Thursday, 3 January 2019

बात उनदिनों की जब मैं दसवीं में था


नवीं के ठीक बाद,
..जुलाई से हमारी कक्षाएँ आरम्भ हो चुकी थीं । हमारा सेक्शन सी ही था
और सबसे दिलचस्प बात ये थी कि हमारे क्लास टीचर श्री आई.एस. डी. सर थे । क्लास की दिनचर्या वही थी कि प्रार्थना के बाद क्लास में अटेंडेंस ली जाती थी, फिर क्लासेस शुरू ।
जैसा पहले ही बता चुका हूँ कि हम पूरी पीरियड नहीं अटेंड करते थे । ये परंपरा हमने नहीं बल्कि हमारे सीनियर्स ने आरम्भ की थी ।

हमें ये लगता था कि श्री आई एस डी सर को मेरा नाम तो न ही पता होगा क्योंकि न तो हम इंग्लिश के टॉपर थे और न ही इतने वाचाल किस्म के थे ।
लेकिन आश्चर्य मुझे उस दिन हुआ जब मैं रफ से खुद को हवा कर रहा था तो सर ने कहा " विनय इतनी गर्मी नहीं लग रही क्लास में !!"
मेरे लिए क्लास रुक गई थी क्लास ही क्या पूरी सृष्टि रुक गई थी उस पल...।

कितना सुखद आश्चर्य होता है न ,जब आपको आपके पसंदीदा व्यक्ति आपके नाम से पुकारें !!
फिर मैं अपनी बेतरतीबी कम करने लगा था ।

दूसरी पीरियड होती थी विज्ञान की । विज्ञान हमें श्री राजेन्द्र मिश्रा सर पढ़ाते थे ।
लेकिन पहले ही दिन उन्होंने कहा कि ' मैं जो भी पढ़ाऊंगा वो अगले दिन बोर्ड में लिखना पड़ेगा और जो भी नहीं लिखा उसकी धुनाई शुरू !!'
पूरी क्लास सन्न !!
लेकिन मुझे पता नहीं क्यों बहुत खुशी हुई ।
खुशी इस बात से नहीं कि मुझसे बन जाएगा , खुशी इस बात से हुई कि मेरे क्लास के लड़के जो बड़े पढोकर बन रहे हैं सबको अपनी जमीन दिखेगी !
क्योंकि बहुतेरे इस भ्रम में जी रहे थे कि वो बड़े तेज हैं । यद्यपि उनमेसे कुछ अवश्य तेज थे ।
दूसरे दिन जाते जाते सर ने कहा था कि कल मैं दर्पण पूछूँगा !
क्योंकि उस दिन उन्होंने पढ़ाया था ।
दूसरे दिन जब सर ने कहा कि कौन कौन बताना चाहता है तो कई ने हाँथ उठाया, लेकिन मैंने नहीं ।
क्योंकि मेरा मानना था कि जिसका जबाब सबके पास हो उसे देने में कोई सार्थकता नहीं जब कोई न हो तब बताया जाए ।
दूसरी जो बड़ी वजह रही मेरी शर्म और मेरी ज्यादा न बोलने की आदत जो संभवतः आज भी है ।

तो मैंने हाँथ नहीं उठाया लेकिन जब किसी ने सर की मर्जी मुताबिक न बताया तब आखिरी में मैंने हाँथ उठाया । मैं कैसा समझाया ये मुझे तब एहसास हुआ जैसे ही मैंने अपना लेक्चर बन्द किया और पूरी क्लास तालियों से गूँज गई ।
लेकिन इन्हीं तालियों के बीच मैने सर की ओर देखा क्योंकि मुझे लग रहा था कि अगर उन्हें न जँचा तो पिटाई तय ।
लेकिन जैसे ही मैंने उनके चेहरे में खुशी की झलक देखी मैं नाच उठा ।
उस दिन मुझे एहसास हुआ कि मैं एक टीचर बन सकता हूँ । मेरा आत्मविश्वास लौट आया ।

बात कुछ दिन बाद की है जब हमारे बोर्ड के फॉर्म आने वाले थे तब श्री आई एस डी सर प्रिंटेड बायो-डाटा मँगा रहे थे ।
उन्होंने एक हफ्ते का टाइम दिया और लगभग आधे बच्चों ने दो-तीन दिन में ही जमा कर दिया ।
मैं भी अगर खुद से बनवाता तो दूसरे दिन ही जमा कर दिया होता लेकिन वीरेंद्र ( जो नवीं में आखिरी में दोस्त बना था ) ने कहा की मेरे पड़ोस में एक बनाते हैं उनसे बनवा दूँगा । मैंने भी सोचा चलो ये बनवा लेगा तो क्यों परेशान हों मैंने भी दे दिया ।
लेकिन वो रोज बहाने बना देता मुझे नहीं पता वो बहाने सच थे या झूठ ।
लेकिन आखिरी दिन जब सर ने कहा कि किस किस ने बायो डाटा नहीं जमा किया तो लगभग मेरे साथ आधी क्लास खड़ी हो गई ।
और सर ने पिटाई शुरू की मैं सबसे दाहिनी रो में था सो मेरा आखिरी नंबर था
लेकिन जब एक लड़का पिट रहा था ( स्मरण नहीं हो रहा कौन था ) तो हर डंडे पर उसकी जीभ निकल आती जिससे मुझे हँसी आ जाती , इसका आलम ये हुआ कि सर ने मुझे देख लिया हँसते और इत्तेफ़ाक़न मेरे तक पहुँचते पहुँचते लता की बेंत टूट चुकी थी ।
और परिणीति में मुझे हाँथ से दो चाटे पड़े ।

इस वकया से मुझे जो सबसे बड़ी सीख मिली वो ये की अपना काम खुद करो तभी समय में होगा ।
फिर मुझे याद आई वो कहानी " जिसमें किसी गेंहूँ के खेत में एक चिड़िया अंडे देती है कुछ दिन बाद जब उसके बच्चे थोड़े बड़े होते हैं तो एक दिन मालिक आता है और कहता है कि गेंहू कटवा दो, फिर कहता है कल मजदूर बुला कर कटवा दो जिसे सुनकर चिड़िया के बच्चे कहते हैं कि वो गेहूँ कटवा देगा चलो
तिस पर उनकी माँ कहती है गेहूँ कल नहीं कटेंगे अगले दिन किसान फिर आता है और कहता है कल हम खुद काटेंगे तब चिड़िया अपने बच्चे लेकर उड़ जाती है ।"

दसवीं में ही कुलदीप मेरे साथ आया । वो मुझसे एक साल पीछे था , छोटी छोटी और कहानियाँ हुई उन पर चर्चा विस्तार से फिर कभी ।
दसवीं में ही मैं थ्रो-बॉल में स्टेट गया और इसमें पी टी आई सर श्री शिष्टधर शर्मा सर का आशीर्वाद और स्नेह था ।

हम फिर क्लास में आते हैं , दूसरी पीरियड के बाद दस मिनट का ब्रेक होता था फिर संस्कृत की पीरियड  और इसके बाद गणित की ।
संस्कृत हमें श्री उमाकांत द्विवेदी सर पढ़ाते थे मैं उनसे पहले से परिचित था क्योंकि वो मेरे रिश्ते में लगते थे , गणित मुझे श्री नीरज पांडे सर पढ़ाते थे ।
शुरू में मैं इनके ज्यादा नजदीक नहीं था बल्कि मैं ही नहीं लगभग पूरी क्लास ।
कारण ये था कि गणित की पीरियड हमारे क्लास में अंग्रेजी मीडियम के स्टूडेंट भी आते थे चूंकि उनकी संख्या कम थी तो एक पीरियड हमारे साथ आते थे तो पाण्डेय सर उन्हें कुछ ज्यादा ही मानते थे उनके मन में संभवतः ये धारणा थी कि अंग्रेजी माध्यम का कमजोर बच्चा भी हिंदी माध्यम के बच्चों से ज्यादा पढ़ाकू होता है ।
ठीक वैसे जैसे " अखाड़े का पिटइया भी बाहर वालों से मजबूत होता है ।"
इसके लिए उन्होंने उनके लिए एक पूरी रो (row ) ही छुड़वा दिए जिससे हमें पीछे बैठना पड़ता था या हम उस रो में बैठें तो जब वो आए तो बैग नीचे फेंक दें ।

उस समय श्री आई एस डी सर के पैर में चोट आ गई थी या शायद एक्सीडेंट हो गया था मुझे स्पष्ट स्मरण नहीं है किंतु जब हमने शिकायत की तो सर क्लास आए मैथ की पीरियड में और निराकरण हुआ कि लड़कियों की दो सीट छोड़ कर जो बाद में आए वो जहाँ सीट पाए वहाँ बैठे ।
हालाँकि हम दो सीट छोड़ कर ही बैठते थे सो फैसला हमारे पक्ष में हुआ ।

बाद में नीरज सर हम लोगों को भी मानने लगे ।

लंच के बाद लगती थी शोभा मेम की क्लास जो हमे सोशल साइंस पढ़ाती थीं । आरम्भ में मैं उनकी क्लास किया किन्तु एकबार जब उन्होंने मुझसे पूंछा दोहरी नागरिकता के बारे में तो मैंने उन्हें बताया तिस पर उन्होंने कहा कि किताब रट के बता रहे और बेवजह दो छड़ी मार दीं सो उस दिन से हम शुरू के चार पीरियड पढ़ के खेल की प्रैक्टिस में लग जाते थे । हालाँकि बाद में वो भी मुझे मानने लगीं थीं कैसे ! ये फिर कभी ।
इस तरह हमारी दशवीं भी समाप्त हो गई ।
इस दशवीं में कुछ लोग जो मेरे बेहद करीब आए उनमें मेरे क्लास टीचर और साइंस टीचर मेरे दोस्तों में शुभम , अर्पित , और कुछ कुछ वेरेन्द्र , देवेंद्र ।

अस्तु, मेरी ज़िंदगी मेरे अपने बलबूते पर नहीं खड़ी है इसमें मेरे माता-पिता , भाई-बहन से लेकर गुरुजनो और मित्रों तक का अमूल्य सहयोग है सो सबका कोटि कोटि धन्यवाद ।


"जीवन के इस पग तक आने में कितनों की इच्छाएँ टूटीं ,
कितनों के उर तक पहुँच सका, ये तो कहना मुश्किल है ।
मुझे बड़ी उम्मीद बंधीं है और संभलती जाती है,
कितनो का है प्रेम मेरे तक, कितनों की अभिलाषाएँ हैं,
किन्तु कहाँ तक पहुँच सकूँगा ये तो कहना मुश्किल है ।"

Tuesday, 4 September 2018

शिक्षक दिवस

हर पूर्ववर्ती वर्ष की तरह सामयिक वर्ष में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मानते हैं और खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं ,ऐसे शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त कर जिनकी शिक्षण पद्धति साक्षरता से एक कदम आगे बढ़ कर विद्यार्थियों को शिक्षित करने की है । उनका यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है भारत के शैक्षिणिक विकास के लिए ।
किन्तु, क्या हम एक कदम और आगे नहीं बढ़ सकते ?
क्या हम लोगों में पुस्तकें पढ़ने की अभिरूचि पैदा नहीं कर सकते ?

मैंने सुना है रूस में हर गांव में पब्लिक लाइब्रेरी है जिसमें जब भी लोग काम से फुर्सत होते हैं तो जा कर अध्ययन करते हैं...।
और हमारे यहाँ गांव में तो दूर शहरों तक में लोग काम के बाद अपना सारा समय हास-परिहास और उपहास में गुजारते हैं ।

मैं रीवा के सेंट्रल लाइब्रेरी में अपने विद्यालयीन दिनों में जाता था और मुझे इस बात से आश्चर्य होता था कि लोग उसका नाम तक नहीं जानते थे ..!

एक जर्जर भवन जिस पर छोटे से उपेक्षित पड़े बोर्ड पर 'केंद्रीय पुस्तकालय ' लिखा था जिसके केन् और पुस्त मिट चुका था । और उसमें जाते भी चन्द गिने चुने लोग थे । बहुधा उसके कर्मचारी ही पाठक भी हुआ करते थे ।

अगर हम सच में शिक्षा की क्रांति चाहते हैं तो लोगों में किताबों के प्रति रूचि पैदा करनी होगी ,एक अभीप्सा एक कौतूहल पैदा करनी होगी  ।
हम इस बात से संतुष्ट रहते हैं कि हमारा बेटा अपने कक्षा की पुस्तकें पढ़ ले बस । यह नितांत तौर पर आवश्यक है पर क्या इन किताबों से इतर कोई और किताब खाली समय में नहीं पढ़ सकता ।

थोड़ा बड़े होने पर हमारा रुख एक और पुस्तक तरफ होता है तुलसीदास जी की 'रामचरित मानस' । लोग उसकी चौपाइयों का क्या खूब उद्धरण करते हैं कि स्वयं तुलसीदास जी भी शरमा जाएं । लेकिन हम समझते नहीं ,जीवन में उतारते नहीं ।
ठीक उसी तरह जैसे शहद मीठी है कहने से स्वाद नहीं मिलता , उसे चखना पड़ता है ।
जो खुद को थोड़ा बड़े बुद्धिजीवी मानते हैं वो 'श्रीमद्भागवत '
को पढ़ते हैं । ध्यान देने वाली बात ये है उनकी भी यह पढ़ने की प्रवृत्ति नैसर्गिक नहीं है एक दिखावा है बस कुछ विद्वज्जनों को छोड़ कर जो यथार्थ में जिज्ञासावश अध्ययन करते हैं...
जबकि उनका उद्देश्य लोगों के बीच चौपाइयों ,श्लोकों को बांच कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना होता है ।

तो इस शिक्षक दिवस क्यों न हम रूचि पैदा करें पढ़ने के प्रति और इसकी शुरुआत विद्यालय से ही संभव है ।

अस्तु , आप सभी को शिक्षक दिवस की कोटि-कोटि शुभकामनाएँ ।

Monday, 30 July 2018

इफ ट्रुथ बी टोल्ड



परमहंस योगानन्द कृत 'योगी कथामृत' और आंशिक रूप से रॉबिन शर्मा की ' द मॉन्क सोल्ड हिज फेरारी ' ( सन्यासी जिसने अपनी संपत्ति बेंच दी ) के बाद अगर कोई पुस्तक मुझे पराभौतिक रस का रसास्वादन कराई है तो वह है ओम स्वामी कृत " इफ ट्रुथ बी टोल्ड " ( यदि सत्य कहूँ तो..) ।
इत्तेफाकन एक ही पुस्तक बची थी यह उस दुकान में, मानो मेरे लिए ही रखी थी ।
      यह एक गृहस्थ व्यक्ति के सन्यस्त होने की कहानी है, मूलतः यह संस्मरण है जिसका आरम्भ वाराणसी में किसी शांतिप्रिय घाट खोजने से होता है जहाँ एकांत मिल सके , जो लेखक को नहीं मिलते ।
कदाचित ओम स्वामी प्रयाग आए होते तो उन्हें मन पसंद घाट मिलता "राम घाट" मेरा स्वयं प्रिय घाट है जहाँ बड़ी आसानी से ध्यान लगाया जा सकता है , माँ गंगा को महसूस किया जा सकता है अपने अंदर ।

                   निश्चित ही मनुष्य के विचित्र प्रजाति है क्योंकि हमें जो भी प्राप्त होता है हम उससे भिन्न प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं । इस संस्मरण का एक गद्यांश मुझे जँचा जब वो तैलंग स्वामी के मठ जाते हैं तो वहाँ उनके शिष्य जो संभवतः उनका स्थान ले चुके थे उन्होंने स्वामी जी को कहा कि तुम्हें सामान्य जीवन जीना चाहिए तिस पर स्वामी जी का तर्क कि ' सामान्य जैसी कोई चीज कहाँ होती है ? जो एक कि दृष्टि से सामान्य होता है वही दूसरे की दृष्टि से अत्यंत असामान्य हो जाता है ।
एक योगी यह समझता है कि संसार असामान्य है और लोग खाते-पीते ,मैथुन करते जानवरों जैसा जीवन व्यतीत करते हैं, वहीं संसार सोचता है कि योगी मूर्ख होते हैं जो कुछ भी न करते हुए आप जीवन यूँ ही बिता देते हैं ।
                         मैं यहां दो शब्दों का भेद करना चाहूँगा प्रथम 'त्यागना' द्वितीय ' छोड़ना' ।
त्यागना एक ऐसी अवस्था है जब आप उक्त विषय/वस्तु से विरक्त हो जाते हैं अर्थात आपकी इन्द्रियाँ उसके प्रति अनासक्त हो जाती हैं यह पुकार आपके अन्तरनभ से आती है, जबकि छोड़ना एक मानसिक क्रिया है यह इसलिए होती है क्योंकि वह आपकी इंद्रियानुकूल नहीं होती ।
इसमें भीतर से एक लगाव जुड़ा होता है जो समय आने पर उभर आता है और आप उसके प्रति आतुरता से भर जाते हैं ।

 यहाँ स्वामी ओम ने अपना घर त्यागा था , सन्यासी बनने की चाह उनके भीतर से उठी थी यह संसार से विमुख होना या भाग जाना न था ।
यह अपने दायित्वों से विमुख होना न था ।

           अगर आप एक सन्यासी के जीवन की यात्रा करना चाहते हैं तो पढ़ डालिए ये किताब ।
निश्चित ही एक आनंदमयी रस से स्वयं को पूरित पाएँगे आप पुस्तकान्त में ।

© विनय एस तिवारी




Thursday, 5 July 2018

याज्ञक (भाग-2)

..गुरुदेव तब से याज्ञक के मन को पढ़ रहे थे जब से वह ध्यान में बैठा था ।
उसकी अनुभूति भारद्वाज मुनि ने भी महसूस की थी इसीलिए याज्ञक के संभावित प्रश्नों के उत्तर की खोज में ध्यानमग्न हो गए ।
हे गुरुदेव ! मैंने आपके कहे अनुसार गंगा की चंचलता , पवित्रता और आवृत्ति को महसूस किया है, मुझे दिखाई दिया है ' जंगलों के बीच एक गाँव कुछ मृद्भाण्ड और एक लड़की की आवाज़ ।
" क्या मेरी नियति ने मुझे यही उपलब्धि लिखी है..?
क्या मेरी मंजिल यही है..?" -- यह कहकर याज्ञक विस्मयकारी नेत्रों से गुरुदेव की ओर देखा ।
तब ऋषिश्रेष्ठ ने आंखें खोलते हुए कहा. " मूल्य मंज़िल का या मिलने वाली उपलब्धि का नहीं होता वत्स, मूल्य रास्तों का है..मूल्य यात्राओं का है.., यात्राओं से मिलने वाले अनुभव का है, उपलब्धि तो प्रतीक मात्र है उन यात्राओं से पार होने का ।"
".. तो क्या मुझे भी यात्रा करनी चाहिए ?" - गुरुदेव के संकेत को समझते हुए याज्ञक ने पूँछा ।
" निःसंदेह ! तुम देवप्रयाग जाओ वहाँ मेरे गुरुभाई देवयादृ के आश्रम में जाना , वही तुम्हारी नियति बताएँगे ।
" पंद्रह दिन बाद यात्रियों का एक दल अयोध्या तक जाएगा उसके बाद आगे की यात्रा तुम्हें अकेले ही तय करनी होगी ।
गुरुदेव ने कहा ।

                सुबह सरयू तट पर बैठा याज्ञक ध्यानमग्न था वह अपनी नियति एक एकात्म स्थापित करना चाहता था ।
लेकिन इसबार उसने महसूस किया कि वह और उसका कबीला बहा जा रहा है.. लोग बहे जा रहे है हर जगह कोलाहल व्याप्त है.., प्रलय की इस घोर गर्जना से वह घबरा कर आंखें खोल लिया , लेकिन सरयू तट पर सब शांत था,
फिर यह क्या था..?  इस वीभत्स दृश्य से उसकी नाभि अस्त-व्यस्त हो गई , याज्ञक ने महसूस किया कि गुरुदेव ठीक कहते थे कि अगर अचानक कुछ वीभत्स हो तो जो असंभावित हो तो सबसे पहले हमारी नाभि अस्त-व्यस्त होती है ।
क्या वाकई यह पूर्व जन्म का यादांश है..? वह जानता है कि यह जानने के लिए उसे जाना होगा देवप्रयाग,.. जहाँ देवयादृ ,उनकी यज्ञपुत्री वैशाली तथा नियति इंतज़ार कर रहे हैं याज्ञक का । और याज्ञक चल पड़ता है इस कौतूहल भरी दुनियाँ में ।
(क्रमशः)
-- विनय एस तिवारी






Tuesday, 15 May 2018

प्रेम का सौदागर

 किसी दार्शनिक ने कहा है कि, "दो भाई एक ही पिण्ड के तत्वों से बने होते हैं ,यही कारण है कि वो एकदूसरे की मनःस्थिति को  एक नज़र में ही समझ लेते हैं ।"
मैं मानता हूँ कि अगर टेलीपैथी का अस्तित्व है तो उसका इससे बेहतरीन Example कुछ और नहीं हो सकता ।
    ये जुलाई के फर्स्ट वीक की बात है मैं फर्स्ट स्टैंडर्ड पास करके सेकण्ड में जाने वाला था, मेरे भइया जो उस वक्त 9th
स्टैंडर्ड में थे उन्होंने मेरे लिए होस्टल देख रखा था ।
उनके हॉस्टल से मेरे होस्टल की दूरी लगभग डेढ़ घंटे की थी ।
उन्होंने बताया ।
मुझे अब गांव छोड़ कर शहर जाना था and it was 10 AM when we had to got bus for city.
                           मैं मम्मी को छोड़ कर जा रहा था उस समय मेरे मन में दो बातें एक साथ थीं पहली की मैं रोना चाह रहा था और दूसरी होस्टल की अंजानियत का भय ।
Because whenever I thought about hostel my mind white washed, because I didn't know anything about Hostel.
And also it was the moment when I realized why Brides are weep during go to In-laws house.
मैं हॉस्टल में ही था उस शाम बारिश काफी तेज हो रही थी
मैं रूम में अकेला था क्योंकि मेरा एक मात्र दोस्त मेरा रूममेट घर गया हुआ था ।
हॉस्टल का फ़ोन बजा फ़ोन मेरे लिए ही था मैं वहाँ पहुँचा रिसीवर फ़ोन के बगल में था, मैंने फ़ोन उठाया और हेलो कहा ।
'क्या चल रहा ड्यूड ??' मेरे भइया थे ।
मैंने कहा ठीक है लेकिन आज मुझे अच्छा नहीं लग रहा ।
एक सन्नाटा रह गया हमारे बीच ।
मैं समय काटने के लिए वीडियो गेम खेलने लगा लगभग दो घंटे बाद किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी मैंने सोचा किचन वाले अंकल खाने के लिए बुलाने आए होंगे ।
                   मैं उठा दरवाजा खोला सामने मेरे भइया खड़े थे । उनका पूरा शरीर भीग चुका था , हाँ.. जो चीज नहीं भीगा था वो था भड़भूँजे के यहाँ का चना और मिर्ची की चटनी ।
मैं कुछ देर तक खड़ा रहा , मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस मेरी आँखों से आंसू निकल रहे थे ।
उस दिन मुझे एहसास हुआ कि चित्रकूट में श्री राम से मिलकर भरत को कितनी आनंददायी अनुभूति हुई होगी ।

विनय एस तिवारी

Friday, 20 April 2018

उफ़्फ़ ! बड़ी वाचाल होती हैं किताबें


जमानेभर के किस्सों का गवाह अगर कोई है, तो वो हैं किताबें
अगर पढ़ने का सिलसिला शुरू कर दिया जाए तो इनकी बातें ख़तम ही नहीं होती..
एक कारवाँ सा चल पड़ता है किस्सों का, कहानियों का ।
किताबें आपके किसी प्रश्न का उत्तर नहीं देतीं वरन् आपको उस कहानी में साक्षी की भाँति प्रस्तुत कर देंगी फिर ये निर्णय आप पर छोड़ देती हैं कि आप अनुभव क्या करते हैं..!
और उस अनुभव से क्या सीखते हैं यह आप पर निर्भर है..।
किताबें ही हैं जो आपको समय के पार पहुँचा देती हैं.. इससे दिलचस्प बात क्या होगी कि कहानी, किताब किसी भी 
समय की सुनाए, आपको उस काल, परिस्थिति में ज्यों का त्यों उतार देती है..।
किताबें एक जगह बैठे बैठे कितने ही दिलचस्प स्थानों में पहुँचा देती हैं, और हम महसूस करते हैं कि हम उस स्थान में बैठ कर उस अमर कहानी का हिस्सा हैं ।
हाँ.. अमर कहानी ! क्योंकि जिस कहानी को किताबों ने आत्मसात कर लिया, फिर अमर हो जाती है वो कहानी ।

किताबें बारिश की पहली बूँदों के उस अभिनवपन को घर बैठे  महसूस करा देती हैं.. जिसे आप कभी न कभी महसूस कर चुके होते हैं । उन्मुक्त आकाश में चाँद की सहचरी चाँदनी से नहला देती है हमें बिस्तर में लेटे-लेटे । यदा-कदा हम पाते हैं कि पढ़ते-पढ़ते हमारी आंखें भीग जाती हैं , हम बेचैन हो उठते हैं किस्सों में किरदारों की परिस्थितियों से ।
ज़िन्दगी के तमाम फलसफों को खुद में समेटे रहती हैं ये किताबें ।
... बस शर्त एक ही है कि आपको एक बेहतरीन श्रोता होना चाहिए..
फिर सफर में यूं लगता है जैसे ट्रेन के सामने वाली बर्थ में बैठी प्रेमिका आपको सुना रही हो अपनी पिटारी से किस्से-दर-किस्से और आप बड़े चाव से सुनते जाते हैं उन कहानियों को ।

एक बार मूड बना कर बैठिये किसी किताब के साथ उससे बात करिये फिर वो उकेर देगी तमाम फलसफों को आपके सामने ।
अगर आपको साथी की तलाश है तो बैठ जाइए किसी लाइब्रेरी में खिड़की के पास, या फिर चाय के साथ घर के ही बॉलकनी में और डूब जाइये किस्सों की जादुई दुनियाँ में ।

[ ' किताबें भी बहुत कुछ बोलती हैं  जरूरत है तो बस एक दोस्ती की ।'
किताबों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये आपके तौर-तरीके, लहज़े, सोचने के नज़रिये को प्रभावित करती हैं , सच पूँछिये तो ज़िन्दगी की किसी भी स्थिति से उबरने का एक सशक्त टीका (वैक्सीन) हैं ये किताबें ।
...फिर आप ऊब सकते हैं ( हालांकि संभावना अत्यल्प है ) परन्तु किताबें बोलने से बाज नहीं आएंगी कभी ।
सच में ! बड़ी वाचाल होती हैं किताबें ।

© विनय एस तिवारी

Tuesday, 10 April 2018

याज्ञक (भाग-1)



हज़ारों साल पुरानी गंगा अपनी पवित्रता और शून्यता समाए हुए उस दिन भी बह रही थीं..।

समय ईसा के पाँच सौ साल पहले का है.. प्रयाग की पुण्य भूमि और माँ गंगा के तट पर शिष्य 'याज्ञक' अपने गुरु की दीक्षा के अनुसार गंगा की लहरों को महसूस करने की कोशिश कर रहा था.., बार-बार उसे उसके गुरु ऋषि श्रेष्ठ भारद्वाज के शब्द याद आ रहे थे कि " इतने शून्य हो जाओ कि स्वयं के अस्तित्व को महसूस कर सको, शून्य में होना ही विराट में होना है , जब तुम्हारी आवृत्ति गंगा की आवृत्ति से मेल करेगी तब तुम स्वयं में महसूस कर सकोगे गंगा को.., और तुम्हारी आत्मा पवित्र हो सकेगी.., और यहीं से शुरू होगा तुम्हारी नियति तक पहुँचने का मार्ग ।



         शिष्य बैठा रहा ध्यानमग्न होकर सुबह के बैठे सांझ हो गई, सूर्य अस्ताचल की सीमा तक पहुंच गया और हवाएँ एक लय से बहने लगी थी ।
गुरुदेव ठीक कहा करते थे कि "जब तुम प्राकृतिक होने लगते हो तो समूची प्रकृति तुम्हारे साथ हो जाती है..।"
वह अब पूरी तरह शांत हो चुका था, गंगा के कलरव को स्वयं में महसूस करने लगा था । जैसे वह भी आंदोलित हो उठा था वह एक स्वर्गीय आनंद में खो गया ।
उसे दिखाई देने लगा एक गाँव जो चारों ओर से जंगलों से घिरा है.. कुछ विशेष आकृतियों वाले मृदभांड ।
और सुनाई थी एक लड़की के हँसने की आवाज़ !!

.......क्या यही उसकी नियति है..? या वहाँ तक पहुँचने के सफर में उसकी नियति है !!!
यही सवाल लेकर याज्ञक चल पड़ता है अपने गुरु के पास....।
क्रमशः
--- विनय एस तिवारी

इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...