Tuesday, 15 August 2017

डॉ ऋषिकांत पाण्डेय - एक विश्वविद्यालय

प्रोफ़ेसर ऋषिकांत इलाहबाद विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के विभागाध्यक्ष हैं.. छोटी कद-काठी ,सफ़ेद बाल..
उनकी ऊर्जा उनके निकट आते ही महसूस होने लगती है ।
हालाँकि मेरी बुद्धि अभी इतनी विकसित नहीं हुई है कि मैं दर्शन और दर्शन के इतने बड़े विद्यार्थी के विषय में विचार व्यक्त कर सकूँ... लेकिन ये उनके प्रति प्रेम है जो किसी दायरे या सीमा से बढ़कर मजबूर करता हैं उनपर मानसिक तौर पर समर्पण के लिए..उनकी श्रेष्ठता समझने के लिए ।
 वे स्वयं एनालिटिकल फिलॉसॉफी के विद्यार्थी रहे हैं.. अॉस्ट्रिन के ऊपर उनका रिसर्च भी रहा है...लेकिन जितना बेहतरीन मुईर, विटगेन्स्टिन, क्वाइन, स्ट्रॉसन आदि को पढ़ाते हैं उतना ही बेहतरीन इंडियन फिलॉसॉफी या फिलॉसॉफी ऑफ़ रिलिजन पढ़ाते हैं.. उनकी तो एक पुस्तक तक फिलॉसॉफी ऑफ़ रिलिजन पर है "धर्म दर्शन" जो पियर्सन पब्लिकेशन से प्रकाशित है । मुझे लगता है धर्म दर्शन पर रूचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए....

मुझे उनके निकट जाने का सौभाग्य तो प्राप्त नहीं हुआ किन्तु मैं उनकी क्लासेज में जरूर उपस्थित रहता था.. मुझे उनकी क्लास में एक अनिर्वचनीय मज़ा आता था..एक मस्ती होती थी
जो होनी भी चाहिए..
हलाकि मैं फिलॉसॉफी को फुलोसोफी मानता हूँ क्योंकि फिलॉसॉफी का प्रत्येक प्रश्न प्रतिप्रश्न करता है उत्तर नहीं देता और ऐसे में एक लंबी श्रृंखला तैयार हो जाती है प्रश्नों की ।
ऐसे में मैं ओशो जैसे किसी व्यक्ति के विचार मानना अधिक पसंद करूँगा क्योंकि उनमें एक तटस्थता है.. एक जिवंत तर्क है .... एक क्रांति है..एक पहल है उत्तर खोजने की हर प्रश्न की या..उस रहस्य को रहस्य में ही जीने की उत्कंठा ।
प्रोफ़ेसर शब्द आते ही एक सीरियस मैन की छवि उभर आती है लेकिन पाण्डेय सर तो हम बच्चों के साथ बच्चे बन जाते थे ।
अक्सर कहा करते थे की ' मैं अपने बच्चों को समझाने के लिए कितना भी जुगत लगा सकता हूँ...'
बीच बीच में कुछ संजीदा मामलों में भी हास्य व्यंगात्मक चुटकी लेना उनके अद्वितीय कौशल की विशेषता है ।
पाण्डेय सर दूसरे ऐसे शिक्षक हैं जिनके प्रति मरे मन में अनायास प्रेम उमड़ता है..उनमें बेशर्त समर्पण को जी चाहता है ।
        मैंने एक दिन पेपर में एक दिन पढ़ा था कि उन्होंने एक बच्चे की फीस भरी क्योकि उसका पैसा गुम गया था..
कुछ लोग आश्चर्य कर रहे थे मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि जो उन्हें निकट से समझे होंगे उनके विशाल ह्रदय की पराकाष्ठा का अनुभव करते होंगे । पाण्डेय सर भक्ति आश्रित समर्पण पर नहीं वरन प्रपत्ति आश्रित समर्पण पर यक़ीन करते हैं । किसी भी टॉपिक पर भरपूर कमांड.. एपिस्टमोलॉजी इतनी सरलता से पढ़ा दिए पता नहीं चला लोग कठिन क्यों कहते हैं....किसी विषय को पढ़ाते वक्त उससे संबंधित कई पुस्तकें बताते थे मुझे तो आश्चर्य होता था कि इनमे तो पूरी लाइब्रेरी समाहित है.. !! मैंने उनके व्यक्तित्व में वे सारे कारक देखे
जो एक विश्वविद्यालय में होना चाहिए...
या फिर यूँ कहें कि वे स्वयं में एक विश्वविद्यालय हैं तो यात्किंचित भी अतिश्योक्ति न होगी ।
 ऐसे गुरू से बारंबार पढ़ने को जी चाहता है..
प्रणाम है ऐसे गुरु को ।
मैं धन्य हूँ.....

Thursday, 10 August 2017

उस शाम



बहुत दिन से मेरा मन कर रहा था कि गोविंदगढ़ में एक शाम गुजारूं.. इसलिए नहीं..कि वह मध्यप्रदेश के सबसे बड़े
तालाबों में एक है , बल्कि इसलिए क्योंकि यह तालाब ज़िन्दगी का एक बिम्ब उकेर देता है..
प्राकृतिक परिदृश्य अनुपम है ।

मेरे 12वीं का आखिरी पेपर गणित का था जो दुबारा 24 मार्च 2014 को हुआ.. वो दिन मेरे स्कूल लाइफ का अंतिम
और अविस्मरणीय दिन था..
हमने गोविंदगढ़ जाने रूपरेखा 24 को ही बनाया था लेकिन एक दिन बाद जाना तय हुआ ।
हम दो लोग थे एक तो मैं ही था दूसरा विराट था । मैं विराट के घर में ही रहता था..और अब हम दोनों अच्छे-खासे दोस्त
हैं...। हम उसी की मोटरसाइकल से जा रहे थे......

        हम चल पड़े थे प्रकृति की गोद में.. मानो वह हमारा इंतज़ार कर रही हो और हमें गोद में भर लेने को उत्सुक हो..
हम थोड़ा रफ़्तार में जा रहे थे क्योंकि सूरज ढलने वाला था और हमें अंदेशा था कि कहीं सूरज डूब न जाए..

लगभग आधी दूरी पहले से मोटेरसाइकल मैं चला रहा था जब हम उस मोड़ में मुड़ने लगे जो गोविंदगढ़ की ओर जाता है
तो वहां कुछ पुलिस वाले दिखे मैं थोड़ा सहमा और आगे बढ़ गया.......


          सचमुच वह तालाब बहुत दूर तक फैला था..उसे गोपालबाग कहते हैं..वाकई !! बहुत अच्छा लगा
हमने कई अद्भुत नज़ारे कैमरे में कैद किये .. वहां सूर्य की रश्मियां सब कुछ उज्जवल कर रही थीं.. 

वहाँ सूर्य का तालाब में बना प्रतिबिम्ब ,सूरज से तालाब में प्रतिबिम्ब की ओर आती किरणें एक सेतु बना रही थीं सूरज से
सूरज के प्रतिबिम्ब तक । ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे आकाश और धरती का इन्हीं रश्मि रुपी हाँथों से मिलन हो रहा हो..
और सूरज के पीछे बादलों का एक झुण्ड पगडंडी नुमा संरचना बना रही थी..मानो सूरज की अपनी बची हुई राह दिखा
रही हो जो तय करना है उसे..

मैं इस क्षितिज में उभरे पगडंडी को अपलक निहारता रहा.. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मुझे प्रकृति कुछ इशारे कर रही हो..
"अभी सफर बहुत करना है मंजिल पाने के लिए..किसी रोज बादल भी छा जाएँगे, लेकिन हमें हर रोज 
 नए उजाले के साथ नया विश्वास पैदा करना है..ताकि हम नई ऊर्जा ,नई संकल्पना के साथ चलते रहें सूरज
की तरह अपने पथ पर निरंतर......🚶🚶
✍ विनय एस तिवारी ©




















Wednesday, 2 August 2017

एक उलझन सी मन में

एक उलझन सी मन में हुई आज फिर ,आज फिर मैं पूरी रात सो न सका ,
जिससे बे-इन्तहां है मोहब्बत हुई ,खुद को उसकी अदा में भिगो न सका,
जब भी सोया हूँ रातों की हदबंदी में ,है छलक जाता यादों का एक साज़ फिर

धीरे-धीरे चलो री पवन आज फिर, देखो पतवार भी आज प् न सका..
उसकी मौजूदगी के हर एहसास में प्यार की बांसुरी मैं बजा न सका..
चाँद तू भी बढ़ा रौशनी खुद की तो !
 उसकी वेड़ी में जो फूल गूंथा था मैं ,गिर गया हो कहीं भूल से आज फिर..
आज फिर मैं उसे ढूढ़ने चल पड़ा..आज फिर मैं पूरी रात सो न सका ।

   ✍ विनय इस तिवारी ©

Sunday, 30 July 2017

ट्रैफिक जाम


मैं अपनी एक पुरानी डायरी जो रद्दी वाले को पुराने अख़बार
देते वक्त मिली थी पलट रहा था ।
उसमे कुछ पुराने कॉन्टेक्ट नंबर थे..और कुछ लोगों के नाम
जो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले सबसे अच्छे लोग थे ।

मैं एक-एक करके पन्ने पलटता जाता मानो अपने ज़िन्दगी की
किताब पलट रहा हूँ ...धीरे-धीरे अंगुलियां एक नाम पर ठहर
गईं ।
    ' रिया ' एक नाम जो मेरी ज़िन्दगी में आने वाले नामों में
सबसे अच्छा नाम है ।
वैसे रिया नाम भी कितना क्यूट लगता है न..?? सोचो वो कितनी
खूबसूरत रही होगी ।
      पहली बार देखा था उसे केमेस्ट्री की कोचिंग में... मैं भी
साईकिल से था और वो भी ।
ओल्ड मॉडल लेडीज साईकिल को हाँथों में थामे हुए पैदल आ
रही थी । पिंक कलर के सूट के ऊपर हल्की कत्थई शॉल ओढ़े थी
कम्बख्त ठण्ड भी उस दिन बहुत पड़ रही थी । ठण्ड से उसके गाल
और लाल हो गए थे । इतनी मासूम और शांत लड़की पहली बार देखा
था मैंने !!
 उसे देखते देखते कब दो महीने निकल गए पता ही नहीं चला..,
हम दोनों का बैच बदल गया था हमारी मुलाकात महज़ रास्तों में
पल भर के लिए होती थी । और उन्हीं दो पलों के मुलाकात से
उसे पता चल गया था कि मैं उसे पसंद करता हूँ ..और शायद वो
भी मुझे पसंद करने लगी थी तभी तो.. ट्यूशन से आते-जाते वो
कनखियों से शरमाते हुए मेरी ओर देखती और जब उसकी चोरी
पकड़ी जाती यानी मैं उसे मेरी ओर देखते देख लेता तो शरमाकर
नज़रें झुका लेती । इस तरह एक साल बीत गया लेकिन मैं उससे
अपने दिल की बात नहीं बोल पाया ।
उसे न पाने के गम में मैंने अपनी ज़िन्दगी की कश्ती को वक्त के
सागर की हवाओं के रुख पर छोड़ दिया ।

        'सर हम ऑफिस जाने के लिए लेट हो जाएंगे ।' मेरे असिस्टेंट
ने मुझे आगाह किया ।
असिस्टेंट की ये आवाज़ मुझे अतीत के झरोखे से वर्तमान में ला
दिया ।
'ओह ! श्योर, आई ऍम रेडी सून ☺' मैंने कहा ।

दफ्तर पहुँचते ही मेरा फ़ोन बजा ..
देखा तो शुभम का था उसने बताया उसकी शादी हो रही है...
आज से चार दिन बाद ।
दूसरे ही दिन मैंने अपना सामान पैक कर चल दिया ..🚅🚅
अपने गुमनाम शहर ।
लगभग आठ साल हो गए होंगे मुझे गुमनाम शहर छोड़े हुए ।
सत्रह घंटे की यात्रा करनी थी मुझे । इन सत्रह घंटों में मैं सोचता
रहा सब कुछ बदल गया होगा न ???
वो लोग, वो दुकान जहाँ कोचिंग से लौटते वक्त हम चार-पांच लोग
जलेबी खाया करते थे..अब शायद वो अंकल बूढ़े हो गए होंगे..
वो गलियाँ जहाँ एक दूसरे की साईकिल खींचा करते थे..सब कुछ !!

स्टेशन से बाहर निकल कर ऑटो वाले को बुलाया और चल दिया ।
मेरा दिल धड़कने लगा था सांसे तेज हो गई थीं..मुझे डर था कि सब
कुछ याद आने लगेगा..
ये वही शहर है जहाँ मैंने ज़मीन पर पैर रखना सीखा, वही शहर
जहाँ किताबों पर ऊँगली रखना सीखा, वही शहर जहाँ क्लास बंक
कर सभी दोस्त बास्केटबॉल खेला करते थे, हाँ..ये वही शहर है जो
मुझे मेरा प्यार न दे सका ।

साहब ! हम दूसरे रास्ते से चलें..इस रास्ते में जाम बहुत लगता है..
ऑटो ड्राइवर ने मुझसे पूँछा ।

इस शहर में सब कुछ बदल गया सिवाय ट्रैफिक जाम के ।
उसने झल्लाते हुए कहा ।
"ट्रैफिक जाम" ये शब्द सुनते ही मैं अंदर तक भर गया..
गोलकुंडाबाग से मैं जब जब रिया को प्रपोज़ करने आता हर
बार ये जाम मुझे रोक लेता । लेट-लतीफ़ पहुँचता तब तक रिया
का कॉलेज बन्द हो चुका होता । ये सोच कर की कल मिलूँगा
मैं उस दिन रुक जाता और हमेशा उस दूसरे दिन रिया कॉलेज
नहीं आती । मुझे लगा की नियति ही मुझे रोक रही है
क्योकि कोई भी संकल्प जो प्राकृतिक होता है प्रकृति उस पर
सहयोग करती है..।

मैं अपने कंपनी के मेल्स चेक करने लगा मैंने अनुभव किया कि
ऑटो वाले ने किसी को रोक कर बैठाया क्योकि मैं मोबाइल
में बिजी था सो मैंने ध्यान नहीं दिया..
कुछ देर बाद मैंने देखा की बगल में एक लड़की बैठी हुई है
वही मासूमियत वही भोलापन वही रिया जो आज से आठ साल
पहले थी ।
बस अंतर इतना था कि उसकी मांग पर सिन्दूर भर चूका था ,
सूट की जगह साड़ी ने ले लिया था ...
उसने भी कातर भरी नज़रों से मुझे देखा मुझे यकीन है उसने मुझे
पहचान लिया था तभी अचानक से उसकी आँखें मेरी ओर अपलक
देखते-देखते भर आई थीं ।
'तुम मुझे पहले क्यूँ नहीं मिली..??- मैंने आँखों में आंखें डाल कर
पूँछा ।
मैं तुम्हें कितना ढूँढ़ा तुम मुझे मिली क्यों नहीं ।

"ज़िन्दगी में कब क्या होगा हमें पता नहीं होता रिशित !
अगर सब कुछ पता हो जाए तो ज़िन्दगी एक वेडियोगेम नहीं
बन जाएगी ...???' उसने नम भरी आँखों से मुस्कुराते हुए कहा ।

मेरा ठिकाना आ गया था और मैं उतरकर गुमनाम शहर की भीड़ भरी
उदास गलियों में मुसाफ़िर सा चल पड़ा..... मंजिल की तलाश में ।

✍ विनय एस तिवारी

 







Tuesday, 25 July 2017

एक अविस्मरणीय दिन -- 9 जुलाई 2010


आज सात साल बाद मैं फिर उसी नौवीं 'सी' के सामने नीम

के चबूतरे पर बैठ गया ..और देखने लगा 9th c के पीछे वाले दरवाजे

पे चॉक से लिखा मेरा नाम

जो मैंने ही लिखा था.. जहाँ से स्कूल के शुरूआती दिन साँस लेने लगे

और मैं डूब गया एक बीती किन्तु अनमोल और अद्भुत दुनियां में..।


                        # सात साल पहले 


9 जुलाई 2010 एक अविस्मरणीय और बेशकीमती दिन था
मेरे लिए ।
हाँ.. ये वही दिन था जिस दिन मार्तण्ड नम्बर 1 (एक्सीलेंस) स्कूल
में मेरा पहला दिन था ।
यह एक और दिन था... जब मैं अपना नाम दुनियां के उन
विद्यार्थियों के साथ दर्ज़ करा चुका था जो अपने घर से दूर रह कर
किसी खास मकसद के लिए पढ़ते हैं ।
इस पहले दिन मेरे भइया मुझे ले गए ।
"यार..9th 'c' किधर है..?"-मैंने एक लड़के से पूँछा ।
"नीम के पेड़ के सामने वाला है.." -उसने उंगली दिखाते हुए कहा ।

"तुम लोग 9th 'c' के हो..?" - भइया ने वहां खड़े लड़कों से पूँछा ।
"हाँ..हम 9th 'c' के ही हैं " - एक मोटे लड़के ने कहा ।

मैं और भइया बात करने लगे.. वहीं एक और लड़का था जो
हमारी बात-चीत गौर से सुन रहा था । दरवाजा खुला तो सब
अंदर गए सबसे अंत में मैं गया ।
तभी बेल बजने लगी मैंने सोचा प्रार्थना की हो शायद !!
कई पंक्तियों मे पंक्तिबद्ध हो कर बच्चे खड़े थे सामने तीन सीढ़ी
ऊपर स्टेज था जिस पर हारमोनियम, ड्रम,कांगो आदि रखा था
हारमोनियम में एक शिक्षक खड़े थे बाकी अन्य पर स्टूडेंट ही थे ।
एक लड़के ने (जो एन सी सी का था बाद में पता चला की दिल्ली
में होने वाली RDC परेड भी किया था) बड़े जोर से सावधान-विश्राम
कराया और प्रार्थना शुरू हुई -
" इतनी शक्ति हमें दे न दाता मन का विश्वास कमजोर हो न.."
इसके बाद सभी अपने अपने क्लास में चले गए ।
क्लास में सिर्फ लड़के ही थे लड़कियों की अलग क्लास थी
A सेक्शन में जिसमे कुछ ही लड़के थे
सोनी सर हम लोगों से कहा करते थे की 'ये तुम लोगो के साथ
अन्याय है '!! और बात सच है इसका खामियाजा आज तक भुगतना
पड़ रहा..। ये कमी व्यक्तित्व (पर्सनाल्टी ) विकास में बहुत बड़ी
बाधा बनी ।

मेरी पहली पीरियड नहीं लगी.. बाकि सभी क्लासेज चलीं..
इस पहले दिन के अनुभव से ऐसा लगा की मैं फ़ैल हो जाऊंगा !!


इसी पहले दिन में मेरी एक लड़के से दोस्ती हो गई, हम दोनों की
लंच ब्रेक में हमारी क्लास के सामने बने बरामदे में मुलाकात हुई
" यार..अच्छा न लग रहा होगा न ??" -- उसने मुझसे कहा
ये वही लड़का है जो मुझे ध्यान से सुन रहा था ।
हाँ यार..! एकदम बोरिंग । मैंने कहा ।
मैं विनय...अपना परिचय देते हुए कहा ।
और मैं अनूप !! उसने मुस्कुराते हुए बताया ।
यहाँ कहाँ रहते हो ? मैंने पूँछा
'बोदाबाग' और तुम 'सिविल लाइन' मैंने कहा ।
अच्छा ये बताओ तुम आगे क्या करना चाहते हो ? मैंने पूछा
यार बिज़नेस मैन बनना चाहता हूँ । और तुम ??उसने प्रतिप्रश्न
किया
IIT इंजीनियर ।
ये IIT क्या होता है ? वो पूँछा
इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा संसथान है,लेकिन इसमें सलेक्शन
बहुत मुश्किल है ।
इसके बाद दोनों काफ़ी देर तक बैठे रहे..
हम दोनों का एक दूसरे के अलावा कोई और दोस्त नहीं था ।

                      पहली पीरियड में विश्वकर्मा सर बहुत कम
आते थे । रजिस्टर में हाज़िरी हमारे ही क्लास के दो-तीन बच्चे
भरा करते थे जो विश्वकर्मा सर के अन्य काम जैसे छत्रिवृत्ति का
रजिस्टर बनाना आदि कार्य करते थे ।

श्री उमेश तिवारी सर संस्कृत पढ़ाते थे उनके क्लास में मूलतः
संस्कृत ही बोली जाती थी । यह अपने आप में बड़ा अनुभव था
और ऐसा कक्षा में कराए जाने का मैं पक्षधर भी हूँ क्योंकि इससे
विद्यार्थी का अकादमिक विकास होता है ।

फिर आते थे श्री I.S.D. सर.. जो हमे इंग्लिश पढ़ाते थे ।
बहुत बेहतरीन एक समां बंध जाता था । उनके अध्यापन का
आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि एक हिंदी माध्यम
के विद्यार्थी के लिए इंग्लिश विषय बहुत कठिन लगता है लेकिन
10वीं की बोर्ड परीक्षा में लगभग सब बच्चे 80/100 के ऊपर थे।

हर लड़का उनका बहुत सम्मान करता था और आज भी करते हैं
और डरते भी थे लेकिन ये सम्मान का डर था बल्कि इसे डर न कह
कर इसे इज्जत करते थे कहना श्रेयष्कर होगा ।
क्योंकि वो किसी को मारते नहीं थे । वो अलग बात है कि 10वीं
में बहुतेरों के साथ मुझे भी पड़ी थी लेकिन उसका ताल्लुक
 पढाई से नहीं था बल्कि बायो-डाटा न बनवाने के कारण था ।

पता नहीं क्यों लेकिन हमसे आगे की क्लास के बच्चे लगभग
दूसरी पीरियड के बाद भागना शुरू कर देते थे और लंच के बाद
तो लगभग पूरी क्लास साफ !!!

देखते-देखते हम भी ऐसा ही करने लगे ...
शुरुआत में हमारे गणित के शिक्षक श्री उमेश पटेल सर कहते
थे की -
"अभी तो तुम लोग अलग-अलग स्कूल से हो कुछ दिन बाद
 तुम्हारे भी पंख जाम आएँगे तब तुम भी उड़ने लगोगे और 
तभी मैं तुम्हारे पंख काट दूंगा जिससे जमीन पर रहो ।"

7-8 लोग हम सबसे पीछे वाली सीट को जोड़ कर साथ बैठते थे
एक घटना याद आ रही है जब यूँ ही हंसी मजाक में विराट ने सैफ़
का रेप करने की एक्टिंग कर रहा था तभी ऐसा लगा सच में न कर
दे !!! और यक़ीनन सैफ को कुछ छुट-मुट चोटें भी आई थीं ।

             इस तरह हँसते-खेलते पता नहीं कब 9वीं कक्षा के दिन
कट गए.. एक्सेलेंस में एक साल गुजर गए पता नहीं लगा ।
30 अप्रैल जिस दिन रिजल्ट सुनाना था मन में अजीब सी उथल
-पुथल मची हुई थी ।
लगभग डेढ़ बजे विश्वकर्मा सर रजिस्टर लिए आए मैं और
वीरेंद्र जो मेरा एक और दोस्त बन चुका था दोनों सबसे पीछे बैठे
थे । वीरेंद्र का रोल नंबर 62 था और मेरा 64 ।
वीरेंद्र का 1st डिवीज़न था अब मेरा नंबर था मैंने सारे देवताओं के
नाम लिए तभी विश्वकर्मा सर की आवाज़ आई 64 विनय 1st
डिवीज़न । अनूप रिजल्ट के दिन स्कूल नहीं आया था उसका भी 1st
डिवीज़न ही था ।
मैं आगे बढ़ चुका था...एक कदम और आगे ...।

Monday, 17 July 2017

परदे के भीतर

अब जाने डोली कहाँ रुके अब जाने शाम कहाँ पर हो..
अब जाने घूंघट कहाँ उठे, दूल्हन बदनाम कहाँ पर हो..
अब जाने कब रंग-रेज़ मिले, चूनर निष्काम कहाँ पर हो..
परदे के भीतर परदे में बेपर्दा श्याम कहाँ पर हो..।
                 ----- गोपालदास 'नीरज'

Sunday, 16 July 2017

एक चेहरा है


फ़िर वही मिलन के किस्से हैं फिर वही पुरानी बातें हैं..
फ़िर वही साज़ धड़कन वाला फ़िर वही पुराने नाते हैं..
मन में कुछ यादें बाक़ी हैं कुछ सपने अभी अधूरे हैं,
कुछ लोगों से मिलना बाक़ी है कुछ ख़्वाब अभी न पुरे हैं,

एक चेहरा है जो आँखों में यूँ अक्सर आता जाता है..
कुछ बात ग़ज़ब उस चेहरे में बस वो अपनी ही सुनता है..
वो जिसकी भी हो हो जाए मुझको इस पर ऐतराज नहीं,
कुछ यादें साझा करनी हैं कुछ किस्से उसे सुनाने हैं,
कुछ उससे कहना बाक़ी है कुछ उससे बातें करनी है,
उससे मेरा रिश्ता ही नहीं वो अक्सर कहती रहती है..
मैं उससे हँसता रहता हूँ वो मुझसे गुस्सा रहती है,
पर...उसकी मेरी हर बातों में एक रिश्ता अब भी बाक़ी है,
वो ख़ामोशी का रिश्ता है वो ख़ामोशी के नाते हैं...।
                       ----- विनय तिवारी

इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...