअसल ‛पहली कक्षा’ मैंने उस स्कूल में पढ़ा ही नहीं, उस स्कूल में तो मैं ‛दूसरी’ में गया था।
वह, दूसरी और तीसरी कक्षा में भी नहीं आई थी, वह तो आई चौथी में ।
अक्सर मैं स्कूल-सत्र शुरू होने के काफी दिन बाद स्कूल जाता था । ये जुलाई 2005 का मध्य था, और मेरा कक्षा चौथी के सेसन का पहला दिन, जब मुझे पता चला कि क्लास में एक बेहद खूबसूरत सी दिखने वाली एक लड़की आई है, मैं क्लास में गया तो वाकई एक ‛क्यूट’ सी दिखने वाली लड़की, लड़कियों के बेंच में दूसरे नम्बर की सीट पर ठीक बीच में बैठी थी ।
मैंने गौर से देखा तो उसके बाल महज़ उसके कंधों को छू रहे थे, कंधे को छूते उसके सुलझे बालों में मैं उलझ गया था पहली बार!
जिसे देख कर मुझे पहली बार लगा कि मुझे इससे बात करनी चाहिए, पर अक्सर मेरा शर्मीला स्वभाव रोड़ा बन जाता था, उससे बात करने में ।

फिर एक दिन! जब वो स्कूल आ रही थी, तो उससे पहली बार मैंने अपने रूम और स्कूल के पास वाले मैदान में मैंने बात की । क्या बात की ये तो याद नहीं लेकिन हाँ, उस दिन से मेरी उससे यदा कदा बात होने लगी ।

ऐ संदेशवाहक मेघ! जैसे तुमने कालिदास की मेघदूतम् में यक्ष का संदेश अलकापुरी तक पहुँचाया था, वैसे ही मेरा संदेश भी पहुँचा सकोगे?

ओ मेंहदी की हरी पत्तियों! क्या तुम उसकी कमल सी कोमल हथेलियों को ठीक वैसे ही रच सकोगी?
जैसे तुमने रचा था दुष्यन्तला का कोमल हस्त!
या जैसे जानकी का मृदुल हस्त! इसी मेंहदी से रची हथेलियों से गुजरे कंगनों के नगों में देखा था जानकी ने, भगवान राम की छवि ।


और फिर, ये तो जगजाहिर है न! कि, “पहला हमेशा पहला होता है, आखिरी आखिरी कभी नहीं!”
और तुम मेरे ज़िंदगी की पहली हो!

एक साल के बाद ही मेरी स्कूल से बदली हो गई, मेरा स्कूल, मेरे दोस्त सब पीछे छूट गए, लेकिन उनकी उजली यादें मेरे जेहन में थीं और उन यादों में सबसे उजला चेहरा तुम्हारा था । फिर एक रोज मैंने तुम्हें देखा अखबार के पन्ने पर, उस स्कूल की दसवीं कक्षा में अव्वल आने वाले तीन विद्याथियों की सूची में। मेरा दिल जोर से धड़कने लगा एकबार फिर!

लेकिन वक्त की धूल ने मेरे जेहन से उस वक्त का हर एक चेहरा ढक दिया और शेष रह गए सिर्फ नाम!
ये सच ही है, कि समय की धूल, स्मृतियों में छपे चित्रों को धूमिल कर देती है, और यदि स्मृतियों का पुनःदृश्यांकन न हो तो ये चित्र, विदा हो जाते हैं हमेशा के लिए, और खण्डहर में बचते हैं, सिर्फ आरेख!
वो नाम,जिनसे मेरा बचपना पूर्ण था, ये वो नाम थे जिनका जिक्र आते ही मैं कितने ही अकेलेपन क्षणों में भी मुस्कुरा उठता, और फिर तुम्हारी एक मीठी मुस्कान जो यादों में कैद थी, मुझे अकेलेपन के थपेड़ों से बाहर ला देती, और मैं मुस्कुरा देता ।

सुनो! नरगिस के फूल सरीखे सुन्दर आंखों वाली लड़की,
“हैप्पी बर्थडे टू यू!”




- विनय एस तिवारी

Monday, 20 January 2020

गर्मियों की साँझ

         गोविंदगढ़ तालाब, रीवा. 26.03.2014

मेंरे लिए, गर्मियों की शामें अक्सर उदासीनता से भरी होती हैं ।
साँझ की रक्तवर्णी रंगीयता जाने क्यों मन को अवसाद से भर देती है! जबकि हम जानते हैं, कि कल सूरज फिर निकलेगा, फिर घाम होगा और फिर साँझ ।
नियति का यह क्रम नियत है । जाने क्यों, सूर्य का विदा होना, अपने साथ उत्सुकता और उन्मुक्तता को भी साथ ले जाता है! और भर देता है एक अज्ञात व्याकुलता से मुझे ।

“ मैं देख रहा हूँ, सूर्य-अस्त होते पश्चिम में,
उभर रहा वैराग्य अचानक, मन-अवसादी!
हाय! विभा, तेरा जाना यूँ तोड़ रहा है,
ज्यों, दिनेश मेरा अन्तस् ही निचोड़ रहा है ।”

ये सच है, कि रात इस धरित्री को एक नए रंग में रँग देती है, किन्तु इसका आरम्भ तो साँझ से ही होता है न!
तब,क्या यह रंगीयता अपने साथ असारता का भी बोध लाती है?
क्या यह विषाद, वस्तुओं को स्पष्ट न देख पाने की व्यथा का परिणाम है?
क्या मानव ने दिन को इतना स्वीकार लिया है, कि दिन के प्रकाश का विदा होना, उसके स्वयं के अंश का विदा होना हो जाता है?
या फिर इसलिए, कि यह प्रतीक है मृत्यु का, और मृत्यु की तो सहधर्मिणी है ही उदासी ।
इस उदासी के दर्द ने ही तो सिखलाया है मुझे, कि  जब, मुझ जैसे व्यक्ति से प्रकाश का विदा होना, विषाद और एकाकी होने का आरम्भ होना होता है, तो कदाचित किसी तारे का टूटना भला कितना पीड़ाकारी होता होगा! क्योंकि वह तो उसका अंश है ही ।
या जब कोई तारा, जिस दिन अपने समस्त प्रकाश को अलविदा कहता होगा, वह दारुण्य दृश्य कितना मर्मस्पर्शी और रुदन से भरा होता होगा! कौन जाने?
शायद इसीलिए, नियति ने मानव को पहला उपहार रुदन दिया है?

कौन जाने क्या रिश्ता है इन रश्मियों से मेरा?
कि इनका जाना, मुझे आकुलता से भर देता है!
कि जिसके बिना भर जाता हूँ मैं विषाद से और उभर आता है एक अजीब और अनजान सा खालीपन। कौन जाने?

- विनय एस तिवारी

Thursday, 9 January 2020

डूबता सूर्य, साँझ और मैं...




मुझे गर्मियों में साँझ के समय सूरज का पीला प्रकाश हमेशा से पसंद है, इसीलिए मुझे आकर्षित भी करता है । जब शुष्क वातावरण के साथ में लू के मद्धम होते थपेड़े चेहरे को स्पर्श करते हैं, तो सिहरन से पूरा बदन रोमांच से भर जाता है, परिपक्व हो चुकी सूर्य-रश्मियाँ जिस कोमलता से मेरे शरीर को छूती है, उस छुअन से मात्र मेरा शरीर ही नहीं, मेरा मन और स्वयं मैं भी इस सूर्य और वायु-स्नान से शुद्ध हो कर आनंदित हो जाता हूँ । मैं सूर्य से स्वयं तक पहुँचती किरणों को देखता हूँ और जुड़ जाता हूँ, सूर्य से इन रश्मि-सेतु के द्वारा और ठीक इसी समय स्पर्श करती वायु मुझे धन्यता से भर देती है ।

जब भी मुझे ग्रीष्म की संध्या का विचार आता है तो जागृत हो उठता है मेरी स्मृतियों में, तीन ओर से पहाड़ों से घिरा " त्रिगिरी " कस्बा ।

इसकी विशेषता ही ये है कि, यह तीन ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है, जिससे अमूमन चलने वाली हवाएँ तीनों पर्वतों से टकरा कर वापस पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाती हैं । टकराने से बने दबाव के कारण इनकी रफ्तार सामान्य से कहीं अधिक होती है ।
इसीलिए, ग्रीष्म की साँझ में वायु-स्नान का जो आनंद यहाँ मिलता है, वो शायद ही कहीं और हो!
अपनी दोनों बाहें फैला कर, पके घाम में वायु का आलिंगन एक पूर्णता से भर देता है ।
संभवतः यह प्रतीति प्रकृति और पुरुष के मिलन से ही होती हो, जैसा कि सांख्य कहता है ।

किन्तु वायु के स्पर्श का अनुभव करते ही रोम-रोम रोमांच से भर जाता है ।
और इसी आनंद के क्षण में विदा लेता सूर्य अपनी रश्मियों के साथ छिप जाता है पर्वत की ओट में, अस्त होने से पूर्व ही! और बिखेर जाता है नभ में रक्तवर्णी प्रकाश ।

- Vinay Ś Tiwari | विनय एस तिवारी

Wednesday, 27 November 2019

सुनो! शाश्वत-हिम गिरि, मैं जरूर आऊँगा..

मैंने नहीं देखा है हिमालय । मैं उस दृश्य का साक्षी नहीं बना हूँ, जब दिन में हिमशिखरों से बादल हटते हैं और दिखता है सूर्य-रश्मियों से सज्जित स्वर्ण-शिखर ।


मैंने तो कसौनी भी नहीं देखा, और न ही रानीखेत । मैंने स्याह सड़कों पर जमी बर्फ ‛ ब्लैक-आइस’ नहीं देखी ।
मैंने देखा है तो अपने गाँव में ऊँचा पहाड़ और जब भी उसे बादल से घिरते देखता हूँ, तो अनायास ही कल्पना करता हूँ कि, अब बादल हटेंगे और दिखेगा पहाड़ का मुकुट हिममयी ।

तब, मैं कहता हूँ हिमालय से,
सुनो! शाश्वत-हिम गिरि, मैं जरूर आऊँगा,
मैं आऊँगा अपने लिए तुम्हें देखने ।
तब क्या तुम मुझे दिखाओगे अपनी सौंदर्यता? अपनी मोहकता?, क्या दोगे तुम मुझे शून्यता?
क्या दे सकोगे मुझे वह परम रहस्य, जो नचिकेता ने जानना चाहा था, मृत्यु के देवता से ?

हे मेरे मीत हिमालय! मैं अभी मैदान की सपाटता के सौंदर्य को जी रहा हूँ, मैं अभी गवाह बन रहा हूँ गङ्गा और यमुना के मिलन का ।
मैं पूर्णिमा में चन्द्र की श्वेत-किरणों को गङ्गा के कछार में पड़ते ही, रेत से प्रकीर्णित आभा के दृश्य का सौंदर्य चख रहा हूँ ।

                     लेकिन आऊँगा जरूर, तुम्हें देखने अपने लिए, मेरे मीत, ये मेरा दृढ़ निश्चय है ।

- विनय एस तिवारी
  नवंबर26, 2019

Wednesday, 6 November 2019

जब सूरज को रंगते देखा एक गाँव



मुख्य सड़क से थोड़ी ही दूर तो बसा था गाँव । एकदम सीधी सड़क और उसके दोनों ओर एक दूसरे के सामने खड़े श्वेत घर ।
यही विशेषता थी उस गाँव की, उसे ‛श्वेत घरों वाला गांव’ के विशेषण से भी आस-पास के गाँवों में जाना जाता था ।

वो शुरुआती गर्मियों के मौसम, यानि फागुन में दिन का तीसरा पहर, जब मैं बाहर निकला, लगभग साढ़े चार बजे शायं । धूप पक चुकी थी, यानी उसका ताप सामान्य हो रहा था और सूर्य-रश्मि श्वेत से संतरी होने की ओर अग्रसर ।

गाँव के आग्नेय दिशा ( दक्षिण-पूर्व) पर थोड़ी ही दूर में एक छोटी सी पहाड़ी थी, पहाड़ी इतनी छोटी थी कि पंद्रह मिनट में उसके शिखर पर पहुँचा जा सकता था । यूँ तो पहाड़ी में बड़े पेड़ न थे, किंतु कुछ पेड़ जैसे बरारी व करौंदा के थे ।

                 उस दिन, उस पंक्तिबद्ध खड़े श्वेत घरों को श्वेत प्रकाश के रंग से धीरे-धीरे संतरी रंग में ढलते हुए देखा मैंने ।
मैंने उस दिन पहली बार अस्ताचल की सीमा देखी और उसके पीछे डूबता हमारा पोषक सूर्य, क्योंकि हमारे गाँव में तो पर्वत के ठीक पीछे डूब जाता है ।
किन्तु, ये पहला अवसर था, जब मैंने सूर्य की रक्तिम रश्मियों को रंगते देखा था एक गाँव ।
मैंने पहली बार ही नैसर्ग की ये अद्भुत चित्रकारी देखी, वो भी इसे पूर्ण होते हुए ।
जैसे धरती में एक साँझ, बना रहा हो सूर्य चित्र और आप देख रहे हों उस चित्र को मूर्त रूप में ढलते, आश्चर्य से, कौतूहल से उस पूर्णता का साक्षी बनते ।

Vinay S Tiwari

【तस्वीर (प्रतीकात्मक): अण्दलूसिया, स्पेन  】

Thursday, 10 October 2019

पेन पाल ( Pen Pal )



कैसी विडम्बना है न ! अक्सर छोटी-छोटी बातें कब बड़े अनुभवों में बदल जाती हैं पता ही नहीं चलता ।
मेरे जीवन में भी इस गुत्थी को खुलने में बीस वर्ष लग गए ।

   इसकी शुरुआत तब हुई थी जब मैं इक्कीस साल का कॉलेज स्टूडेंट था ।
उस दिन मैं बॉम्बे मैंगजीन का वो पन्ना देख बैठा जिसमें दुनियाभर के उन लोगों के पते छपे थे, जिन्हें, भारत में पेन-पाल की तलाश थी ।

हालाँकि मैं अपने साथ के लड़के-लड़कियों को एयर-मेल से अनजान लोगों द्वारा भेजे गए मोटे लिफ़ाफ़े पाते देखता था । दरअसल, ये उस दौर का चलन (ट्रेन्ड) बन गया था तो मैं भी क्यों न शामिल होता!
सो,  मैंने उस पेज से लॉस एंजिल्स की एलिस हेनरी का पता चुन लिया । उसे लिखने के लिए मैंने कीमती लेटर-पैड खरीदा । मुझे याद है मेरे क्लास की एक लड़की ने मुझे लड़कियों का दिल जीतने के लिए एक क्लू दिया था और जिसे खुद उसने भी स्वीकार किया था कि गुलाबी रंग के कागज में लिखी चिट्ठियाँ लड़कियों को बेहद पसंद होती हैं । मुझे भी एलिस का दिल जीतना था सो, मैंने पिंक लेटर-पैड खरीदा, और सबसे पहले लिखा, "डियर पेन-पाल.."। पत्र लिखते हुए मैं ऐसे घबरा गया था जैसे कोई विद्यार्थी अपना पहला इम्तिहान देने जा रहा हो ।

                  मेरे पास कहने को कुछ ज्यादा नहीं था, सो, मैं थोड़ा सा ही लिखकर उसे पोस्ट बॉक्स में डाल दिया, उस समय मेरी हालत ऐसी थी जैसे कोई दुश्मन बंदूक ताने मेरे सामने खड़ा हो ।

एलिस का जवाब उससे कहीं जल्दी आया, जितने दिन मैंने सोचा था । उसने लिखा, “ मैं एक सुखद आश्चर्य में हूँ की कैसे मेरा पता तुम्हारे देश में पेन-पाल वाले कालम में प्रकाशित हुआ, आश्चर्य इसलिए भी क्योंकि मैंने पेन-पाल के लिए माँग भी नहीं की थी । लेकिन कितना अच्छा लगता है ना, किसी अनदेखे, अनसुने व्यक्ति से अपने बारे में सुनना ! खैर, तुम मुझे पेन-पाल बनाना चाहते हो, और मैं हाज़िर हूँ ।
मुझे नहीं मालूम, मैंने तुम्हारा पत्र कितनी बार पढ़ा होगा ! यकीनन, मैं इसे पढ़कर सातवें आसमान में पहुँच गई थी, क्योंकि, तुम्हारे इन चंद पंक्तियों में पूरे जीवन का संगीत छुपा है ।”

मैं चिट्ठियाँ बड़ी ही सतर्कता से लिखता था, ऐसा कुछ भी नहीं लिखना चाहता था, जो उस अमेरिकी लड़की को असहज करे, जिसे मैंने अभी तक देखा भी नहीं था । एलिस के लिए अंग्रेजी उसकी मातृभाषा थी, किंतु, मेरे लिए यह विदेशी भाषा के साथ कष्टकारी भी थी ।
मेरी भावुकता और शर्मीलापन मेरी चिट्ठियों के शब्दों में प्रकट हो ही जाती थी, लेकिन मेरे दिल के किसी कोने में एक रोमांस भी था, जिसे , मैंने पत्रों में सामने नहीं आने दिया ।
एलिस अपने सुन्दर हाँथों से लम्बे-लम्बे शब्द लिखती थी, फिर भी, अपने बारे में थोड़ा-बहुत ही लिखती थी ।

       भारी-भरकम किताबें, पत्रिकाएँ और छोटे-छोटे स्मृति-चिन्ह मुझे भी हज़ारों मील दूरी से आने लगे । मुझे इसमें कोई संदेह नहीं था कि, एलिस एक अमीर अमेरिकी लड़की थी जो अपने आकर्षक गिफ्ट की तरह ही बेहद खूबसूरत थी ।
और हाँ, मेरी भी पेन-फ़्रेण्डशिप औरों की तरह सफल थी ।
फिर भी, एक सवाल मेरे जेहन में बार-बार गूँज रहा था की उसकी उम्र कितनी होगी ? लेकिन एक लड़की से उसकी उम्र पूँछना मुझे अशिष्ट लगा, लेकिन यदि उसकी तस्वीर मंगाई जाए तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं । सो, मैंने एलिस से तस्वीर भेजने के लिए निवेदन किया और आखिरकार उत्तर आया । एलिस ने कहा, उसके पास अभी कोई तस्वीर नहीं है लेकिन वो एक दिन मुझे जरूर भेजेगी । साथ ही साथ उसने कहा, एक एवरेज अमेरिकी लड़की उससे ज्यादा खूबसूरत है ।
क्या यह छुपा-छुपाई का खेल था ? उफ्फ,ये लड़कियों की बातें भी न !
           साल दर साल बीतते गए, मेरी एलिस से बातचीत कम उत्साहित और अनियमित होने लगी लेकिन, एकदम से बंद नहीं । मैं उसे शुभकामना संदेश भेजता रहा जब-जब वह बीमार होती !, क्रिसमस कार्ड और यदा-कदा गिफ़्ट । इस दौरान मैं एक लड़के से व्यक्ति बन गया, नौकरी मिल गई, विवाह हो गया और बच्चे भी । मैंने एलिस के पत्र अपनी पत्नी को दिखाए,  एलिस से मिलने का विचार मुझे और मेरे परिवार को हमेशा रहा आया ।

तब, एक दिन, उपहारों से भरा एक बड़ा पैकेट मैंने प्राप्त किया जिस पर किसी लड़की की हैंडराइटिंग थी । यह मेरे प्यारे अमेरिका से एयरमेल के द्वारा आया था, हाँ, एलिस के शहर से । मैं सोच रहा था कि ये नया पेन-पाल कौन है ? और उस उपहार को बड़े ही आश्चर्य से खोल रहा था, इसमें कुछ पत्रिकाएँ थीं और एक शार्ट-नोट , जिस पर लिखा था, “ एलिस के करीबी मित्र होने के नाते आप उन्हें अच्छी तरह जानते थे, मुझे बताते हुए दुख हो रहा है कि उनकी मृत्यु एक कार एक्सीडेंट में हो गई, उस वक्त वो कुछ खरीददारी करके चर्च होते हुए आ रही थीं, बीते अप्रैल वो 78 साल पूरा कर चुकी थीं । एक तेजी से आती कार को नहीं देख पाईं और एक्सीडेंट हो गया । एलिस मुझे अक्सर आपके बारे में बताती थीं, और जब आपके पत्र आते थे तो बहुत खुश हो जाती थीं, एक अकेले पंछी की तरह थीं वो, जो बस मदद करना जानती थीं फिर,चाहे परिचित हों या अपरिचित, पास हो या दूर ।

          पेन-पत्र की लेखिका ने मुझसे आग्रह किया था कि मैं एलिस की फ़ोटो स्वीकार कर लूँ, जिसे उन्होंने उनकी मृत्यु के बाद मुझे देने को कहा था । यह चेहरा सुंदरता और दयालुता से भरा हुआ था, यही वो चेहरा था जिसके प्रेम में मैं पड़ा था जब मैं एक शर्मिला कॉलेज स्टूडेंट था वो पहले से ही बूढ़ी थीं ।

मूल रचना - जी. श्रीनिवास राव
हिन्दी अनुवाद : विनय एस तिवारी

Wednesday, 14 August 2019

रामघाट, प्रयागराज ( Ramghat, Prayagraj )

राम घाट, प्रयागराज ।

मैंने माँ गँगा के कितने शहरों के कितने घाट घूमे होंगे, लेकिन जो अनूठापन, जो अल्हड़पन मैंने रामघाट में देखा वो कहीं नहीं ।

बनारस के घाट ऐसे हैं जैसे किसी खूबसूरत बगीचे में फूलों की क्यारियाँ, सब कुछ तरतीबी से भरा हुआ ।
निश्चित ही यह आंखों के लिए आनंदित करने वाला होता है, लेकिन इसमें बनावट है, इनमें मानवीय संरचनाओं में ढल जाने के कारण गँगा-जल में रंग जाने की विशेषता ही समाप्त हो गई, इनकी तितीक्षा ही समाप्त हो गई ।

लेकिन, प्रयागराज का रामघाट ऐसे है जैसे हिमालय । या जैसे अज्ञेय का शेखर, जो अपने आप में प्रतिष्ठित है अपनी खूबियों के कारण ।
सब कुछ प्राकृतिक, बनावटी कुछ भी नहीं ।
यूँ तो, प्रयागराज में कोई ऐसा घाट नहीं है जिसमें मानव की शिल्पकला द्वारा घाटों में कुछ क्षेपक रचा जाए । किन्तु फिर भी एक रमणीयता है जो इसे संगम के होते हुए भी जीवंतता से पूरित करती है ।
वर्ष भर रखता है तितीक्षा, इसीलिये तो, सावन के बाद इसे अपने में समाहित कर लेती हैं गँगा ।

ठीक इस घाट के पहले, हरिहर गंगा आरती समिति द्वारा सायंकाल दिव्य गँगा आरती और तब ही आकाश भर चाँदनी की सौंदर्यता, इसके अनूठेपन में लगा देती है ‛चार चाँद’ ।

-- विनय एस तिवारी

इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...