Friday, 22 February 2019

कहा न मुझे नहीं रास आतीं दीवारें

कहा न ! मुझे नहीं रास आतीं नक्काशी से सुसज्जित दीवारें । मुझे तो रास आती हैं प्रकृति की लावण्यमयी सौंदर्यता ।
मुझे रास आते हैं ऐसे शहर जो प्रकृति की गोद में समाए होते हैं जैसे सतपुड़ा की गोद में ' पचमढ़ी ' ,
जैसे पहाड़ों से घिरा सीधी ,और जैसे मेरा गाँव ।

जैसे अमरकंटक, जहाँ चौबीसों घंटे नर्मदा की कल-कल का सप्तसुरी संगीत तारतम्यता से बजता हुआ आपके कर्णपटलों में पहुँचता है और आप अनायास एक स्वर्गीय संगीत में सुधि खोकर खो जाते हैं । जहाँ पहुँचते ही कल्पनाओं से जेहन में उतरकर सच लगने लगती है नर्मदा और सोन की कहानी ।
जहाँ प्रेम यथार्थ में परिणित होकर दिला जाता है राधा कृष्ण के प्रेम की मधुर याद । जहाँ जनश्रुतियाँ साँस लेती दंतकथाओं के यथार्थ से ऐसे रूबरू होती हैं जैसे हमने भी तो देखा हो इन्हें हूबहू इन्ही कहानियों की तरह ।
वस्तुतः हम समा जाते हैं इन जनश्रुतियों के किरदारों में या ये कहूँ की हम किरदारों में जीने लगते हैं ।

दीवारें तो बस गवाह होती हैं किसी कहानी की किन्तु ऐसी जगहों में आप किरदारों को स्वयं में जीवित पाते हैं ।
आप स्वयं के करीब होते हैं , सौंदर्य के नित नए प्रतिमानों से सुसज्जित ये प्रकृति शिरोमणि दिला जाते हैं नई वजहें खुद में जीने की ।

-- विनय एस तिवारी
 
     "ग्रीष्म ऋतु में मैहर के एक प्रपात में 2006"        

Friday, 1 February 2019

समुद्र तट और पहाड़ में प्रिय


मुझे समुद्र तट में बैठना ज्यादा सुकूनभरा होगा पर्वत के अपेक्षाकृत ।
मैं ज्यादा समय वहाँ बिता सकूँगा पर्वत की तुलना में ।
इसके कई कारण हैं, किंतु, सबसे बड़ा कारण ये है कि समुद्र तट में एक तरह का स्वाभाविक खुलापन होता है जो पर्वत में नहीं, पर्वत लैंड लॉक्ड सरीखे होता है । इसलिए आप समुद्र में ज्यादा तरोताज़ा महसूस करेंगें ।
और पर्वत में सबसे कमी ये है कि ये आपको जमीन से दूर कर देता है जिससे जमीन पर आने की प्रवृत्ति बलवती होती जाती है ।

समुद्रतटीय शहर जैसे लंदन, जैसे न्यूयॉर्क, जैसे इंदिरा पॉइन्ट ( अंडमान निकोबार द्वीपसमूह ) अधिक आनंदप्रद होते हैं ।

वहाँ बयार खुलेपन से आकर आपको स्पर्श करेगी जबकि पहाड़ों में हवा बँधी बँधी सी लगती है ।

पहाड़ी हवाओं में किसी दूसरे देश से संदेश लाने का अनुभव भी नहीं है ।
जैसे किसी दूर देश से सदियों पहले समुद्री व्यापारियों का प्रेम संदेशा आया करता था ,
कभी हवाओं से तो कभी समुद्र से आने वाले समुद्री जहाजों से ।
पहाड़ में उतार है चढ़ाव है, जबकि समुद्र तट दोनों ओर समतल ।
इसीलिए मन ज्यादा देर पहाड़ में नहीं रह सकता ।
पहाड़ अल्पकालिक सुकूनी जगह है जबकि समुद्र तट दीर्घ कालिक ।

आप समुद्र तट में एक झोपड़ी लगाकर बैठ जाइए तो जो सुकून मिलेगा, वो पहाड़ पर बनी जगह नहीं दे सकती ।
हाँ, जब जी भर जाता है समतल से तो फिर चाह उठती है पहाड़ की ।
फिर पसंद आते हैं उतार-चढ़ाव ।
फिर आप निकल लेते हैं देखने गगनचुम्बी चोटियों की ऊँचाई और चढ़ाई को महसूस करने ।

विनय एस तिवारी

शताब्दियों का साक्षी 'बरदहाघाट '

                            (बरदहा घाट )


शताब्दियों का साक्षी 'बरदहा घाट'
__________________________________
यथा मुम्बई से पुणे को जोड़ता है 'भोर घाट' , केरल से तमिलनाडु को जोड़ता है 'पाल घाट' ।
जैसे स्लोवाकिया को पोलैंड से जोड़ता है ' टाट्रा पर्वत श्रृंखला ' ठीक वैसे ही डभौरा को रीवा से जोड़ता है 'बरदहा घाट' ।


डभौरा, मध्यप्रदेश के उत्तर पूर्वी सीमांत की ओर से तथा रीवा जिले का पहला रेलवे स्टेशन है ।
पहला दोनों आयामों में । यानी एक तो रीवा राज्य ( वर्तमान रीवा जिले ) का सबसे पहला स्टेशन , दूसरा मध्यप्रदेश के उत्तर पश्चिमी सीमा का पहला स्टेशन ( सीमा में ) ।
जो इलाहाबाद ( प्रयाग ) से मुम्बई रुट की सभी चिघाड़ती रेलगाड़ियों का बाहें फैलाए स्वागत करता है मध्यप्रदेश में ।जो आगे बढ़ते हुए प्रदेश पार पहुंचती है महाराष्ट्र ।

इसी डभौरा से बस चलना शुरू करती है तो बरहुला,अतरैला होते हुए लगभग आधी दूरी तय करते ही सीना तान कर बाहें फैलाए दिखाई देता है 'बरदहा घाट'  ।


बरदहा घाट रीवा-पन्ना के पठार का पूर्वी छोर है । जिसकी प्राकृतिक लावण्यता देखते ही मानवी नेत्र विस्मय और आनंद से सराबोर हो जाते हैं । जिसकी हरीतिमा देखते ही मंत्रमुग्ध हो जाता है मानव मन ।
वर्षा काल में प्रस्फुटित अस्थाई झरनों की अनगिनत श्रृंखलाओं के कोलाहलिक संगीत नव स्फूर्ति से भर देता है मानवी देह को ।
और जब गर्मियों की तपन इसकी हरियाली को पतझड़ में रूपांतरित करती है तब भी पलास के लाल फूलों से स्वागत करता है ये घाट ।
इसके आसपास टमस (टोंस) नदी की दुग्ध धारा , चचाई जलप्रपात, पावन घिनौची धाम ( लघु झरनों की दुनियाँ )
आदि हैं । मूलतः प्राकृतिक धनाढ्य है विंध्य का ये अंश ।

श्रुतियाँ कहती हैं कि वनवास काल में भगवान राम इन्हीं पर्वत श्रृंखलाओं को पार करते बढ़ गए थे दंडकारण्य ।
लोग आए गए , सदियाँ आई गईं, किन्तु यह घाट आज भी वही सुरभित हवा, प्राकृतिक लावण्यता समेटे दोनो बाहें फैलाए, वही चिर-परिचित अल्हड़पन से हृदयंगम के लिए आतुर है हमेशा की तरह ।
इति ।

विनय एस तिवारी

Friday, 18 January 2019

With the some of precious person of my life


"When we all get togather it feels like blend of tea and I reached the place of book where ocean meet to sky."

I think we all r the character of a book which is just writing now by the writer.
I think someone is just right the story of our and we play role.
Role has decided by writer as like Maharshi Valmiki written Ramayana before the birth of Lord Ram and other.
Just see we all are from many states, many district but we met !!
It's not coincidence it's definitely define by the writer.
You all know ? I think we just move togather in one way but the stope will be come and we all move on own's way.
That time I miss you all.
But we have a time for get together till then let's enjoy every moment.
Your's
Vinay S Tiwari

तुम्हारे लिए उस रेस्तरां में चाय, जब तुम नहीं थे ।




मैंने एकबारगी तुम्हारे बगैर भी चाय पिया था उस रेस्तरां में ।
तुम्हारे लिए ही , ये जानने कि, जब तुम्हें लाऊँगा तो इसकी चाय तुम्हें पसंद आएगी न !!
किसी ने कहा था, कि तुम चाय सबसे लज़ीज़ बनाती हो । तुम्हें बड़ा शौक है चाय पीने का ।
और ये भी कि तुम अपनी बनाई चाय सिर्फ उन्हें पिलाती हो जिनसे मोहब्बत होती है तुम्हें ।
इसी फेहरिस्त में शामिल होने के लिए मैं सोचता था कि मैं तुम्हें चाय पे इनवाइट करूँ और जब तुम रेस्तरां की चाय पियो तो कह दो, कि मैं चाय पिलाऊँगी तुम्हें अपने हांथों से बना कर तब कहना चाय कैसी होती है ?
और इस तरह शायद मैं उस फेहरिस्त में शामिल हो जाऊँ जिनसे तुम्हें प्यार है ।
फिर मैंने कॉफी भी पी लिया था इस अंदेशा से कि कहीं तुम चाय के एवज में कॉफी पीना चाहो तो !!
मैंने कॉफी भी पिया ।
फिर कॉफी नहीं पसंद आई तो मैं गया इंडियन कॉफी हाउस की शायद , तुम्हारे इच्छित स्वाद के तकरीबन तो रहे इन कॉफियों का स्वाद ।

फिर मैं हो आया था थिएटर ! और घूम कर सारी सीटें परख ली थी कि कौन सी सीट तुम्हें सबसे ज्यादा आरामदेह लगेगी ।
लेकिन इत्तेफ़ाक़ तो देखो तुम मिली भी मुझे तो बस में । वो भी ऐसी बस में जो सिर्फ अपने मुक़ाम में पहुँच कर रुकती है ।
और जब उतरा तो कोई और ही शहर था वो ! मुझे नहीं पता था चाय यहाँ कहाँ अच्छी मिलती है ?
तुम्हें चाय न पिला पाने के अफ़सोस में मैं तुमसे पूँछ भी नहीं पाया कि ये तुम्हारा शहर तो नहीं ?
फिर जब मैंने कहा, कि आओ चाय पीते हैं तो तुमने ही तो कहा था न ! कि यहाँ नहीं चलो घर चलते हैं, मैं अच्छी चाय बनाती हूँ , शायद तुम्हें मेरी चाय पसंद आए !!
और मैं ईश्वर द्वारा अपनी इस तरह की पूर्वनियोजित मिलन देख कर हतप्रभ रह गया ।
मुझे यकीन हो गया था कि वाकई ईश्वर हमारे लिए हमसे बेहतरीन तलाश करता है फिर चाहे वो रास्ते हों
या मंज़िल ।

Thursday, 3 January 2019

बात उनदिनों की जब मैं दसवीं में था


नवीं के ठीक बाद,
..जुलाई से हमारी कक्षाएँ आरम्भ हो चुकी थीं । हमारा सेक्शन सी ही था
और सबसे दिलचस्प बात ये थी कि हमारे क्लास टीचर श्री आई.एस. डी. सर थे । क्लास की दिनचर्या वही थी कि प्रार्थना के बाद क्लास में अटेंडेंस ली जाती थी, फिर क्लासेस शुरू ।
जैसा पहले ही बता चुका हूँ कि हम पूरी पीरियड नहीं अटेंड करते थे । ये परंपरा हमने नहीं बल्कि हमारे सीनियर्स ने आरम्भ की थी ।

हमें ये लगता था कि श्री आई एस डी सर को मेरा नाम तो न ही पता होगा क्योंकि न तो हम इंग्लिश के टॉपर थे और न ही इतने वाचाल किस्म के थे ।
लेकिन आश्चर्य मुझे उस दिन हुआ जब मैं रफ से खुद को हवा कर रहा था तो सर ने कहा " विनय इतनी गर्मी नहीं लग रही क्लास में !!"
मेरे लिए क्लास रुक गई थी क्लास ही क्या पूरी सृष्टि रुक गई थी उस पल...।

कितना सुखद आश्चर्य होता है न ,जब आपको आपके पसंदीदा व्यक्ति आपके नाम से पुकारें !!
फिर मैं अपनी बेतरतीबी कम करने लगा था ।

दूसरी पीरियड होती थी विज्ञान की । विज्ञान हमें श्री राजेन्द्र मिश्रा सर पढ़ाते थे ।
लेकिन पहले ही दिन उन्होंने कहा कि ' मैं जो भी पढ़ाऊंगा वो अगले दिन बोर्ड में लिखना पड़ेगा और जो भी नहीं लिखा उसकी धुनाई शुरू !!'
पूरी क्लास सन्न !!
लेकिन मुझे पता नहीं क्यों बहुत खुशी हुई ।
खुशी इस बात से नहीं कि मुझसे बन जाएगा , खुशी इस बात से हुई कि मेरे क्लास के लड़के जो बड़े पढोकर बन रहे हैं सबको अपनी जमीन दिखेगी !
क्योंकि बहुतेरे इस भ्रम में जी रहे थे कि वो बड़े तेज हैं । यद्यपि उनमेसे कुछ अवश्य तेज थे ।
दूसरे दिन जाते जाते सर ने कहा था कि कल मैं दर्पण पूछूँगा !
क्योंकि उस दिन उन्होंने पढ़ाया था ।
दूसरे दिन जब सर ने कहा कि कौन कौन बताना चाहता है तो कई ने हाँथ उठाया, लेकिन मैंने नहीं ।
क्योंकि मेरा मानना था कि जिसका जबाब सबके पास हो उसे देने में कोई सार्थकता नहीं जब कोई न हो तब बताया जाए ।
दूसरी जो बड़ी वजह रही मेरी शर्म और मेरी ज्यादा न बोलने की आदत जो संभवतः आज भी है ।

तो मैंने हाँथ नहीं उठाया लेकिन जब किसी ने सर की मर्जी मुताबिक न बताया तब आखिरी में मैंने हाँथ उठाया । मैं कैसा समझाया ये मुझे तब एहसास हुआ जैसे ही मैंने अपना लेक्चर बन्द किया और पूरी क्लास तालियों से गूँज गई ।
लेकिन इन्हीं तालियों के बीच मैने सर की ओर देखा क्योंकि मुझे लग रहा था कि अगर उन्हें न जँचा तो पिटाई तय ।
लेकिन जैसे ही मैंने उनके चेहरे में खुशी की झलक देखी मैं नाच उठा ।
उस दिन मुझे एहसास हुआ कि मैं एक टीचर बन सकता हूँ । मेरा आत्मविश्वास लौट आया ।

बात कुछ दिन बाद की है जब हमारे बोर्ड के फॉर्म आने वाले थे तब श्री आई एस डी सर प्रिंटेड बायो-डाटा मँगा रहे थे ।
उन्होंने एक हफ्ते का टाइम दिया और लगभग आधे बच्चों ने दो-तीन दिन में ही जमा कर दिया ।
मैं भी अगर खुद से बनवाता तो दूसरे दिन ही जमा कर दिया होता लेकिन वीरेंद्र ( जो नवीं में आखिरी में दोस्त बना था ) ने कहा की मेरे पड़ोस में एक बनाते हैं उनसे बनवा दूँगा । मैंने भी सोचा चलो ये बनवा लेगा तो क्यों परेशान हों मैंने भी दे दिया ।
लेकिन वो रोज बहाने बना देता मुझे नहीं पता वो बहाने सच थे या झूठ ।
लेकिन आखिरी दिन जब सर ने कहा कि किस किस ने बायो डाटा नहीं जमा किया तो लगभग मेरे साथ आधी क्लास खड़ी हो गई ।
और सर ने पिटाई शुरू की मैं सबसे दाहिनी रो में था सो मेरा आखिरी नंबर था
लेकिन जब एक लड़का पिट रहा था ( स्मरण नहीं हो रहा कौन था ) तो हर डंडे पर उसकी जीभ निकल आती जिससे मुझे हँसी आ जाती , इसका आलम ये हुआ कि सर ने मुझे देख लिया हँसते और इत्तेफ़ाक़न मेरे तक पहुँचते पहुँचते लता की बेंत टूट चुकी थी ।
और परिणीति में मुझे हाँथ से दो चाटे पड़े ।

इस वकया से मुझे जो सबसे बड़ी सीख मिली वो ये की अपना काम खुद करो तभी समय में होगा ।
फिर मुझे याद आई वो कहानी " जिसमें किसी गेंहूँ के खेत में एक चिड़िया अंडे देती है कुछ दिन बाद जब उसके बच्चे थोड़े बड़े होते हैं तो एक दिन मालिक आता है और कहता है कि गेंहू कटवा दो, फिर कहता है कल मजदूर बुला कर कटवा दो जिसे सुनकर चिड़िया के बच्चे कहते हैं कि वो गेहूँ कटवा देगा चलो
तिस पर उनकी माँ कहती है गेहूँ कल नहीं कटेंगे अगले दिन किसान फिर आता है और कहता है कल हम खुद काटेंगे तब चिड़िया अपने बच्चे लेकर उड़ जाती है ।"

दसवीं में ही कुलदीप मेरे साथ आया । वो मुझसे एक साल पीछे था , छोटी छोटी और कहानियाँ हुई उन पर चर्चा विस्तार से फिर कभी ।
दसवीं में ही मैं थ्रो-बॉल में स्टेट गया और इसमें पी टी आई सर श्री शिष्टधर शर्मा सर का आशीर्वाद और स्नेह था ।

हम फिर क्लास में आते हैं , दूसरी पीरियड के बाद दस मिनट का ब्रेक होता था फिर संस्कृत की पीरियड  और इसके बाद गणित की ।
संस्कृत हमें श्री उमाकांत द्विवेदी सर पढ़ाते थे मैं उनसे पहले से परिचित था क्योंकि वो मेरे रिश्ते में लगते थे , गणित मुझे श्री नीरज पांडे सर पढ़ाते थे ।
शुरू में मैं इनके ज्यादा नजदीक नहीं था बल्कि मैं ही नहीं लगभग पूरी क्लास ।
कारण ये था कि गणित की पीरियड हमारे क्लास में अंग्रेजी मीडियम के स्टूडेंट भी आते थे चूंकि उनकी संख्या कम थी तो एक पीरियड हमारे साथ आते थे तो पाण्डेय सर उन्हें कुछ ज्यादा ही मानते थे उनके मन में संभवतः ये धारणा थी कि अंग्रेजी माध्यम का कमजोर बच्चा भी हिंदी माध्यम के बच्चों से ज्यादा पढ़ाकू होता है ।
ठीक वैसे जैसे " अखाड़े का पिटइया भी बाहर वालों से मजबूत होता है ।"
इसके लिए उन्होंने उनके लिए एक पूरी रो (row ) ही छुड़वा दिए जिससे हमें पीछे बैठना पड़ता था या हम उस रो में बैठें तो जब वो आए तो बैग नीचे फेंक दें ।

उस समय श्री आई एस डी सर के पैर में चोट आ गई थी या शायद एक्सीडेंट हो गया था मुझे स्पष्ट स्मरण नहीं है किंतु जब हमने शिकायत की तो सर क्लास आए मैथ की पीरियड में और निराकरण हुआ कि लड़कियों की दो सीट छोड़ कर जो बाद में आए वो जहाँ सीट पाए वहाँ बैठे ।
हालाँकि हम दो सीट छोड़ कर ही बैठते थे सो फैसला हमारे पक्ष में हुआ ।

बाद में नीरज सर हम लोगों को भी मानने लगे ।

लंच के बाद लगती थी शोभा मेम की क्लास जो हमे सोशल साइंस पढ़ाती थीं । आरम्भ में मैं उनकी क्लास किया किन्तु एकबार जब उन्होंने मुझसे पूंछा दोहरी नागरिकता के बारे में तो मैंने उन्हें बताया तिस पर उन्होंने कहा कि किताब रट के बता रहे और बेवजह दो छड़ी मार दीं सो उस दिन से हम शुरू के चार पीरियड पढ़ के खेल की प्रैक्टिस में लग जाते थे । हालाँकि बाद में वो भी मुझे मानने लगीं थीं कैसे ! ये फिर कभी ।
इस तरह हमारी दशवीं भी समाप्त हो गई ।
इस दशवीं में कुछ लोग जो मेरे बेहद करीब आए उनमें मेरे क्लास टीचर और साइंस टीचर मेरे दोस्तों में शुभम , अर्पित , और कुछ कुछ वेरेन्द्र , देवेंद्र ।

अस्तु, मेरी ज़िंदगी मेरे अपने बलबूते पर नहीं खड़ी है इसमें मेरे माता-पिता , भाई-बहन से लेकर गुरुजनो और मित्रों तक का अमूल्य सहयोग है सो सबका कोटि कोटि धन्यवाद ।


"जीवन के इस पग तक आने में कितनों की इच्छाएँ टूटीं ,
कितनों के उर तक पहुँच सका, ये तो कहना मुश्किल है ।
मुझे बड़ी उम्मीद बंधीं है और संभलती जाती है,
कितनो का है प्रेम मेरे तक, कितनों की अभिलाषाएँ हैं,
किन्तु कहाँ तक पहुँच सकूँगा ये तो कहना मुश्किल है ।"

Tuesday, 4 September 2018

शिक्षक दिवस

हर पूर्ववर्ती वर्ष की तरह सामयिक वर्ष में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मानते हैं और खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं ,ऐसे शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त कर जिनकी शिक्षण पद्धति साक्षरता से एक कदम आगे बढ़ कर विद्यार्थियों को शिक्षित करने की है । उनका यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है भारत के शैक्षिणिक विकास के लिए ।
किन्तु, क्या हम एक कदम और आगे नहीं बढ़ सकते ?
क्या हम लोगों में पुस्तकें पढ़ने की अभिरूचि पैदा नहीं कर सकते ?

मैंने सुना है रूस में हर गांव में पब्लिक लाइब्रेरी है जिसमें जब भी लोग काम से फुर्सत होते हैं तो जा कर अध्ययन करते हैं...।
और हमारे यहाँ गांव में तो दूर शहरों तक में लोग काम के बाद अपना सारा समय हास-परिहास और उपहास में गुजारते हैं ।

मैं रीवा के सेंट्रल लाइब्रेरी में अपने विद्यालयीन दिनों में जाता था और मुझे इस बात से आश्चर्य होता था कि लोग उसका नाम तक नहीं जानते थे ..!

एक जर्जर भवन जिस पर छोटे से उपेक्षित पड़े बोर्ड पर 'केंद्रीय पुस्तकालय ' लिखा था जिसके केन् और पुस्त मिट चुका था । और उसमें जाते भी चन्द गिने चुने लोग थे । बहुधा उसके कर्मचारी ही पाठक भी हुआ करते थे ।

अगर हम सच में शिक्षा की क्रांति चाहते हैं तो लोगों में किताबों के प्रति रूचि पैदा करनी होगी ,एक अभीप्सा एक कौतूहल पैदा करनी होगी  ।
हम इस बात से संतुष्ट रहते हैं कि हमारा बेटा अपने कक्षा की पुस्तकें पढ़ ले बस । यह नितांत तौर पर आवश्यक है पर क्या इन किताबों से इतर कोई और किताब खाली समय में नहीं पढ़ सकता ।

थोड़ा बड़े होने पर हमारा रुख एक और पुस्तक तरफ होता है तुलसीदास जी की 'रामचरित मानस' । लोग उसकी चौपाइयों का क्या खूब उद्धरण करते हैं कि स्वयं तुलसीदास जी भी शरमा जाएं । लेकिन हम समझते नहीं ,जीवन में उतारते नहीं ।
ठीक उसी तरह जैसे शहद मीठी है कहने से स्वाद नहीं मिलता , उसे चखना पड़ता है ।
जो खुद को थोड़ा बड़े बुद्धिजीवी मानते हैं वो 'श्रीमद्भागवत '
को पढ़ते हैं । ध्यान देने वाली बात ये है उनकी भी यह पढ़ने की प्रवृत्ति नैसर्गिक नहीं है एक दिखावा है बस कुछ विद्वज्जनों को छोड़ कर जो यथार्थ में जिज्ञासावश अध्ययन करते हैं...
जबकि उनका उद्देश्य लोगों के बीच चौपाइयों ,श्लोकों को बांच कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना होता है ।

तो इस शिक्षक दिवस क्यों न हम रूचि पैदा करें पढ़ने के प्रति और इसकी शुरुआत विद्यालय से ही संभव है ।

अस्तु , आप सभी को शिक्षक दिवस की कोटि-कोटि शुभकामनाएँ ।

इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...