Tuesday, 15 May 2018

प्रेम का सौदागर

 किसी दार्शनिक ने कहा है कि, "दो भाई एक ही पिण्ड के तत्वों से बने होते हैं ,यही कारण है कि वो एकदूसरे की मनःस्थिति को  एक नज़र में ही समझ लेते हैं ।"
मैं मानता हूँ कि अगर टेलीपैथी का अस्तित्व है तो उसका इससे बेहतरीन Example कुछ और नहीं हो सकता ।
    ये जुलाई के फर्स्ट वीक की बात है मैं फर्स्ट स्टैंडर्ड पास करके सेकण्ड में जाने वाला था, मेरे भइया जो उस वक्त 9th
स्टैंडर्ड में थे उन्होंने मेरे लिए होस्टल देख रखा था ।
उनके हॉस्टल से मेरे होस्टल की दूरी लगभग डेढ़ घंटे की थी ।
उन्होंने बताया ।
मुझे अब गांव छोड़ कर शहर जाना था and it was 10 AM when we had to got bus for city.
                           मैं मम्मी को छोड़ कर जा रहा था उस समय मेरे मन में दो बातें एक साथ थीं पहली की मैं रोना चाह रहा था और दूसरी होस्टल की अंजानियत का भय ।
Because whenever I thought about hostel my mind white washed, because I didn't know anything about Hostel.
And also it was the moment when I realized why Brides are weep during go to In-laws house.
मैं हॉस्टल में ही था उस शाम बारिश काफी तेज हो रही थी
मैं रूम में अकेला था क्योंकि मेरा एक मात्र दोस्त मेरा रूममेट घर गया हुआ था ।
हॉस्टल का फ़ोन बजा फ़ोन मेरे लिए ही था मैं वहाँ पहुँचा रिसीवर फ़ोन के बगल में था, मैंने फ़ोन उठाया और हेलो कहा ।
'क्या चल रहा ड्यूड ??' मेरे भइया थे ।
मैंने कहा ठीक है लेकिन आज मुझे अच्छा नहीं लग रहा ।
एक सन्नाटा रह गया हमारे बीच ।
मैं समय काटने के लिए वीडियो गेम खेलने लगा लगभग दो घंटे बाद किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी मैंने सोचा किचन वाले अंकल खाने के लिए बुलाने आए होंगे ।
                   मैं उठा दरवाजा खोला सामने मेरे भइया खड़े थे । उनका पूरा शरीर भीग चुका था , हाँ.. जो चीज नहीं भीगा था वो था भड़भूँजे के यहाँ का चना और मिर्ची की चटनी ।
मैं कुछ देर तक खड़ा रहा , मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस मेरी आँखों से आंसू निकल रहे थे ।
उस दिन मुझे एहसास हुआ कि चित्रकूट में श्री राम से मिलकर भरत को कितनी आनंददायी अनुभूति हुई होगी ।

विनय एस तिवारी

Friday, 20 April 2018

उफ़्फ़ ! बड़ी वाचाल होती हैं किताबें


जमानेभर के किस्सों का गवाह अगर कोई है, तो वो हैं किताबें
अगर पढ़ने का सिलसिला शुरू कर दिया जाए तो इनकी बातें ख़तम ही नहीं होती..
एक कारवाँ सा चल पड़ता है किस्सों का, कहानियों का ।
किताबें आपके किसी प्रश्न का उत्तर नहीं देतीं वरन् आपको उस कहानी में साक्षी की भाँति प्रस्तुत कर देंगी फिर ये निर्णय आप पर छोड़ देती हैं कि आप अनुभव क्या करते हैं..!
और उस अनुभव से क्या सीखते हैं यह आप पर निर्भर है..।
किताबें ही हैं जो आपको समय के पार पहुँचा देती हैं.. इससे दिलचस्प बात क्या होगी कि कहानी, किताब किसी भी 
समय की सुनाए, आपको उस काल, परिस्थिति में ज्यों का त्यों उतार देती है..।
किताबें एक जगह बैठे बैठे कितने ही दिलचस्प स्थानों में पहुँचा देती हैं, और हम महसूस करते हैं कि हम उस स्थान में बैठ कर उस अमर कहानी का हिस्सा हैं ।
हाँ.. अमर कहानी ! क्योंकि जिस कहानी को किताबों ने आत्मसात कर लिया, फिर अमर हो जाती है वो कहानी ।

किताबें बारिश की पहली बूँदों के उस अभिनवपन को घर बैठे  महसूस करा देती हैं.. जिसे आप कभी न कभी महसूस कर चुके होते हैं । उन्मुक्त आकाश में चाँद की सहचरी चाँदनी से नहला देती है हमें बिस्तर में लेटे-लेटे । यदा-कदा हम पाते हैं कि पढ़ते-पढ़ते हमारी आंखें भीग जाती हैं , हम बेचैन हो उठते हैं किस्सों में किरदारों की परिस्थितियों से ।
ज़िन्दगी के तमाम फलसफों को खुद में समेटे रहती हैं ये किताबें ।
... बस शर्त एक ही है कि आपको एक बेहतरीन श्रोता होना चाहिए..
फिर सफर में यूं लगता है जैसे ट्रेन के सामने वाली बर्थ में बैठी प्रेमिका आपको सुना रही हो अपनी पिटारी से किस्से-दर-किस्से और आप बड़े चाव से सुनते जाते हैं उन कहानियों को ।

एक बार मूड बना कर बैठिये किसी किताब के साथ उससे बात करिये फिर वो उकेर देगी तमाम फलसफों को आपके सामने ।
अगर आपको साथी की तलाश है तो बैठ जाइए किसी लाइब्रेरी में खिड़की के पास, या फिर चाय के साथ घर के ही बॉलकनी में और डूब जाइये किस्सों की जादुई दुनियाँ में ।

[ ' किताबें भी बहुत कुछ बोलती हैं  जरूरत है तो बस एक दोस्ती की ।'
किताबों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये आपके तौर-तरीके, लहज़े, सोचने के नज़रिये को प्रभावित करती हैं , सच पूँछिये तो ज़िन्दगी की किसी भी स्थिति से उबरने का एक सशक्त टीका (वैक्सीन) हैं ये किताबें ।
...फिर आप ऊब सकते हैं ( हालांकि संभावना अत्यल्प है ) परन्तु किताबें बोलने से बाज नहीं आएंगी कभी ।
सच में ! बड़ी वाचाल होती हैं किताबें ।

© विनय एस तिवारी

Tuesday, 10 April 2018

याज्ञक (भाग-1)



हज़ारों साल पुरानी गंगा अपनी पवित्रता और शून्यता समाए हुए उस दिन भी बह रही थीं..।

समय ईसा के पाँच सौ साल पहले का है.. प्रयाग की पुण्य भूमि और माँ गंगा के तट पर शिष्य 'याज्ञक' अपने गुरु की दीक्षा के अनुसार गंगा की लहरों को महसूस करने की कोशिश कर रहा था.., बार-बार उसे उसके गुरु ऋषि श्रेष्ठ भारद्वाज के शब्द याद आ रहे थे कि " इतने शून्य हो जाओ कि स्वयं के अस्तित्व को महसूस कर सको, शून्य में होना ही विराट में होना है , जब तुम्हारी आवृत्ति गंगा की आवृत्ति से मेल करेगी तब तुम स्वयं में महसूस कर सकोगे गंगा को.., और तुम्हारी आत्मा पवित्र हो सकेगी.., और यहीं से शुरू होगा तुम्हारी नियति तक पहुँचने का मार्ग ।



         शिष्य बैठा रहा ध्यानमग्न होकर सुबह के बैठे सांझ हो गई, सूर्य अस्ताचल की सीमा तक पहुंच गया और हवाएँ एक लय से बहने लगी थी ।
गुरुदेव ठीक कहा करते थे कि "जब तुम प्राकृतिक होने लगते हो तो समूची प्रकृति तुम्हारे साथ हो जाती है..।"
वह अब पूरी तरह शांत हो चुका था, गंगा के कलरव को स्वयं में महसूस करने लगा था । जैसे वह भी आंदोलित हो उठा था वह एक स्वर्गीय आनंद में खो गया ।
उसे दिखाई देने लगा एक गाँव जो चारों ओर से जंगलों से घिरा है.. कुछ विशेष आकृतियों वाले मृदभांड ।
और सुनाई थी एक लड़की के हँसने की आवाज़ !!

.......क्या यही उसकी नियति है..? या वहाँ तक पहुँचने के सफर में उसकी नियति है !!!
यही सवाल लेकर याज्ञक चल पड़ता है अपने गुरु के पास....।
क्रमशः
--- विनय एस तिवारी

Sunday, 18 March 2018

एक रात में, जब मैं भी था.. और तुम भी थी








उस दिन अपने घर के सामने वाले पार्क में देर रात तक बैठे थे हम-दोनों ।
कदाचित पता होता ये हमारी आखिरी मुलाकात है..!
जब देर रात घरों की रोशनी बुझ चुकी थी तब चाँदनी पूरे शहर के साथ अपने पार्क में भी दस्तक दे चुकी थी और मन के कहीं आखिरी छोर में दबा विषाद उभर आया था ।
चाँदी सी फैली ये चाँदनी तारों के अस्तित्व को ओझल न कर सकी थी.. ।
उस दिन सितारों की ओर देखते हुए तुमने कहा था, ' ये वही आसमान है जो कई अरब साल से है लेकिन इसकी ज़द में आने वाले कितने सितारे टूट चुके थे और न जाने कितने सितारे उन सितारों की जगह ले चुके थे । लेकिन इनमें होने वाली बदलाहट हम नहीं देख सकते न..?'
इस गतिशील और नश्वर संसार में कदाचित हम जिस परमाणु से बने हैं वो उन टूटे सितारों का हिस्सा हो !
' हाँ..। मैने गहरी सांस लेते हुए कहा ।
और क्या पता, हम दोनों का अस्तित्व एक ही पदार्थ से हुआ हो ! तभी तो हम एक दूसरे के करीब हैं..एक दूसरे के अंतर्भाव को समझ पा रहे हैं । तुम्हें पता है...? बहुधा हम जो देखते हैं उसे ही सच मानते हैं , लेकिन जरूरी नहीं कि हम जो देख रहे हैं वही सच हो । जैसे ऊपर सितारों को देखो ये सभी गतिमान हैं लेकिन हम इन्हें गति करते नहीं महसूस करते ।
' और संभवतः दो प्यार करने वाले भी एक ही तत्व के हिस्से होते हों, है न ? - मैं उसकी बातों में खोए हुए अनायास पूँछ बैठा ।
शायद, मुझे लगता है इन्हें ही सोल-मेट कहते हैं । उसने कहा ।

.......और आज दस साल बाद मैं फिर उसी पार्क में बैठा हूँ,
फिर उसी चांदनी की बरसात बेतहासा हो रही थी लेकिन सितारों के वजूद को मिटाने में हमेशा की तरह नाकामयाब ।
मैं सोच में डूबा एक दृष्टा बनकर आसमान को एकटक देख रहा था तभी एक टूटा हुआ सितारा मैंने अपने सामने से गुजरते देखा जो चमक कर फिर अदृश्य हो गया ।

 【अब यकीन है मुझे ये टूटा हुआ तारा गवाह है तुम्हारे और मेरे अस्तित्व का.. तुम्हारे और मेरे बीच प्रस्फुटित प्रेम का ।
और शायद इस बात का कि तुम्हारे ज़िस्म के अणु रूपांतरित हो चुके हैं फिर से किसी तारे में ।】

-- Vinay S Tiwari
"[ चित्र : नेट से साभार ।]

Monday, 5 March 2018

उस दिन की तरह


हर साल की तरह आज भी ऑफिस क्रिसमस पर बन्द थी सो आज आठ बजे सो के उठा जितनी गहरी नींद सुबह के तीन घंटे लगती है अच्छा थका होने पर भी उतनी अच्छी नींद नहीं लगती...
अगर खिड़की से सूरज कमरे में दाखिल न होता तो शायद दस या ग्यारह बज गए होते.... खैर..!अब फ्रेश हो कर चाय बनाने जा रहा हूँ...खाना बनाने के लिए तो मैंने बाई लगाई है..
लेकिन चाय मैं सिर्फ अपने हाँथ की बनाई पीता हूँ या फिर मम्मी की...। हाँ..एक समय था जब एक और हाँथ की बनाई चाय मैं पीता था..। धीरे धीरे चाय खौल कर लाल हो रही थी..
कि अचानक डोर वेल बजने लगी....
कम्बख्त कौन आ टपका...! मैं बुदबुदाते हुए दरवाजे की और लपका ।
सर व्योमेश चंद्र आप ही हैं..?
हाँ...'
आपका लेटर आया है यहाँ साइन कर दीजिए..

.......तो कॉलेज में एल्युमिनी मीट है...इसी तीस तारीख को..?

मैं व्हाट्सएप् के कॉलेज फ्रेंड्स ग्रुप में देखने लगा की कौन कौन आ रहे हैं.. 😶😶

ओ तेरी....!! चाय तो पूरी छनक गई होगी..
कहते कहते मैं दौड़ा...

बैठे बैठे मैं एक एक चेहरे को याद कर रहा था.. पुनीत जो खुद से लंबी गर्लफ्रेंड बनाया था...
ए से शुरू होने वाले नाम गिन रहा 'अभी'...उसके पीछे तो लड़कियाँ मर मिटने को तैयार रहती थीं..
क्योकि वो बहुत हैंडसम सा और शेरो -शायरी का शौक़ीन..
शायरी मैं भी करता था लेकिन लड़कियों से घुला मिला नहीं था ..या यूँ कहूँ की मेरी शायरी दोस्तों तक सीमित थी..
दूसरी बात यह थी की मैं खूबसूरती को देखने वालों में से हूँ..
उसे छूना या अपनाना नहीं चाहता था..
मेरे लिए ताज़महल और खूबसूरत चेहरा एक बराबर थे...

लेकिन कुछ ही दिनों बाद मैं अपने इस सिद्धांत पर नहीं टिक पाया...
निष्ठा.....!!!! क्या वो भी आएगी..????
ये सवाल मेरे अंदर के उभरे खालीपन ने मुझसे पूँछा..।

                     चार साल पहले

उस दिन वेलकम पार्टी में मैं लगभग आधे घंटे लेट पहुंचा..
लगभग दौड़ता सा.. निराला सभागार पहुँचा ।
अरे ! ये तो खाली पड़ा है..कोई दिख नहीं रहा..
मैं हाँफते हुए सोच रहा था और बैठ गया..
 कुछ देर बाद मैं उठ कर ग्राउंड की तरफ गया...

ओह्हो.. तो महफ़िल यहाँ सजी है...!
मैंने कहा..
हे ड्यूड ! कहाँ भूतनी से घूम रहे..शुभम मेरी ओर आते हुए कहा ।
चल एक एक पैग लेते हैं...उसने मेरे कंधे पर हाँथ रखते हुए कहा..
नहीं यार.. तू पी ले मैं नहीं पिऊँगा.. मैं ऋषि सर से मिल लेता हूँ..
ऋषि सर हमारे सीनियर थे..
क्या सर ...बताओ ये जाम को मना कर रहा.. शुभम ने ऋषि सर से कहा ।
क्यों भाई..व्योमेश शैम्पेन को शराब कह कर उसकी बेज्जती मत करो । उन्होंने डायलॉग मारा
मैंने देखा एक बड़ी  सी टंकी फुल थी..व्हिस्की से ।
चलते चलते मैं अपने जेब से निकाल कर घड़ी पहनने लगा..
घड़ी निकलने के चक्कर में कुछ पैसे और कागज़ ज़मीन पर गिर गए..और हवा से कुछ दूर निकल गए...उन दिनों मैं वॉलेट लेकर नहीं चलता था..था ही मैं बे-तरतीब सा ।
"तुम कितने लापरवाह इंसान हो..मैं झुक कर अपना पैसा उठा रहा था तभी ये मीठी आवाज़ सुनाई दी ।
देखा तो मेरा पचास को नोट उसके चार इंच ऊँची सेंडल के पास पड़ा था ।
पता नहीं ये लड़कियां पाँच मंजिल ऊँची सैंडिल क्यों पहनती हैं..!! मैंने उसे देख कर कहा...
फिर मैं उसकी तरफ देख कर बेशर्मी से मुकुरा दिया..☺।
मेरी मुस्कुराहट बंध सी गई..मैं लगातार उसकी ओर देख रहा था..उसकी आँखे काली काली काफी बड़ी लग रही थीं..कान में नीचे व्ही(V) आकार में लड़ी लगी बालियाँ... जिन्हें देख कर मैं  V फॉर व्योमेश के लड्डू फोड़ने लगा था ..उसके होंठ जो काफ़ी चमक रहे थे.शायद होंठो पे कुछ चमकीला लगाई थी ।सफ़ेद टी-शर्ट के ऊपर ब्लैक कोट और क्रीमी टाउज़र पहन रखा था उसने ..और इस ड्रेस में खुले बाल.. जिनमें आधे दाएं कंधे से आगे की ओर की थी.. और चार चाँद लगा रहे थे ।
सच कहूं तो बला की खूबसूरत लग रही थी..
जैसे कोई आसमानी हूर हो ।
                   
                                  #आज फिर
 
            मैं इस बीते कल से बाहर निकला... आज फिर व्हिस्की पीने का मन करने लगा...
 मेरे सामने व्हिस्की की दो बोतलें रखी हैं..मैं और शुभम दोनों पुणे के कोरेगाँव पार्क में बैठे हैं..
सामने दो बॉटल व्हिस्की की खाली पड़ी हैं...मैं बैठा हूँ कुर्सी में सिर रखे...शुभम को बाथरूम गए बहुत देर हो गया लगता है..
मेरी हालत भी उठने की नहीं है फिर भी मैं बाथरूम तक गया ..
ये क्या...! तू अभी तक सुसु कर रहा है..? -मैं हैरान होते हुए पूँछा ।

यार कुछ कुछ देर में फिर लग आती है..कौन आए वहां से बार बार..
मैं हँसने लगा बहुत जोर से..
यहाँ मेरी लगी पड़ी है और एक तू है कि हँस रहा है...? शुभम भी हँसते हुए पूँछ रहा था ।

  क्रमशः
©Vinay S Tiwari

Sunday, 25 February 2018

नशा करना ही नशा करना है लेकिन..,


नशा करना ही नशा करना है, लेकिन..
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उमर खैयाम तो सदियों पहले ही अन्योक्ति में नशा का उल्लेख कर चुका है, तभी तो उसने संसार को मयकदा,
व्यक्ति को शराबी (मयकश), और सांसारिक प्रसाद को मय बताया ।
यदि हम और गहरे जाएँ तो सांसारिक प्रसाद ईश्वरीय प्रसाद में परिणित हो जाता है.. और ये बातें अंगूर की शराबों से ऊपर उठ कर एक पराभौतिक, प्राकृतिक नशे का संकेत करती हैं ।
कोई व्यक्ति किसी भी नशे में नहीं बहकता वरन वह नशे के नशे में बहकता है..
मैंने अनुभव किया कि यदि नशे में होते हुए मानसिक तल पर होश रखा जाए , एक दृष्टा बना जाए तो एक नया और अचंभित करता अनुभव प्राप्त होता है ,
फिर आप एक बेहतरीन श्रोता बन जाते हैं, सारे प्रश्न मिट जाते हैं कोई प्रश्न शेष ही नहीं बचता । यही मन के समर्पण की सूचना है ....
तब आप स्वयं को प्रकृति को सौंप चुके होते हैं.. मन खाली हो जाता है तब प्रकृति भरती है आपके खालीपन को ईश्वरत्व से ।

© Vinay S Tiwari

Wednesday, 21 February 2018

शबनम, चाँदनी और तुम



अभी-अभी तो शबनम घास की बाहों में ठहरी है..
और अभी पूरा चाँद भी निकल आया है , और देखो.. इसकी चांदनी इन ओस की बूंदों में ऐसे चमक रही है जैसे तुम्हारे आने की खुशी में नैसर्ग ने हजारों दीपक जला रखे हों...
तुम्हारे वनवास से लौटने की खुशी में,
हाँ.. इन्हीं शबनमी दीपकों के दरम्यां बैठा हूँ मैं ! तेरी झूठी इन्तज़ारी में ..........
# और_तुम_आओ
Vinay S Tiwari

इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...