Wednesday, 14 August 2019

रामघाट, प्रयागराज ( Ramghat, Prayagraj )

राम घाट, प्रयागराज ।

मैंने माँ गँगा के कितने शहरों के कितने घाट घूमे होंगे, लेकिन जो अनूठापन, जो अल्हड़पन मैंने रामघाट में देखा वो कहीं नहीं ।

बनारस के घाट ऐसे हैं जैसे किसी खूबसूरत बगीचे में फूलों की क्यारियाँ, सब कुछ तरतीबी से भरा हुआ ।
निश्चित ही यह आंखों के लिए आनंदित करने वाला होता है, लेकिन इसमें बनावट है, इनमें मानवीय संरचनाओं में ढल जाने के कारण गँगा-जल में रंग जाने की विशेषता ही समाप्त हो गई, इनकी तितीक्षा ही समाप्त हो गई ।

लेकिन, प्रयागराज का रामघाट ऐसे है जैसे हिमालय । या जैसे अज्ञेय का शेखर, जो अपने आप में प्रतिष्ठित है अपनी खूबियों के कारण ।
सब कुछ प्राकृतिक, बनावटी कुछ भी नहीं ।
यूँ तो, प्रयागराज में कोई ऐसा घाट नहीं है जिसमें मानव की शिल्पकला द्वारा घाटों में कुछ क्षेपक रचा जाए । किन्तु फिर भी एक रमणीयता है जो इसे संगम के होते हुए भी जीवंतता से पूरित करती है ।
वर्ष भर रखता है तितीक्षा, इसीलिये तो, सावन के बाद इसे अपने में समाहित कर लेती हैं गँगा ।

ठीक इस घाट के पहले, हरिहर गंगा आरती समिति द्वारा सायंकाल दिव्य गँगा आरती और तब ही आकाश भर चाँदनी की सौंदर्यता, इसके अनूठेपन में लगा देती है ‛चार चाँद’ ।

-- विनय एस तिवारी

Friday, 26 July 2019

मानव ने जितना विकास भौतिक विज्ञान का किया है उतना वैचारिक विज्ञान का नहीं ।

मानव ने जितना विकास भौतिक विज्ञान का किया है उतना वैचारिक विज्ञान का नहीं ।

सोलहवीं सदी के बाद भौतिक विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की । प्रत्युत जो भी मानवीय साम्य वैदिक युग या उसके समकक्ष की संस्कृतियों में था और निरंतर चला आ रहा था, वह बौना रह गया । क्योंकि हमने साधन का तो उत्कट विकास किया किन्तु साधन को साधने वाले के मानसिक या वैचारिक विज्ञान पर रंच मात्र भी दृष्टि नहीं डाला, परिणामतः हम भौतिक साधनों और उससे प्राप्य सुखों के हाँथों नाचने वाली कठपुतली बनते दृष्टिगोचर हो रहे हैं ।
किसी भी मानवीय क्रिया का बीज विचार में ही छुपा होता है । और जब भी वैचारिक विज्ञान को गौण बना कर मात्र भौतिक विज्ञान पर विमर्श किया जाए और  उसे पोषित किया जाए तो अवश्य ही यह यात्रा मानव के यंत्र होने की प्रक्रिया का आरंभ है ।

यही उत्तरदायी है हमारी मानसिक रुग्णता पर ।
समाज में जिस कदर अनैतिक क्रियाकलापों की उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है, दिनों-दिन छोटी-छोटी बातों पर आत्महत्या में वृद्धि, बलात्कार जैसी कुत्सित क्रियाएँ हो रही हैं, इन सब घटनाओं के गर्भ में कहीं न कहीं यह प्रश्न आकर ठहर जाता है कि, आखिर श्रेष्ठ सभ्यता के नाम पर क्या उपलब्धि हासिल की हमने ?
हमारे मानवीय लक्ष्य क्या हैं ? और उसके लिए क्या कदम उठाए गए ?

वस्तुतः ये घटनाएँ हमारी सामाजिक उन्नति पर ही प्रश्न चिन्ह लगा रही हैं तथा उन्नति के मापदंडों के पुनरावलोकन के लिए आगाह कर रही हैं कि क्या वास्तव में हमने प्रगति की है ?
क्या हमने सभ्यता का विकास किया है ?


मैं तो स्वयं को निरुत्तर पाता हूँ, जब मैं दर्शनशास्त्र जैसे विषय, जिसे सुकरात और अरस्तु कहते हैं कि यह सभी विषयों का विषय है का अध्ययन करता हूँ तो उसमें हमारे दार्शनिक इसे भौतिकी और गणित बनाने पर तुले हैं !!
वैचारिक ज्ञान को भौतिक विज्ञान बनाने में संघर्षरत हैं ।
वो नही जानते कि वो समष्टि को व्यष्टि बनाने की कोशिश में हैं ।

कहा जाता है कि इसे गणित जैसा निश्चित और शुद्ध शास्त्र बनाना है !
जिस शास्त्र की गणित खुद उपज रही हो वो अब गणित बनेगा ?
और वो गणित जो स्वयं के प्रश्नों पर निरुत्तर हो जाता है ? वह गणित जो स्वयं अनिश्चितताओं का भंडार है !
कैसे, मैं आपको बताता हूँ ।  √-25 ( करणीगत ऋणात्मक पच्चीस) का मान निकालने में गणित अनिश्चित हो जाता है । सौ में तीन का भाग देने पर निश्चितताओं से भरा गणित अनिश्चित हो जाता है, ऐसे अनेकेन उदाहरण भरे पड़े हैं ।

पुनश्च, यदि वैचारिक विज्ञान को पुष्ट न किया गया तो निश्चित ही हम पूर्णरूपेण मानसिक रुग्णता से ग्रस्त हो जाएंगे । हम अपनी जीवंतता को खो देंगे । और पूर्णरूपेण वशीभूत हो जायेंगे भौतिक सुख देने वाली मशीनों के ।।
इति ।
विनय एस तिवारी

चाँदनी रात हो एक नदी पास हो । chandni rat ho ek nadi pas ho

चाँदनी रात हो, एक नदी पास हो ,
और तुम साथ में हो तो क्या बात हो !
आसमाँ चाँदनी, वो नदी चाँदनी,
और तुम चाँदनी हो तो क्या बात हो !

चाँदनी का गमन, बालों से लौट कर,
देह से ज्यों लगे चाँदनी लौट कर,
तुम लगो चंद्रमा सी तो क्या बात हो !
बालियों से प्रकीर्णित हुई चाँदनी,
तुम्हारी शोखी तुम्हारा हर एक कृत्य भी,
शशि-कला जो दिखाए तो क्या बात हो !
चाँदनी रात हो, एक नदी पास हो ,
और तुम साथ में हो तो क्या बात हो !

पूर्णिमा की अनघ चाँदनी सा बदन,
ज्यों किताबों में बनता है शब्दों से तन,
तुम्हारी पायल का रुन-झुन सा स्वर सुरमयी,
शोर हो बारिशों का यथा मधुमयी,
चाँदनी रात में गाँव से दौड़ कर,
फिर नदी पर तुम आओ तो क्या बात हो !
चाँदनी रात हो, एक नदी पास हो ,
और तुम साथ में हो तो क्या बात हो !
-- विनय एस तिवारी

Thursday, 30 May 2019

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग-दर्शन

                        ओम्कारेश्वर मंदिर से लावण्यमयी प्रकृति का सौंदर्य

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग जाने के बाद मेरे मन में मलाल रहा कि, मैं यहाँ वर्षाकाल या उसके अल्प उपरांत क्यों नहीं आया ?
क्योंकि ग्रीष्म की तपन में जब अतींद्रिय अनुभूति है, तो जब प्रसूता प्रकृति अपने वत्सलता और सौभाग्य  के वसंतावस्था में होती होंगी, तो वो परिदृश्य कितना मुग्धकारी होगा! कितना अतींद्रिय होगा, इसकी अनुभूति मात्र की जा सकती है ।
माँ नर्मदा से श्री ओम्कारेश्वर मंदिर 

और तिस पर या तो सभी तीर्थों के जल, या तीर्थराज के जल से अभिषेक यूँ प्रतीत होता है जैसे प्रभु स्वयंभू के शिखर पर स्थित चंद्रमा की दीप्ति और नवल हो गई हो ! या जैसे प्रकृति-सुता नर्मदा के साथ माँ गँगा का मिलन उन्हें पवित्रता की सीमा के पार ले गया हो ।

ये तो प्रभु की मर्जी थी कि बिना पूर्व-योजना के मैं इंदौर गया और वहाँ से ओम्कारेश्वर महादेव ।
हम कार से वहाँ गए थे । पहुँचने के बाद सबसे पहले स्नान करना था माँ नर्मदा में । हमें तो कोई जानकारी थी नहीं तो हम कहीं भी स्नान कर सकते थे किन्तु, महराज ( मिश्रा के जीजा) पहले भी आ चुके थे सो उन्हें पता था कि ‛नागर घाट' स्नान के दृष्टिकोण से श्रेष्ठ घाट है सो हम नाव के द्वारा उस घाट तक गए, रास्ता पैदल भी रहा होगा किन्तु हमें तो सांझ तक लौटना था सो हम नाव के द्वारा ही गए ।

उस घाट की एक बड़ी विशेषता है कि स्नान के लिए नर्मदा के ठीक किनारे घाट से लगी एक दीवाल उठा दी गई और उस पर तीन-चार पाइप लगे हैं जिनसे उस स्नान घाट पर पानी आता है और दूसरे छोर से पाइप से ही निकल जाता है । यह एक प्रकार से सुरक्षित घाट है ।
स्नानोपरांत इस घाट से स्वयंभू के दर्शन को हम नाव से निकल पड़े जो नर्मदा माँ के दूसरे छोर में है । यद्यपि जाने का रास्ता प्रशासन ने पुल के द्वारा भी बनवाया है किंतु स्नान के उपरांत पर्वत पर ऊपर चढ़ना ग्रीष्म ऋतु में तो कठिन है ।

                                   मंदिर की दीवालों पर शिल्प

अहा! मंदिर की शिल्पकला ही मन मोह लेती है एक पहाड़ पर इतनी कुशलता से बना ये मंदिर कई हज़ार साल पुराना हो सकता है ।
इस मंदिर का भी गर्भगृह छोटा ही बना है जैसा बहुधा ज्योतिर्लिंगों में होता है ।
मंदिर ऊपर तल में है तथा नीचे तल में शिव-पूजा यानी महामृत्युंजय पाठ, भगवान शिव का अभिषेक होता है ।

हमने प्रभु का तीर्थराज प्रयाग के जल से अभिषेक किया, मैं मांगना कुछ भी नहीं चाहता था किंतु फिर भी अनायास समाधि की लालसा उठ गई। प्रभु के प्रांगण में पहुँचने मात्र से रोम-रोम रोमांचित हो उठते हैं ।
विदा के पल मन में एक लालसा फिर उभर आती है कि प्रभु फिर बुलाना मुझे ।

- विनय एस तिवारी

Saturday, 6 April 2019

एक पत्र लिखना चाहता हूँ मैं ।



हाँ, मैं एक पत्र लिखना चाहता हूँ, ये दौर पत्र का तो नहीं ! इस रफ्तार भरी दुनियाँ में किसको इंतज़ार पसंद है ? लेकिन पत्र तो इंतज़ार चाहते हैं ना !
आपके हाथों से छूटने के बाद जाने कितने रास्तों से गुज़र कर , कितने हाथों को छूते हुए आखिर में पहुँचता है उस हाँथ तक, जो उसकी मंजिल है ।
तब जा कर मुकम्मल होता है उसका सफ़र, और कभी-कभार भटक जाता है रास्तों में, और  फेक दिया जाता है `डेड लेटरों' वाले कंपार्टमेंट में ।
डेड लेटर, ऐसे पत्र होते हैं जिन्हें लिखने वाले ने सही पता नहीं बताया होता या फिर, वो जिसे पढ़ना है बदल देता है अपना घर, बिना इस परवाह के कि शायद किसी दिन कोई पत्र आ गया तो !


तो,मैं भी पत्र लिखना चाहता हूँ लेकिन किसे ?
इसका कोई सटीक जवाब तो मेरे पास नहीं है लेकिन पहला पत्र, मैं स्वयं को लिखना चाहता हूँ ।
मैं खुद को देखना चाहता हूँ कि अपनी दृष्टि में किसी और के स्थान से कि कैसे दिखता हूँ मैं ? वस्तुतः मैं एक दृष्टा बनना चाहता हूँ ।
मैं खुद को एक बार अपने बारे में बताना चाहता हूँ, मैं खुद को बताना चाहता हूँ कि मैं देखना चाहता हूँ पहाड़ों का सौंदर्य, मुझे क्यारियों में सुसज्जित बाग नहीं पसंद है मुझे तो भाता है हिमालय का बेतरतीबीपन, उसका सन्नाटा सम्मोहित करता है मुझे ।
मैं जानना चाहता हूँ कि कैसे सूर्य की पहली किरण आ कर छूती है धरती को, और धरती खिल उठती है जैसे किसी पुरातन ग्रामीण भारतीय नारी के प्रिय का पत्र, आखिर आ गया हो प्रत्युत्तर लेकर परदेस से, जिसके शब्दों में गंध होती है उससे मिलने के चाह की, और शहर का जिक्र पढ़ कर कौंध उठती है उस नारी की आँखें, या फिर किसी कोने में कौतूहल होता है उसे भी उसके साथ शहर देखने का ।

या फिर, जैसे किसी ध्यानी में समाधि में उतरती हैं ब्रह्म की किरणें और इठला पड़ता है वह उस गज़ब के अनुभव से, ऐसा अनुभव जिसे डिस्क्रिप्टिव मेथड से नहीं समझाया जा सकता उसके लिए अनिवार्य है उसको प्रत्यक्ष करना ।

फिर एक पत्र लिखना चाहता हूँ मैं सभी लेखकों को,
उनकी पुस्तक लिखने के लिए । लेकिन उसमें मैं सिर्फ एक शब्द लिखना चाहता हूँ, " धन्यवाद " ।

एक पत्र मेरे ज़िन्दगी में आने वाली पहली लाईब्रेरी, रीवा की सेंट्रल लाइब्रेरी को । शायद वही थी जिसने मुझे रूबरू कराया किताबों से ।

मैं और भी पत्र लिखना चाहता हूँ एक लम्बी फेहरिस्त है । मैं बिना जवाब के इंतज़ार के लिखना चाहता हूँ बस इस बात के लिए कि मेरी ज़िंदगी मे आने के लिए " धन्यवाद " ।

Thursday, 14 March 2019

ग्रीष्म ऋतु की रात्रि का आकाश

                 ग्रीष्म ऋतु की रात्रि का दृश्य

ग्रीष्म ऋतु शब्द आते ही उमड़ पड़ती है एक हवा यादों की । ऐसे लगता है जैसे एक-एक याद हवा बनकर किसी झील के पानी को छूते हुए मुझ तक आ रही है क्योंकि मैं महसूस कर रहा हूँ यादों में ठंडक ।
मुझे सबसे पहले याद आती हैं छुटपन में ग्रीष्म की छुट्टियों में शहर से घर आगमन, फिर ग्रीष्म में ही कहीं 'टूर' पर  दोस्तों संग बिताई गई रातें और श्रृंखला बन पड़ती है यादों की ।


तो मैं कहने जा रहा था कि ग्रीष्म ऋतु की रात्रि का आकाश इतना आकर्षक होता है कि लगभग हर कोई आकर्षित होता ही है भले ही कौतूहलवश या फिर सौंदर्यवश । ग्रीष्म की रात्रि का आकाश अक्सर साफ होता है यदा कदा कुछ छुट-पुट बादल मिल जाते हैं किन्तु बहुधा साफ ही होता है तिस पर चाँदनी रात का चाँद और उसके बेहद करीब रहने वाला सितारा  उस पर चार चाँद लगा देते हैं । सितारा चाँद से इतना दूर होता है जितना किसी छोटे लड़के का सौंदर्य और उसके डिठौने की दूरी, इतना कि किताब के शब्द और पाठक के आनंद के बीच की दूरी, इतना कि किसी प्रेमिका के सौंदर्य और उसके दाएँ गाल के ठीक नीचे बना तिल । जो चाँद के सौंदर्यता को और सुशोभित करता है , बढ़ा देता है उसकी सौंदर्यता ।
और किसी किसी दिन अपनी मंदाकिनी की रेखा उस दृश्य को चित्रकार को कैनवास पर उकेरने पर मजबूर कर देती है या फिर किसी को बना देती है खगोल-विज्ञानी ।

इन तारों से भरे आकाश के तले सोने का सुख अद्वितीय होता है क्योंकि तब बरसती है चाँदनी और आधे जगत को चाँदी के बर्क में उतार देती है , बना देती है इस आधी धरती को चाँदी का ।

Friday, 22 February 2019

कहा न मुझे नहीं रास आतीं दीवारें

कहा न ! मुझे नहीं रास आतीं नक्काशी से सुसज्जित दीवारें । मुझे तो रास आती हैं प्रकृति की लावण्यमयी सौंदर्यता ।
मुझे रास आते हैं ऐसे शहर जो प्रकृति की गोद में समाए होते हैं जैसे सतपुड़ा की गोद में ' पचमढ़ी ' ,
जैसे पहाड़ों से घिरा सीधी ,और जैसे मेरा गाँव ।

जैसे अमरकंटक, जहाँ चौबीसों घंटे नर्मदा की कल-कल का सप्तसुरी संगीत तारतम्यता से बजता हुआ आपके कर्णपटलों में पहुँचता है और आप अनायास एक स्वर्गीय संगीत में सुधि खोकर खो जाते हैं । जहाँ पहुँचते ही कल्पनाओं से जेहन में उतरकर सच लगने लगती है नर्मदा और सोन की कहानी ।
जहाँ प्रेम यथार्थ में परिणित होकर दिला जाता है राधा कृष्ण के प्रेम की मधुर याद । जहाँ जनश्रुतियाँ साँस लेती दंतकथाओं के यथार्थ से ऐसे रूबरू होती हैं जैसे हमने भी तो देखा हो इन्हें हूबहू इन्ही कहानियों की तरह ।
वस्तुतः हम समा जाते हैं इन जनश्रुतियों के किरदारों में या ये कहूँ की हम किरदारों में जीने लगते हैं ।

दीवारें तो बस गवाह होती हैं किसी कहानी की किन्तु ऐसी जगहों में आप किरदारों को स्वयं में जीवित पाते हैं ।
आप स्वयं के करीब होते हैं , सौंदर्य के नित नए प्रतिमानों से सुसज्जित ये प्रकृति शिरोमणि दिला जाते हैं नई वजहें खुद में जीने की ।

-- विनय एस तिवारी
 
     "ग्रीष्म ऋतु में मैहर के एक प्रपात में 2006"        

इत्यलम् (मेरी डायरी)

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