Thursday, 30 May 2019

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग-दर्शन

                        ओम्कारेश्वर मंदिर से लावण्यमयी प्रकृति का सौंदर्य

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग जाने के बाद मेरे मन में मलाल रहा कि, मैं यहाँ वर्षाकाल या उसके अल्प उपरांत क्यों नहीं आया ?
क्योंकि ग्रीष्म की तपन में जब अतींद्रिय अनुभूति है, तो जब प्रसूता प्रकृति अपने वत्सलता और सौभाग्य  के वसंतावस्था में होती होंगी, तो वो परिदृश्य कितना मुग्धकारी होगा! कितना अतींद्रिय होगा, इसकी अनुभूति मात्र की जा सकती है ।
माँ नर्मदा से श्री ओम्कारेश्वर मंदिर 

और तिस पर या तो सभी तीर्थों के जल, या तीर्थराज के जल से अभिषेक यूँ प्रतीत होता है जैसे प्रभु स्वयंभू के शिखर पर स्थित चंद्रमा की दीप्ति और नवल हो गई हो ! या जैसे प्रकृति-सुता नर्मदा के साथ माँ गँगा का मिलन उन्हें पवित्रता की सीमा के पार ले गया हो ।

ये तो प्रभु की मर्जी थी कि बिना पूर्व-योजना के मैं इंदौर गया और वहाँ से ओम्कारेश्वर महादेव ।
हम कार से वहाँ गए थे । पहुँचने के बाद सबसे पहले स्नान करना था माँ नर्मदा में । हमें तो कोई जानकारी थी नहीं तो हम कहीं भी स्नान कर सकते थे किन्तु, महराज ( मिश्रा के जीजा) पहले भी आ चुके थे सो उन्हें पता था कि ‛नागर घाट' स्नान के दृष्टिकोण से श्रेष्ठ घाट है सो हम नाव के द्वारा उस घाट तक गए, रास्ता पैदल भी रहा होगा किन्तु हमें तो सांझ तक लौटना था सो हम नाव के द्वारा ही गए ।

उस घाट की एक बड़ी विशेषता है कि स्नान के लिए नर्मदा के ठीक किनारे घाट से लगी एक दीवाल उठा दी गई और उस पर तीन-चार पाइप लगे हैं जिनसे उस स्नान घाट पर पानी आता है और दूसरे छोर से पाइप से ही निकल जाता है । यह एक प्रकार से सुरक्षित घाट है ।
स्नानोपरांत इस घाट से स्वयंभू के दर्शन को हम नाव से निकल पड़े जो नर्मदा माँ के दूसरे छोर में है । यद्यपि जाने का रास्ता प्रशासन ने पुल के द्वारा भी बनवाया है किंतु स्नान के उपरांत पर्वत पर ऊपर चढ़ना ग्रीष्म ऋतु में तो कठिन है ।

                                   मंदिर की दीवालों पर शिल्प

अहा! मंदिर की शिल्पकला ही मन मोह लेती है एक पहाड़ पर इतनी कुशलता से बना ये मंदिर कई हज़ार साल पुराना हो सकता है ।
इस मंदिर का भी गर्भगृह छोटा ही बना है जैसा बहुधा ज्योतिर्लिंगों में होता है ।
मंदिर ऊपर तल में है तथा नीचे तल में शिव-पूजा यानी महामृत्युंजय पाठ, भगवान शिव का अभिषेक होता है ।

हमने प्रभु का तीर्थराज प्रयाग के जल से अभिषेक किया, मैं मांगना कुछ भी नहीं चाहता था किंतु फिर भी अनायास समाधि की लालसा उठ गई। प्रभु के प्रांगण में पहुँचने मात्र से रोम-रोम रोमांचित हो उठते हैं ।
विदा के पल मन में एक लालसा फिर उभर आती है कि प्रभु फिर बुलाना मुझे ।

- विनय एस तिवारी

Saturday, 6 April 2019

एक पत्र लिखना चाहता हूँ मैं ।



हाँ, मैं एक पत्र लिखना चाहता हूँ, ये दौर पत्र का तो नहीं ! इस रफ्तार भरी दुनियाँ में किसको इंतज़ार पसंद है ? लेकिन पत्र तो इंतज़ार चाहते हैं ना !
आपके हाथों से छूटने के बाद जाने कितने रास्तों से गुज़र कर , कितने हाथों को छूते हुए आखिर में पहुँचता है उस हाँथ तक, जो उसकी मंजिल है ।
तब जा कर मुकम्मल होता है उसका सफ़र, और कभी-कभार भटक जाता है रास्तों में, और  फेक दिया जाता है `डेड लेटरों' वाले कंपार्टमेंट में ।
डेड लेटर, ऐसे पत्र होते हैं जिन्हें लिखने वाले ने सही पता नहीं बताया होता या फिर, वो जिसे पढ़ना है बदल देता है अपना घर, बिना इस परवाह के कि शायद किसी दिन कोई पत्र आ गया तो !


तो,मैं भी पत्र लिखना चाहता हूँ लेकिन किसे ?
इसका कोई सटीक जवाब तो मेरे पास नहीं है लेकिन पहला पत्र, मैं स्वयं को लिखना चाहता हूँ ।
मैं खुद को देखना चाहता हूँ कि अपनी दृष्टि में किसी और के स्थान से कि कैसे दिखता हूँ मैं ? वस्तुतः मैं एक दृष्टा बनना चाहता हूँ ।
मैं खुद को एक बार अपने बारे में बताना चाहता हूँ, मैं खुद को बताना चाहता हूँ कि मैं देखना चाहता हूँ पहाड़ों का सौंदर्य, मुझे क्यारियों में सुसज्जित बाग नहीं पसंद है मुझे तो भाता है हिमालय का बेतरतीबीपन, उसका सन्नाटा सम्मोहित करता है मुझे ।
मैं जानना चाहता हूँ कि कैसे सूर्य की पहली किरण आ कर छूती है धरती को, और धरती खिल उठती है जैसे किसी पुरातन ग्रामीण भारतीय नारी के प्रिय का पत्र, आखिर आ गया हो प्रत्युत्तर लेकर परदेस से, जिसके शब्दों में गंध होती है उससे मिलने के चाह की, और शहर का जिक्र पढ़ कर कौंध उठती है उस नारी की आँखें, या फिर किसी कोने में कौतूहल होता है उसे भी उसके साथ शहर देखने का ।

या फिर, जैसे किसी ध्यानी में समाधि में उतरती हैं ब्रह्म की किरणें और इठला पड़ता है वह उस गज़ब के अनुभव से, ऐसा अनुभव जिसे डिस्क्रिप्टिव मेथड से नहीं समझाया जा सकता उसके लिए अनिवार्य है उसको प्रत्यक्ष करना ।

फिर एक पत्र लिखना चाहता हूँ मैं सभी लेखकों को,
उनकी पुस्तक लिखने के लिए । लेकिन उसमें मैं सिर्फ एक शब्द लिखना चाहता हूँ, " धन्यवाद " ।

एक पत्र मेरे ज़िन्दगी में आने वाली पहली लाईब्रेरी, रीवा की सेंट्रल लाइब्रेरी को । शायद वही थी जिसने मुझे रूबरू कराया किताबों से ।

मैं और भी पत्र लिखना चाहता हूँ एक लम्बी फेहरिस्त है । मैं बिना जवाब के इंतज़ार के लिखना चाहता हूँ बस इस बात के लिए कि मेरी ज़िंदगी मे आने के लिए " धन्यवाद " ।

Thursday, 14 March 2019

ग्रीष्म ऋतु की रात्रि का आकाश

                 ग्रीष्म ऋतु की रात्रि का दृश्य

ग्रीष्म ऋतु शब्द आते ही उमड़ पड़ती है एक हवा यादों की । ऐसे लगता है जैसे एक-एक याद हवा बनकर किसी झील के पानी को छूते हुए मुझ तक आ रही है क्योंकि मैं महसूस कर रहा हूँ यादों में ठंडक ।
मुझे सबसे पहले याद आती हैं छुटपन में ग्रीष्म की छुट्टियों में शहर से घर आगमन, फिर ग्रीष्म में ही कहीं 'टूर' पर  दोस्तों संग बिताई गई रातें और श्रृंखला बन पड़ती है यादों की ।


तो मैं कहने जा रहा था कि ग्रीष्म ऋतु की रात्रि का आकाश इतना आकर्षक होता है कि लगभग हर कोई आकर्षित होता ही है भले ही कौतूहलवश या फिर सौंदर्यवश । ग्रीष्म की रात्रि का आकाश अक्सर साफ होता है यदा कदा कुछ छुट-पुट बादल मिल जाते हैं किन्तु बहुधा साफ ही होता है तिस पर चाँदनी रात का चाँद और उसके बेहद करीब रहने वाला सितारा  उस पर चार चाँद लगा देते हैं । सितारा चाँद से इतना दूर होता है जितना किसी छोटे लड़के का सौंदर्य और उसके डिठौने की दूरी, इतना कि किताब के शब्द और पाठक के आनंद के बीच की दूरी, इतना कि किसी प्रेमिका के सौंदर्य और उसके दाएँ गाल के ठीक नीचे बना तिल । जो चाँद के सौंदर्यता को और सुशोभित करता है , बढ़ा देता है उसकी सौंदर्यता ।
और किसी किसी दिन अपनी मंदाकिनी की रेखा उस दृश्य को चित्रकार को कैनवास पर उकेरने पर मजबूर कर देती है या फिर किसी को बना देती है खगोल-विज्ञानी ।

इन तारों से भरे आकाश के तले सोने का सुख अद्वितीय होता है क्योंकि तब बरसती है चाँदनी और आधे जगत को चाँदी के बर्क में उतार देती है , बना देती है इस आधी धरती को चाँदी का ।

Friday, 22 February 2019

कहा न मुझे नहीं रास आतीं दीवारें

कहा न ! मुझे नहीं रास आतीं नक्काशी से सुसज्जित दीवारें । मुझे तो रास आती हैं प्रकृति की लावण्यमयी सौंदर्यता ।
मुझे रास आते हैं ऐसे शहर जो प्रकृति की गोद में समाए होते हैं जैसे सतपुड़ा की गोद में ' पचमढ़ी ' ,
जैसे पहाड़ों से घिरा सीधी ,और जैसे मेरा गाँव ।

जैसे अमरकंटक, जहाँ चौबीसों घंटे नर्मदा की कल-कल का सप्तसुरी संगीत तारतम्यता से बजता हुआ आपके कर्णपटलों में पहुँचता है और आप अनायास एक स्वर्गीय संगीत में सुधि खोकर खो जाते हैं । जहाँ पहुँचते ही कल्पनाओं से जेहन में उतरकर सच लगने लगती है नर्मदा और सोन की कहानी ।
जहाँ प्रेम यथार्थ में परिणित होकर दिला जाता है राधा कृष्ण के प्रेम की मधुर याद । जहाँ जनश्रुतियाँ साँस लेती दंतकथाओं के यथार्थ से ऐसे रूबरू होती हैं जैसे हमने भी तो देखा हो इन्हें हूबहू इन्ही कहानियों की तरह ।
वस्तुतः हम समा जाते हैं इन जनश्रुतियों के किरदारों में या ये कहूँ की हम किरदारों में जीने लगते हैं ।

दीवारें तो बस गवाह होती हैं किसी कहानी की किन्तु ऐसी जगहों में आप किरदारों को स्वयं में जीवित पाते हैं ।
आप स्वयं के करीब होते हैं , सौंदर्य के नित नए प्रतिमानों से सुसज्जित ये प्रकृति शिरोमणि दिला जाते हैं नई वजहें खुद में जीने की ।

-- विनय एस तिवारी
 
     "ग्रीष्म ऋतु में मैहर के एक प्रपात में 2006"        

Friday, 1 February 2019

समुद्र तट और पहाड़ में प्रिय


मुझे समुद्र तट में बैठना ज्यादा सुकूनभरा होगा पर्वत के अपेक्षाकृत ।
मैं ज्यादा समय वहाँ बिता सकूँगा पर्वत की तुलना में ।
इसके कई कारण हैं, किंतु, सबसे बड़ा कारण ये है कि समुद्र तट में एक तरह का स्वाभाविक खुलापन होता है जो पर्वत में नहीं, पर्वत लैंड लॉक्ड सरीखे होता है । इसलिए आप समुद्र में ज्यादा तरोताज़ा महसूस करेंगें ।
और पर्वत में सबसे कमी ये है कि ये आपको जमीन से दूर कर देता है जिससे जमीन पर आने की प्रवृत्ति बलवती होती जाती है ।

समुद्रतटीय शहर जैसे लंदन, जैसे न्यूयॉर्क, जैसे इंदिरा पॉइन्ट ( अंडमान निकोबार द्वीपसमूह ) अधिक आनंदप्रद होते हैं ।

वहाँ बयार खुलेपन से आकर आपको स्पर्श करेगी जबकि पहाड़ों में हवा बँधी बँधी सी लगती है ।

पहाड़ी हवाओं में किसी दूसरे देश से संदेश लाने का अनुभव भी नहीं है ।
जैसे किसी दूर देश से सदियों पहले समुद्री व्यापारियों का प्रेम संदेशा आया करता था ,
कभी हवाओं से तो कभी समुद्र से आने वाले समुद्री जहाजों से ।
पहाड़ में उतार है चढ़ाव है, जबकि समुद्र तट दोनों ओर समतल ।
इसीलिए मन ज्यादा देर पहाड़ में नहीं रह सकता ।
पहाड़ अल्पकालिक सुकूनी जगह है जबकि समुद्र तट दीर्घ कालिक ।

आप समुद्र तट में एक झोपड़ी लगाकर बैठ जाइए तो जो सुकून मिलेगा, वो पहाड़ पर बनी जगह नहीं दे सकती ।
हाँ, जब जी भर जाता है समतल से तो फिर चाह उठती है पहाड़ की ।
फिर पसंद आते हैं उतार-चढ़ाव ।
फिर आप निकल लेते हैं देखने गगनचुम्बी चोटियों की ऊँचाई और चढ़ाई को महसूस करने ।

विनय एस तिवारी

शताब्दियों का साक्षी 'बरदहाघाट '

                            (बरदहा घाट )


शताब्दियों का साक्षी 'बरदहा घाट'
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यथा मुम्बई से पुणे को जोड़ता है 'भोर घाट' , केरल से तमिलनाडु को जोड़ता है 'पाल घाट' ।
जैसे स्लोवाकिया को पोलैंड से जोड़ता है ' टाट्रा पर्वत श्रृंखला ' ठीक वैसे ही डभौरा को रीवा से जोड़ता है 'बरदहा घाट' ।


डभौरा, मध्यप्रदेश के उत्तर पूर्वी सीमांत की ओर से तथा रीवा जिले का पहला रेलवे स्टेशन है ।
पहला दोनों आयामों में । यानी एक तो रीवा राज्य ( वर्तमान रीवा जिले ) का सबसे पहला स्टेशन , दूसरा मध्यप्रदेश के उत्तर पश्चिमी सीमा का पहला स्टेशन ( सीमा में ) ।
जो इलाहाबाद ( प्रयाग ) से मुम्बई रुट की सभी चिघाड़ती रेलगाड़ियों का बाहें फैलाए स्वागत करता है मध्यप्रदेश में ।जो आगे बढ़ते हुए प्रदेश पार पहुंचती है महाराष्ट्र ।

इसी डभौरा से बस चलना शुरू करती है तो बरहुला,अतरैला होते हुए लगभग आधी दूरी तय करते ही सीना तान कर बाहें फैलाए दिखाई देता है 'बरदहा घाट'  ।


बरदहा घाट रीवा-पन्ना के पठार का पूर्वी छोर है । जिसकी प्राकृतिक लावण्यता देखते ही मानवी नेत्र विस्मय और आनंद से सराबोर हो जाते हैं । जिसकी हरीतिमा देखते ही मंत्रमुग्ध हो जाता है मानव मन ।
वर्षा काल में प्रस्फुटित अस्थाई झरनों की अनगिनत श्रृंखलाओं के कोलाहलिक संगीत नव स्फूर्ति से भर देता है मानवी देह को ।
और जब गर्मियों की तपन इसकी हरियाली को पतझड़ में रूपांतरित करती है तब भी पलास के लाल फूलों से स्वागत करता है ये घाट ।
इसके आसपास टमस (टोंस) नदी की दुग्ध धारा , चचाई जलप्रपात, पावन घिनौची धाम ( लघु झरनों की दुनियाँ )
आदि हैं । मूलतः प्राकृतिक धनाढ्य है विंध्य का ये अंश ।

श्रुतियाँ कहती हैं कि वनवास काल में भगवान राम इन्हीं पर्वत श्रृंखलाओं को पार करते बढ़ गए थे दंडकारण्य ।
लोग आए गए , सदियाँ आई गईं, किन्तु यह घाट आज भी वही सुरभित हवा, प्राकृतिक लावण्यता समेटे दोनो बाहें फैलाए, वही चिर-परिचित अल्हड़पन से हृदयंगम के लिए आतुर है हमेशा की तरह ।
इति ।

विनय एस तिवारी

Friday, 18 January 2019

With the some of precious person of my life


"When we all get togather it feels like blend of tea and I reached the place of book where ocean meet to sky."

I think we all r the character of a book which is just writing now by the writer.
I think someone is just right the story of our and we play role.
Role has decided by writer as like Maharshi Valmiki written Ramayana before the birth of Lord Ram and other.
Just see we all are from many states, many district but we met !!
It's not coincidence it's definitely define by the writer.
You all know ? I think we just move togather in one way but the stope will be come and we all move on own's way.
That time I miss you all.
But we have a time for get together till then let's enjoy every moment.
Your's
Vinay S Tiwari

इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...