Sunday, 13 September 2026

इत्यलम् (मेरी डायरी)


13 सितंबर 2026

प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा

आज Facebook पर मेरे एक Philosophy Professor की एक पोस्ट पढ़ी। उन्होंने Utkal University के Department of Philosophy में अपने PG के दिनों की, यानी 1980 के दशक के उत्तरार्ध की, एक पुरानी तस्वीर साझा की थी। AI की सहायता से उस तस्वीर को फिर से जीवंत करते हुए उन्होंने जैसे अपने उस युवा विद्यार्थी-जीवन में लौटने का अनुभव किया था।

पोस्ट पढ़ते हुए लगा—मनुष्य कितना भी आगे बढ़ जाए, अपने अतीत की ओर लौटने की इच्छा शायद कभी समाप्त नहीं होती। कुछ स्मृतियाँ सचमुच पुरानी नहीं होतीं; वे भीतर कहीं सुरक्षित रहती हैं और अवसर मिलते ही फिर जीवित हो उठती हैं।

मैंने उनकी पोस्ट पर टिप्पणी की—

“A beautiful journey back in time, Sir! Some memories never really grow old—they only wait to be brought alive again. Truly, the reel meets the real!”

Professor ने उत्तर दिया—

“Thank you so much for your warm and thoughtful words!”

उनका यह उत्तर अच्छा लगा। विशेषकर “warm and thoughtful” शब्दों ने ध्यान खींचा। लगा कि उन्होंने मेरी टिप्पणी को केवल औपचारिक प्रशंसा के रूप में नहीं, बल्कि उसके भाव और विचार को भी देखा।

लेकिन इसी पोस्ट पर हुई आगे की बातचीत और भी रोचक थी।

किसी ने ओड़िया में टिप्पणी की कि उस समय सीढ़ियों के दोनों ओर रेलिंग नहीं थी।

मैं वहीं ठिठक गया।

यह एक बहुत छोटी-सी बात थी, लेकिन उसमें एक बड़ी बात छिपी थी।

AI अतीत को उपलब्ध तस्वीरों और सूचनाओं के आधार पर कल्पना में फिर से बना सकता है। वह किसी पुराने दृश्य को सुंदर ढंग से प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन उस समय वास्तव में वहाँ क्या था—सीढ़ियों पर रेलिंग थी या नहीं, भवन कैसा था, वातावरण कैसा था—इन बातों की सबसे प्रामाणिक जानकारी उस व्यक्ति के पास ही हो सकती है, जिसने उस समय वहाँ स्वयं उपस्थित होकर उसे देखा और जिया हो।

मैंने इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए टिप्पणी की कि AI अतीत को कल्पना में फिर से जीवंत कर सकता है, लेकिन उस समय की वास्तविक स्मृतियाँ तो उन्हीं लोगों के पास होती हैं जो उस समय वहाँ उपस्थित थे। ऐसी स्मृतियाँ AI द्वारा बनाई गई reel को और अधिक वास्तविक बना देती हैं।

Professor ने मेरी बात को समझा और अपने उत्तर में लिखा कि उस समय वहाँ उपस्थित लोगों की ऐसी स्मृतियाँ AI-generated past को अधिक realistic बनाती हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि AI उपलब्ध visual material के आधार पर interpolation और extrapolation करता है। चूँकि उस समय की Department की ऐसी पुरानी तस्वीर उपलब्ध नहीं थी जिसमें रेलिंग न हो, इसलिए AI ने वर्तमान तस्वीर को आधार बनाया और कल्पना से उन्हें late 80s में पहुँचा दिया।

यह पढ़कर मन में एक संतोष-सा हुआ।

मेरी छोटी-सी टिप्पणी अब एक परिचर्चा का रूप ले चुकी थी।

Professor ने आगे अपनी एक इच्छा भी बताई—वे अपने उस समय के शिक्षकों के साथ AI की सहायता से एक group photograph बनवाना चाहते हैं। उनके पास उन दिनों की कोई group photograph नहीं है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि शायद किसी पुराने साथी ने ऐसी कोई तस्वीर संभालकर रखी हो।

इस बात ने मुझे और सोचने पर मजबूर किया।

आज AI के पास अतीत के दृश्य को फिर से बनाने की अद्भुत क्षमता है। लेकिन जिस अतीत को हम खो चुके हैं, उसकी एक छोटी-सी वास्तविक तस्वीर पाने के लिए आज भी हमें उन्हीं मनुष्यों की स्मृति की ओर देखना पड़ता है, जिन्होंने वह समय जिया था।

AI अतीत को दिखा सकता है, लेकिन स्मृति ही उसे जीवित करती है।

शायद यही इस छोटी-सी Facebook परिचर्चा का सबसे सुंदर निष्कर्ष है।

एक साधारण-सी पुरानी तस्वीर से शुरू हुई बात स्मृति, वास्तविकता, AI और मानवीय अनुभव तक पहुँच गई।

और मुझे ऐसी बातचीत अच्छी लगती है।

शायद Philosophy भी कुछ ऐसी ही है—सामान्य-सी दिखाई देने वाली किसी बात में छिपे हुए प्रश्न को पकड़ लेना और फिर उसके पीछे थोड़ा दूर तक चलते चले जाना।

                                               ______________


15 सितम्बर 2026

चितहरा रेलवे स्टेशन क्रॉस करते हुए ।              09:14 AM 

मानिकपुर से सतना की ओर — राम की वनभूमि में ।

आज मानिकपुर से सतना की ओर जा रहा हूँ। रास्ते में चारों ओर फैली ये पहाड़ियाँ और जंगल देखकर मन बार-बार उसी युग में चला जाता है, जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने अपने वनवास के वर्षों में इन वनांचलों में भ्रमण किया था।

मन में एक विचित्र-सा विचार उठता है—ये भूमि कितनी सौभाग्यशाली रही होगी!

इन पहाड़ियों ने कभी राम के चरणों को स्पर्श किया होगा।
इन वृक्षों ने उन्हें अपने बीच से गुजरते देखा होगा।
इन जंगलों ने माता सीता और लक्ष्मण जी की उपस्थिति को अनुभव किया होगा।
और यहाँ की मानव सभ्यताएँ—वे कितनी भाग्यशाली रही होंगी, जिन्हें राम के सान्निध्य का अवसर मिला होगा।

आज हम इन स्थानों से गुजरते हुए केवल पहाड़ और जंगल देखते हैं, लेकिन यदि स्मृति और श्रद्धा की आँखों से देखें तो यही वनभूमि इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म की एक जीवित स्मृति बन जाती है।

राम केवल एक आदर्श पुरुष या नायक ही नहीं थे; वे योद्धा भी थे। उन्होंने जिन राक्षसों का सामना किया, उन्हें केवल किसी एक जाति या समुदाय के रूप में देखना शायद उस कथा के व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। वे उन कुप्रवृत्तियों और अत्याचारों के प्रतीक भी हैं, जिनसे किसी भूमि और समाज को मुक्त करना आवश्यक होता है।

और फिर माता सीता...

उनकी रसोई और उनकी उदारता की कल्पना ही मन को छू जाती है। वनवास में भी उनका जीवन केवल अपने लिए नहीं था। उनके हाथों से बना भोजन और उसमें निहित आत्मीयता शायद यह सिखाती है कि अभाव के बीच भी उदारता संभव है और साधारण-सी रसोई भी प्रेम का तीर्थ बन सकती है।

इन्हीं विचारों में डूबा हुआ आगे बढ़ता हूँ तो मानिकपुर के बाद ट्रेन जैतवारा स्टेशन पर रुकती है। यहाँ से अगला स्टेशन सतना है।

अब दृश्य कुछ बदल जाता है। वही धरती, वही क्षेत्र—लेकिन सामने आज का मनुष्य है।

जैतवारा से ट्रेन में तरह-तरह के यात्री चढ़ते-उतरते हैं। कोई छात्र है, जो पढ़ाई के लिए जा रहा है। कोई महिला डॉक्टर को दिखाने जा रही है, कोई किसी दूसरे आवश्यक काम से। कुछ लोग अपने कार्यालय की ड्यूटी के लिए यात्रा कर रहे हैं। इनके बीच प्रौढ़ और बुजुर्ग यात्री भी हैं।

वास्तव में, यह बड़ा विविधतापूर्ण यात्री स्टेशन है।

किसी की यात्रा शिक्षा के लिए है, किसी की स्वास्थ्य के लिए, किसी की रोज़गार के लिए और किसी की जीवन की दूसरी आवश्यकताओं के लिए। सबके अपने-अपने उद्देश्य हैं, अपनी-अपनी चिंताएँ हैं और अपनी-अपनी मंजिलें हैं।

कुछ क्षणों के लिए लगता है—कभी इसी धरती पर राम अपने वनवास की यात्रा कर रहे थे और आज इसी धरती पर असंख्य सामान्य मनुष्य अपनी-अपनी छोटी-बड़ी जीवन-यात्राओं पर निकले हुए हैं।

युग बदल गया, यात्री बदल गए, यात्राओं के उद्देश्य बदल गए—
पर यात्रा अब भी जारी है।

और शायद यही इस भूमि की सबसे बड़ी विशेषता है—
यह केवल राम की स्मृतियों को ही नहीं सँजोए हुए है, बल्कि आज भी असंख्य मनुष्यों के जीवन की यात्राओं की साक्षी बनी हुई है।

ट्रेन अब सतना की ओर बढ़ रही है।...

- विनय शंकर तिवारी

Sunday, 5 July 2026

अंशू का मुंडन संस्कार

24 जून 2026

आज का दिन अंशू  के जीवन के प्रथम संस्कारों में से एक—उसके मुंडन संस्कार—का पावन अवसर था। घर में कई दिनों से इसकी तैयारी थी और आज वह शुभ घड़ी भी आ गई। हम सब प्रातः ही मैहर देवी माँ के दर्शन और अंशू के संस्कार के लिए निकल पड़े। आशा दी, गुड़िया दीदी, भाभी, रिंकू और आयुष, पवन जीजा, प्रमोद, उनकी मम्मी (भाभी) तथा जर्मई वाली भाभी—सभी साथ थे। इतने अपने एक साथ हों तो यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहती, वह अपनेपन का चलता-फिरता उत्सव बन जाती है।

किन्तु इस उल्लास के बीच कुछ रिक्त स्थान भी थे, जो बार-बार मन को छू जाते थे। पापा और मम्मी इस यात्रा में साथ नहीं आ सके। पापा की ओपन हार्ट सर्जरी के बाद अब भी लंबी यात्राएँ उनके लिए कष्टदायक हो जाती हैं, और मम्मी को यात्रा में उल्टियों की इतनी समस्या होती है कि पहुँचते-पहुँचते ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। मन बार-बार चाहता था कि वे भी अंशू के इस प्रथम संस्कार के साक्षी बनते, पर जीवन में हर इच्छा तत्काल पूर्ण हो जाए, ऐसा कहाँ होता है?

गुड्डू भइया का न आ पाना भी भीतर कहीं खलता रहा। मन में आशा थी कि यदि संजय भइया की जमानत हो जाती तो वे भी आ जाते, किंतु न्यायालय में सुनवाई ही टल गई। कुछ प्रतीक्षाएँ मनुष्य करता है, कुछ प्रतीक्षाएँ समय स्वयं कराता है। शायद ईश्वर ने अभी उस मिलन का समय सुरक्षित रखा है।

देवी का मंदिर पर्वत-शिखर पर स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग एक सहस्त्र सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। हमारे साथ कुछ ऐसे लोग थे जिनके लिए इतनी लंबी चढ़ाई कठिन होती, इसलिए निश्चय हुआ कि सभी लोग रोप-वे से ही ऊपर जाएँगे।

रोप-वे की लंबी कतार को देखकर लगा कि आज का मनुष्य सुविधा के अधिक निकट और श्रम के कुछ दूर खड़ा हो गया है। शायद यह समय की माँग भी है; जीवन की दौड़ ने उसे विश्राम का अभिलाषी बना दिया है। मैं किसी के चुनाव का निर्णय नहीं करता, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं। किंतु अपने मन की बात कहूँ तो जब तक शरीर स्वस्थ और समर्थ है, पर्वत की सीढ़ियाँ मुझे प्रार्थना का ही विस्तार लगती हैं। प्रत्येक पग मानो अहंकार को थोड़ा-थोड़ा पीछे छोड़ता हुआ श्रद्धा के और निकट ले जाता है। जिस चित्-शक्ति के मूर्त स्वरूप के दर्शन के लिए हम जा रहे हों, वहाँ तक पहुँचने में यदि तन का थोड़ा श्रम भी लग जाए, तो वह श्रम नहीं, भक्ति का मौन अर्घ्य बन जाता है। वृद्धावस्था आएगी तो उसका भी सम्मान करूँगा, क्योंकि वह काल का विधान है; पर आज जब पैरों में सामर्थ्य है, तब सीढ़ियाँ मुझे रोप-वे से कहीं अधिक आत्मीय प्रतीत होती हैं।


आज मुंडन का बड़ा मुहूर्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आने वाला प्रत्येक तीसरा व्यक्ति अपने बच्चे का मुंडन कराने ही आया हो। हम प्रातः नौ बजे ही मंदिर की पार्किंग में पहुँच गए थे, किंतु रोप-वे का समय एक से दो बजे का मिला। फिर बीच में दर्शन कुछ समय के लिए बंद हो गए, जिससे और विलंब हुआ। अंततः लगभग चार बजे हमें रोप-वे में बैठने का अवसर मिला और साढ़े चार बजे तक माता के दर्शन सम्पन्न हुए।

इतनी प्रतीक्षा के कारण अनेक परिवारों ने रोप-वे में जाने से पहले ही अपने बच्चों का मुंडन करवा लिया था। एक क्षण को हमने भी ऐसा करने का विचार किया, किंतु सुनीता ने बड़े सहज भाव से कहा—"हम मुंडन संस्कार के लिए ही आए हैं, इसलिए अंशू पहले अपनी झालर सहित माता के दर्शन करेगा, उसके बाद ही उसके केश उतारे जाएँगे।" उसके इस आग्रह में श्रद्धा की ऐसी सरलता थी कि फिर कोई दूसरा विचार मन में आया ही नहीं। सच ही है, संस्कार केवल कर्मकाण्ड से नहीं, भावना से पूर्ण होते हैं।

दर्शन के पश्चात् अंशू का मुंडन सम्पन्न हुआ। आश्चर्य यह कि उसने तनिक भी रोना नहीं। वह पूरे समय कौतूहल से इधर-उधर देखता रहा। रिंकू ने उसके हाथ में मोबाइल दे दिया और देखते-देखते पूरा संस्कार बड़ी सहजता से संपन्न हो गया।

मुंडन के बाद जब मैंने उसे देखा तो लगा जैसे उसका सौंदर्य और अधिक उज्ज्वल हो उठा हो। उसका निर्मल मस्तक किसी नवोदित चन्द्रमा की शीतल आभा बिखेर रहा था। तभी मन में एक सुंदर कल्पना उभरी—शायद अंशू का जन्म महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व इसलिए हुआ कि वह भगवान शिव के जटाजूट में सुशोभित शशांक की भाँति इस संसार में अपनी निष्कलुष मुस्कान से प्रकाश फैलाए। उस क्षण उसका मुख सचमुच चन्द्र-कला-सा शांत और मोहक लग रहा था।

संस्कार के उपरांत हम सबने साथ बैठकर भोजन किया। पूड़ियाँ गाँव में बनी थीं और सब्ज़ी रीवा में। घर से आया हुआ भोजन केवल स्वाद नहीं देता, वह अपने लोगों का स्नेह भी साथ लेकर आता है। खुले आकाश के नीचे, परिवार के बीच बैठकर किया गया वह साधारण भोजन भी किसी राजभोज से कम नहीं लगा।

संध्या ढलते-ढलते विदा का समय आ गया। लगभग नौ बजे हम रीवा लौट आए। मन की इच्छा थी कि मैं, सुनीता और अंशू गाँव भी चले जाएँ, ताकि पापा-मम्मी का आशीर्वाद अंशू को मिल सके। किंतु छह तारीख को मेरी परीक्षा है। सुनीता ने व्यावहारिक पक्ष सामने रखा—अभी जाने पर दो छुट्टियाँ लेनी पड़ेंगी, और यदि भइया की जमानत हो गई तो गाँव जाना ही होगा।

इसलिए आज की रात एक छोटी-सी प्रार्थना के साथ समाप्त हो रही है। ईश्वर से यही निवेदन है कि पापा शीघ्र पूर्ण स्वस्थ हों, मम्मी प्रसन्न रहें, भइया के जीवन में भी शुभ समाचार आए और परिवार के सभी बिखरे हुए क्षण पुनः एक साथ बैठ सकें। यदि परमात्मा की कृपा से ऐसा हो गया, तो आज का यह संस्कार केवल अंशू के जीवन का ही नहीं, पूरे परिवार के जीवन का भी एक पूर्ण मंगल अध्याय बन जाएगा।

आज का दिन स्मृतियों में चिरस्थायी हो गया। समय के साथ अंशू के सिर पर फिर केश आ जाएँगे, पर आज उसकी निष्कलुष मुस्कान, माता के चरणों में उसका प्रथम संस्कार और परिवार के प्रेम से भरा यह दिन मेरे हृदय की डायरी में सदैव उज्ज्वल बना रहेगा।

विनय

Tuesday, 31 March 2026

एक काली चिड़िया और मेरे भीतर का द्वंद्व

रात के लगभग आठ बजे का समय था। घर में एक शांत-सा सन्नाटा पसरा हुआ था। दिन का शोर थम चुका था और रात की स्थिरता धीरे-धीरे कमरे में उतर रही थी। तभी अचानक एक छोटी-सी चिड़िया मेरे कमरे में आ गई।

आकार में वह गौरैया जैसी थी, पर उसका रंग काला था—जैसे वह उजाले से नहीं, किसी छाया से बनी हो। वह घबराई हुई थी। कभी पंख फड़फड़ाती, कभी दीवार की ओर उड़ती, कभी खिड़की के पास आकर ठहर जाती। ऐसा लग रहा था मानो वह कमरे में नहीं, किसी अनजाने डर में भटक रही हो।

पहले ही क्षण मेरे भीतर करुणा जागी। लगा—यह कोई बेचारी प्राणी है जो गलती से मेरे संसार में आ गई है और अब बाहर जाने का रास्ता खोज रही है। मैंने उसके सामने थोड़ा-सा फल रखा, एक कटोरी में पानी भी रख दिया।

लेकिन उसी समय मेरे छोटे से बेटे का ख्याल मन में आया। वह अभी इतना नन्हा है कि किसी भी डर को समझ नहीं सकता। इसलिए मैंने उसे धीरे से दूसरे कमरे में कर दिया—जैसे पहले उसके भय को सुरक्षित कर दूँ और फिर उस चिड़िया के लिए कुछ क्षण छोड़ दूँ।

कुछ देर तक मैं चुपचाप खड़ा रहा। चिड़िया सामने रखे फल और पानी को देखती रही, पर शायद वह इतनी घबराई हुई थी कि वह कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकी। उस मौन में मुझे लगा—कभी-कभी दया देना आसान होता है, पर दया को स्वीकार करना उतना ही कठिन।

फिर वह क्षण आया जब मुझे निर्णय लेना पड़ा। करुणा और जिम्मेदारी दोनों मेरे सामने खड़ी थीं—एक कहती थी “उसे रहने दो”, दूसरी कहती थी “पहले अपने बच्चे की सुरक्षा देखो।”

और आखिरकार मैंने उसे सावधानी से कमरे से बाहर निकाल दिया।

मैंने उसे भगाया नहीं, बस धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर कर दिया—जैसे किसी भटके हुए यात्री को रास्ता दिखाया जाता है। वह बाहर उड़ गई, और कमरे में फिर वही शांति लौट आई, पर मेरे भीतर एक गहरा मौन रह गया।


उसके जाने के बाद मैंने अपने आप से पूछा—क्या वह केवल एक चिड़िया थी? या वह मेरे भीतर छिपे उस मनुष्य को दिखाने आई थी, जो एक साथ दयालु भी है और डरा हुआ भी?

शायद वह कोई संकेत नहीं थी, कोई दैवीय घटना भी नहीं। लेकिन वह एक दर्पण जरूर थी—जिसमें मैंने अपने भीतर के दो चेहरे देखे। एक जो हर जीव के लिए पिघल जाता है, और दूसरा जो अपने प्रिय की रक्षा के लिए कठोर भी हो सकता है।

आज मुझे लगा कि मनुष्य होना शायद इसी संतुलन का नाम है—करुणा और भय के बीच, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के बीच, और प्रेम और सुरक्षा के बीच।

रात के उस छोटे-से क्षण में एक काली चिड़िया आई थी, पर जाते-जाते वह मेरे भीतर एक गहरा प्रश्न छोड़ गई—
क्या दया और जिम्मेदारी साथ-साथ चल सकती हैं?

शायद हाँ।
क्योंकि आज मैंने उसे भगाया नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित बाहर जाने का रास्ता दिया—और अपने भीतर के मनुष्य को भी थोड़ा और समझ लिया। 🌿🌙

- विनय

30 मार्च 2026, 08:30 PM




Sunday, 20 July 2025

मेरे आत्मज... (डायरी)




इस डायरी में, कुछ स्मृतियाँ संजोकर रखना चाहता हूँ अंशु के लिए, ताकि जब वो बड़ा हो और उसे स्वयं को जानने की अभीप्सा हो तो अपने अतीत की ओर मुड़ सके और अतीत को शब्दों में जीते हुए अपने वर्तमान को सुनिश्चित कर सके । स्वयं को पहचान कर अपना मार्ग प्रशस्त कर सके ।



09 मार्च 2024, शनिवार | 4:30 AM | पुरानी वरदान हॉस्पिटल 

मैं अपने बेटे अंशु को लेके आज वरदान हॉस्पिटल में हूं । दो दिन ही जन्म लिये हुआ है और पीलिया हो गई है अंशु को ।
डॉ शब्द सिंह यादव जी ने बताया कि यह सामान्य है बच्चों में पीलिया हो जाना । अंशु को मां का दूध भी नहीं निकल रहा था और जो बच्चों के डॉ आए थे 07 मार्च को अंशु के पैदा होने पर देखने, उन्होंने कोई अल्टरनेट पाउडर भी पिलाने को नहीं लिखा । सो कमजोरी भी लग रही थी उसे, इसीलिए और शिकस्त हो गया है अंशु। 
अंशु को नर्सरी में फोटोथेरेपी में रखे हैं ।

यहीं, एक परिवार में अभी-अभी बालक का जन्म हुआ है ।
सब खुश हैं, बच्चे का चाचा जो कि अभी लगभग 20 वर्ष का होगा, उसका नाम किसन है । वो अभी अपनी माॅं को बता रहा था की लल्ला हुआ!
कितने उमंग से बता रहा था!
वो बहुत प्रसन्न है ।
मैंने कहा - चाचा बन गए, बधाई हो! कहने लगा, सबको मिठाई खिलाऊॅंगा, आपको तो ढूॅंढ़ कर खिलाऊॅंगा! 
मैं मुस्कुरा दिया ।
 मेरे मन में यह बात उठी कि शायद यही आत्मीयता भारतीय जनजीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।"


दिनाँक : 27 नवंबर,2024

अंशू ननिहाल में हैं । आज अंशु से वीडियो कॉल में बात हुई तो मुझे देख कर रोने लगा। । मेरे पास आना चाह रहा था, क्योंकि इधर उसका विशेष स्नेह हो गया है मुझसे । इसका कारण यह है की उसे मैं गोद में लेके घुमाता हूं । उसे घूमना, तरह तरह की चीजें देखना पसंद है । मेरे साथ वह थोड़ी शरारत भी कर सकता था जैसे फ्रिज कवर को खींचना, जाली से प्लेट, कटोरी अपने से लेले लेना आदि..
उस दिन जब मैं किचेन में प्यूरी बना रहा था उसके लिए तब, पहली बार अंशू क्रॉलिंग करते हुए रूम से किचेन तक का सफर स्वयं तय किया ! यह दिन था 20 नवंबर 2024 दिन के लगभग 11 बजे ।
यह दिन ऐतिहासिक था उसके लिए । अभी तक एक दो कदम ही क्रोलिंग करता था । अब वह दोनो कमरों और किचन में तो पहुंचता ही रहता है ।
फर्श की टाइल्स काफी ठंडी रहती है इसलिए हमें उसे दस्ताने पहनाने पड़ते हैं जो उसे अच्छे नहीं लगते, मुझे भी अच्छा नहीं लगता उसका ‘अच्छा न लगना’ ।
तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक है इसलिए तुम्हे पहनना ही होगा मेरे आत्मज ।
अंशू शायद समझ गया है कि इसे पहनना ही होगा । 
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दिनाँक 09/12/2024

अंशू के लिए आज वॉकर लाया । अंशू देखकर बहुत खुश हुआ ।
मैं वॉकर के पहिए साज रहा था और अंशू उन्हें निगरानी करते हुए  घुमा-घुमा कर देख रहा था । और सजने के बाद तो सवारी का लुत्फ खूब उठाया अंशू ने ।
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 दिनाँक 12/12/2024

अंशू अब वॉकर को अपने पैर से चलाने लगा है । दोनो कमरे, किचन और बालकनी वॉकर के पहिए की गड़गड़ाहट से गुलजार रहती है । उसे चलाना अच्छा लगने लगा है, उस समय उसकी मुस्कुराहट देखते बनती है ।

अब मुझे भी थोड़ा आराम मिलने लगा है । क्योंकि गोद में लिए रहने का टाइम कम हो गया है । दोपहर मे अंशू के जगने के बाद छत ले जाता हूं जिससे दो कार्य सिद्ध होते हैं - पहला तो यह की धूप लगने लगती है और दूसरा अंशू क्रालिंग कर लेते हैं छत में ।
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 दिनाँक 1 मार्च,2025

प्रिय आत्मज के लिए - 
अंशू आज अपने ननिहाल चला गया मौसी की सगाई में ।
सुबह उठा तो ठीक था किंतु जब मुझे न देखा और घर भी बदला सा लगा तो रोने लगा ।
सुनीता बताई कि किसी तरह रोना बंद किया । फिर वीडियो कॉल में जैसे ही मुझे देखा फिर बहुत रोने लगा । 
परसों सुबह जाऊंगा तो निस्संदेह बहुत खुश होगा!
और मैं यहाँ चाय पीते हुए अपने छज्जे में बैठे कबूतरों और गौरैया के कृत्यों को देख कर कहने लगा - 

ओ कबूतरों!
तुम्हारा दृष्टा चला गया ननिहाल।
जो देखता था 
तुम्हारी क्रियाओं को कौतूहल से
आश्चर्य करता और खिलखिलाता 
 तुम्हारी उड़ान से ।
ओ गौरैया!
तुम्हारी फुर्र सी उड़ान गुदगुदाती थी उसे
तुम्हारे तिनका उठाने से सीखता है जो कर्म ।
वह फिर आएगा
तुम्हारी अठखेलियों पर खिलखिलाने
तुम्हारे साथ जीवन का उत्सव मनाने ।
 
विनय शंकर तिवारी
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 दिनाँक 19 जुलाई 2025,शनिवार 

समयभाव के कारण बहुत दिनों से लिख नहीं पाया । अंशु अब दीवाल पकड़ कर या तीन पहिए वाली गाड़ी (जो इनके नाना ने भेजवाया है ) को पकड़ कर चलने लगे हैं । क्रोलिंग तो रफ़्तार से करते हैं ।
अब अंशू के प्राइवेट लैंग्वेज की शुरुआत भी हो चुकी है ।
अब आपके मन में प्रश्न उठेगा कि प्राइवेट लैंग्वेज क्या है ? तो बच्चों की प्राइवेट लैंग्वेज (Private Language) का अर्थ होता है वह भाषा या संकेत प्रणाली जो बच्चे खुद अपने लिए विकसित करते हैं, और जिसे केवल वही समझते हैं — अन्य लोग नहीं।
विकासात्मक मनोविज्ञान (Developmental Psychology) मानता है कि बच्चे जब बहुत छोटे होते हैं, तो वे बोलने से पहले या बोलना सीखते समय कुछ विशेष ध्वनियाँ, इशारे या शब्दों का प्रयोग करते हैं जो दूसरों को समझ में नहीं आता। यह उनकी प्रारंभिक संप्रेषण प्रणाली होती है।
फिर धीरे-धीरे अपने परिवेश की भाषा सीखने लगते हैं और फिर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी प्राइवेट लैंग्वेज की अलविदा कर देते हैं  ।
अंशू के लिए एक बिजी क्यूब और ज्योमेट्रिकल शेप मैचिंग ऑर्डर किया हूँ ताकि इनकी मोटर स्किल एवं Eye & Hand कॉन्टैक्ट अच्छा हो सके ।

               

दो तीन दिन पहले पापा मम्मी आए थे तो अंशु धीरे - धीरे पहचानने लगे थे दो तीन दिन ही रुके वो लोग । आखिरी दिन अंशू पापा की यानि अपने बब्बा की गोद में गए ।

ऐसे ही जब मम्मी ( अंशू की नानी) आई थीं एक डेढ़ महीना पहले तो अंशू बहुत रम गए थे नानी से । नानी अंशू को घुमा- घुमा के खिलाती थीं, साथ में घूमती थीं । फिर चली गईं । उन्हें अंशुल एक दो दिन मिस किए फिर पुनश्च पहले जैसे हो गए।
उनके आने के बाद अंशू थोड़ा मोटे हो गए थे पर अभी जुकाम सर्दी में दो तीन दिन एक एक चम्मच खाए तो स्वास्थ्य थोड़ा डाउन हो गया है । फिलहाल अब स्वस्थ हैं अंशु ।

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02 मई 2026


रात्रि की यह यात्रा आज साधारण यात्रा न रहकर मानो एक जीवंत साहित्यिक अनुभूति में परिणत हो गया है। बस की पारदर्शी खिड़की से बाहर दृष्टि जाती है तो आकाश अपने विराट, धवल, जलमय स्वरूप में किसी दिव्य गंगा-प्रवाह सा प्रतीत होता है—और उस अनंत आकाश-गंगा में चंद्रमा एक उज्ज्वल, सौम्य तीर्थयात्री की भाँति स्नानरत दिखाई देता है। पर यह स्नान स्थिर नहीं; उसमें बालसुलभ चंचलता है, सलोनी अठखेलियाँ हैं, एक स्वच्छंद क्रीड़ा है। कभी वह बादलों की धुंधली ओट में स्वयं को छिपा लेता है, मानो लज्जा से घिर गया हो; फिर अगले ही क्षण उन्हीं मेघखंडों को अपने कंठ का हार बनाकर पुनः प्रकट होता है। कभी दो समानांतर बादलों की पट्टियों के मध्य से ऐसे निकलता है, जैसे किसी दिव्य घाट की संगमरमरी सीढ़ियों के बीच उतरता-चढ़ता कोई देवबालक हो।


              मेरी उस स्थिति की प्रतीकात्मक तस्वीर 

आकाश के इस विराट घाट पर आज अन्य कोई उपस्थिति नहीं—न कोई तारा, न कोई विघ्न, न कोई और आलोक। समूचा पूर्व दिशा का विस्तार केवल चंद्र के लिए आरक्षित जान पड़ता है। यह सचमुच एक ‘चन्द्रघाट’ है—जहाँ केवल वही है, और हैं उसकी स्निग्ध, कोमल, शीतल किरणें, जो पृथ्वी पर दया, माधुर्य और शांति का नीरव अभिषेक कर रही हैं।

ऐसे क्षण में वेगड़ जी की वह अद्भुत कल्पना स्मृति में कौंधती है कि चंद्रमा के पास कोई ऐसा जामन है, जिसमें सूर्य की तीक्ष्ण, प्रखर, उष्ण किरणें डुबकी लगाकर अपनी दाहकता विसर्जित कर देती हैं। वे वहीं अपनी कठोरता त्यागती हैं, और फिर चंद्र-किरण बनकर शीतल, सौम्य और करुणामयी होकर पृथ्वी पर उतरती हैं। सचमुच, आज इस दृश्य को देखकर लगता है कि प्रकाश का भी संस्कार होता है—सूर्य का तेज जब चंद्र के संस्पर्श से गुजरता है, तो वह तपन से माधुर्य में रूपांतरित हो जाता है।

बस अपनी गति से मार्ग को चीरती चली जा रही है, किन्तु भीतर समय जैसे ठहर गया है। बाहर का दृश्य मन में ऐसी तरलता भर रहा है कि यह यात्रा केवल स्थानांतरण नहीं रह जाती—यह भावों की यात्रा बन जाती है। मैं जा रहा हूँ अपने बेटे को लेने—अपने जीवन के उस छोटे, सलोने चंद्र को घर वापस लाने। बाह्य आकाश में विहार करता यह पूर्ण, धवल चंद्र और मेरे अंतर्मन में बसा मेरा पुत्र—दोनों आज एक-दूसरे के प्रतीक से प्रतीत होते हैं। जैसे प्रकृति ने स्वयं इस रात्रि को इस मिलन के लिए सजाया हो।

बस की खिड़की अब केवल काँच की पारदर्शिता नहीं रही; वह मानो संवेदनाओं की एक खुली चौखट बन गई है, जिसके पार ब्रह्मांड अपनी काव्यात्मकता में मुखर है। इस क्षण में पितृत्व, प्रकृति और काव्य—तीनों एकाकार हो उठे हैं। चंद्र की शीतलता बाहर फैल रही है, और पुत्र-स्मृति की ऊष्मा भीतर। इसी अद्भुत संतुलन में यात्रा का प्रत्येक क्षण एक साहित्यिक डायरी के पृष्ठ पर स्वयं को लिखता चला जा रहा है।

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24 जून 2026

आज का दिन अंशू के जीवन के प्रथम संस्कारों में से एक—उसके मुंडन संस्कार—का पावन अवसर था। घर में कई दिनों से इसकी तैयारी थी और आज वह शुभ घड़ी भी आ गई। हम सब प्रातः ही देवी माँ के दर्शन और अंशू के संस्कार के लिए निकल पड़े। आशा दी, गुड़िया दीदी, भाभी, रिंकू और आयुष, पवन जीजा, प्रमोद, उनकी मम्मी (भाभी) तथा जर्मई वाली भाभी—सभी साथ थे। इतने अपने एक साथ हों तो यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहती, वह अपनेपन का चलता-फिरता उत्सव बन जाती है।

किन्तु इस उल्लास के बीच कुछ रिक्त स्थान भी थे, जो बार-बार मन को छू जाते थे। पापा और मम्मी इस यात्रा में साथ नहीं आ सके। पापा की ओपन हार्ट सर्जरी के बाद अब भी लंबी यात्राएँ उनके लिए कष्टदायक हो जाती हैं, और मम्मी को यात्रा में उल्टियों की इतनी समस्या होती है कि पहुँचते-पहुँचते ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। मन बार-बार चाहता था कि वे भी अंशू के इस प्रथम संस्कार के साक्षी बनते, पर जीवन में हर इच्छा तत्काल पूर्ण हो जाए, ऐसा कहाँ होता है?

गुड्डू भइया का न आ पाना भी भीतर कहीं खलता रहा। मन में आशा थी कि यदि संजय भइया की जमानत हो जाती तो वे भी आ जाते, किंतु न्यायालय में सुनवाई ही टल गई। कुछ प्रतीक्षाएँ मनुष्य करता है, कुछ प्रतीक्षाएँ समय स्वयं कराता है। शायद ईश्वर ने अभी उस मिलन का समय सुरक्षित रखा है।

देवी का मंदिर पर्वत-शिखर पर स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग एक सहस्त्र सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। हमारे साथ कुछ ऐसे लोग थे जिनके लिए इतनी लंबी चढ़ाई कठिन होती, इसलिए निश्चय हुआ कि सभी लोग रोप-वे से ही ऊपर जाएँगे।

।              मंदिर जाते हुए सुनीता, मैं और अंशु 
   
रोप-वे की लंबी कतार को देखकर लगा कि आज का मनुष्य सुविधा के अधिक निकट और श्रम के कुछ दूर खड़ा हो गया है। शायद यह समय की माँग भी है; जीवन की दौड़ ने उसे विश्राम का अभिलाषी बना दिया है। मैं किसी के चुनाव का निर्णय नहीं करता, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं। किंतु अपने मन की बात कहूँ तो जब तक शरीर स्वस्थ और समर्थ है, पर्वत की सीढ़ियाँ मुझे प्रार्थना का ही विस्तार लगती हैं। प्रत्येक पग मानो अहंकार को थोड़ा-थोड़ा पीछे छोड़ता हुआ श्रद्धा के और निकट ले जाता है। जिस चित्-शक्ति के मूर्त स्वरूप के दर्शन के लिए हम जा रहे हों, वहाँ तक पहुँचने में यदि तन का थोड़ा श्रम भी लग जाए, तो वह श्रम नहीं, भक्ति का मौन अर्घ्य बन जाता है। वृद्धावस्था आएगी तो उसका भी सम्मान करूँगा, क्योंकि वह काल का विधान है; पर आज जब पैरों में सामर्थ्य है, तब सीढ़ियाँ मुझे रोप-वे से कहीं अधिक आत्मीय प्रतीत होती हैं।

आज मुंडन का बड़ा मुहूर्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आने वाला प्रत्येक तीसरा व्यक्ति अपने बच्चे का मुंडन कराने ही आया हो। हम प्रातः नौ बजे ही मंदिर की पार्किंग में पहुँच गए थे, किंतु रोप-वे का समय एक से दो बजे का मिला। फिर बीच में दर्शन कुछ समय के लिए बंद हो गए, जिससे और विलंब हुआ। अंततः लगभग चार बजे हमें रोप-वे में बैठने का अवसर मिला और साढ़े चार बजे तक माता के दर्शन सम्पन्न हुए।

                                                                                                                  मुंडन के कुछ दिन उपरांत गोपाल बाग, गोविंदगढ़ में अंशु 


इतनी प्रतीक्षा के कारण अनेक परिवारों ने रोप-वे में जाने से पहले ही अपने बच्चों का मुंडन करवा लिया था। एक क्षण को हमने भी ऐसा करने का विचार किया, किंतु सुनीता ने बड़े सहज भाव से कहा—"हम मुंडन संस्कार के लिए ही आए हैं, इसलिए अंशू पहले अपनी झालर सहित माता के दर्शन करेगा, उसके बाद ही उसके केश उतारे जाएँगे।" उसके इस आग्रह में श्रद्धा की ऐसी सरलता थी कि फिर कोई दूसरा विचार मन में आया ही नहीं। सच ही है, संस्कार केवल कर्मकाण्ड से नहीं, भावना से पूर्ण होते हैं।

दर्शन के पश्चात् अंशू का मुंडन सम्पन्न हुआ। आश्चर्य यह कि उसने तनिक भी रोना नहीं। वह पूरे समय कौतूहल से इधर-उधर देखता रहा। रिंकू ने उसके हाथ में मोबाइल दे दिया और देखते-देखते पूरा संस्कार बड़ी सहजता से संपन्न हो गया।

मुंडन के बाद जब मैंने उसे देखा तो लगा जैसे उसका सौंदर्य और अधिक उज्ज्वल हो उठा हो। उसका निर्मल मस्तक किसी नवोदित चन्द्रमा की शीतल आभा बिखेर रहा था। तभी मन में एक सुंदर कल्पना उभरी—शायद अंशू का जन्म महाशिवरात्रि से एक दिन पूर्व इसलिए हुआ कि वह भगवान शिव के जटाजूट में सुशोभित शशांक की भाँति इस संसार में अपनी निष्कलुष मुस्कान से प्रकाश फैलाए। उस क्षण उसका मुख सचमुच चन्द्र-कला-सा शांत और मोहक लग रहा था।

संस्कार के उपरांत हम सबने साथ बैठकर भोजन किया। पूड़ियाँ गाँव में बनी थीं और सब्ज़ी रीवा में। घर से आया हुआ भोजन केवल स्वाद नहीं देता, वह अपने लोगों का स्नेह भी साथ लेकर आता है। खुले आकाश के नीचे, परिवार के बीच बैठकर किया गया वह साधारण भोजन भी किसी राजभोज से कम नहीं लगा।

संध्या ढलते-ढलते विदा का समय आ गया। लगभग नौ बजे हम रीवा लौट आए। मन की इच्छा थी कि मैं, सुनीता और अंशू गाँव भी चले जाएँ, ताकि पापा-मम्मी का आशीर्वाद अंशू को मिल सके। किंतु छह तारीख को मेरी परीक्षा है। सुनीता ने व्यावहारिक पक्ष सामने रखा—अभी जाने पर दो छुट्टियाँ लेनी पड़ेंगी, और यदि भइया की जमानत हो गई तो गाँव जाना ही होगा।

इसलिए आज की रात एक छोटी-सी प्रार्थना के साथ समाप्त हो रही है। ईश्वर से यही निवेदन है कि पापा शीघ्र पूर्ण स्वस्थ हों, मम्मी प्रसन्न रहें, भइया के जीवन में भी शुभ समाचार आए और परिवार के सभी बिखरे हुए क्षण पुनः एक साथ बैठ सकें। यदि परमात्मा की कृपा से ऐसा हो गया, तो आज का यह संस्कार केवल अंशू के जीवन का ही नहीं, पूरे परिवार के जीवन का भी एक पूर्ण मंगल अध्याय बन जाएगा।

आज का दिन स्मृतियों में चिरस्थायी हो गया। समय के साथ अंशू के सिर पर फिर केश आ जाएँगे, पर आज उसकी निष्कलुष मुस्कान, माता के चरणों में उसका प्रथम संस्कार और परिवार के प्रेम से भरा यह दिन मेरे हृदय की डायरी में सदैव उज्ज्वल बना रहेगा।

- विनय शंकर तिवारी


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03 अगस्त  2026

अंशू और उनका “हॉफ पांडा” 😂

आज अंशू काजल की डिब्बी खोलकर अपनी दायीं आँख से लेकर कान तक पूरा स्याह रंग में रंग चुके थे। 😂
यह करीब 12 बजे दोपहर की बात है।

मैं दाल फ्राई करके चावल चढ़ा रहा था और अंशू बेडरूम में खेल रहे थे। एक बार जाकर देखा तो बड़े आराम से ब्लॉक्स खेल रहे थे। मैं निश्चिंत होकर चावल चढ़ाने चला गया।
लेकिन वापस आया तो माजरा ही बदल चुका था! 😂

अंशू ने पता नहीं कब काजल की डिब्बी ढूँढ़ निकाली और अपनी एक तरफ की शक्ल ऐसी बना ली कि उन्हें देखते ही मेरे मन में पहला ख्याल आया—

“ये हॉफ पांडा कहाँ से आ गया?” 😂🐼


पहले तो उनकी हालत देखकर हँसी आई, फिर सोचा कि इस ऐतिहासिक रूप को कैमरे में कैद कर लेना चाहिए। 😄

फिर कुछ तस्वीरें ली गईं और उसके बाद शुरू हुआ—

अंशू का फेसवॉश कार्यक्रम। 😂

काजल तो साफ हो गया, लेकिन अंशू का वह “हॉफ पांडा” वाला रूप शायद आज की सबसे प्यारी याद बन गया। ❤️
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अगस्त 8, 2026

आज भाभी (प्रमोद की मम्मी) हमारे कमरे में घूमने आई थीं। अंशू उन्हें बहुत अच्छी तरह पहचानते हैं। उन्हें देखते ही अंशू बहुत खुश हो गए और अपने सारे खिलौने उन्हें दिखाने लगे—ABC वाला सेट, अपने बाकी खिलौने और न जाने क्या-क्या।

आज अंशू के चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी। उन्होंने बड़ी मम्मी के पैर छुए और उन्हें “बड़ी मम्मी” कहकर बुलाते रहे। जब मैं कमरे में आया तो बड़ी उत्सुकता से मुझे भी बताया—“बड़ी मम्मी आई हैं।”
उन्हें अपने लोगों को पहचानते, उनसे जुड़ते और अपनी छोटी-सी दुनिया उन्हें दिखाते देखकर मन बहुत खुश हुआ। ❤️

कल से अंशू ने एक और नई चीज़ सीख ली है—प्लाई वाली चारपाई से नीचे रखे गद्दे पर अकेले जंप करना।
जंप तो अंशू पहले भी कर लेते थे, लेकिन तब मेरा हाथ पकड़े रहते थे। मैं चाहता था कि धीरे-धीरे वे अपने आप जंप करना सीखें और उनकी physical activity भी बढ़े।

तो मैंने उनसे कहा—“मैं वीडियो बनाता हूँ, तुम जंप करो!”

अंशू ने पहली बार अकेले जंप किया। फिर तुरंत मेरे पास आए और अपना वीडियो देखा। वीडियो देखकर उन्हें इतना मज़ा आया कि फिर क्या था—

“ले जंप… 1, 2, 3… जंप!” 😄


बस फिर अंशू बार-बार जंप करने लगे। अपने किए हुए काम को वीडियो में देखकर उन्हें जो खुशी मिली, वह देखने लायक थी।

बच्चे भी न जाने कितने सरल तरीकों से अपने भीतर का आत्मविश्वास खोज लेते हैं। ❤️

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तीन चार दिन पहले सुबह-सुबह की बात है। अंशू की नींद खुल चुकी थी और वे अपनी मम्मा के साथ लेटे हुए थे। मैं उन्हें लेने के लिए आया। मुझे देखते ही शायद अंशू ने सोचा कि अब तो उठना पड़ेगा।

तभी तपाक से बोले—

“काऊ दुद्धा पियू!” 😂

मतलब, “गाय का दूध पियूँगा।”

अब दूध बनाने के लिए मुझे जाना पड़ेगा, और तब तक अंशू को मम्मा के पास थोड़ी देर और लेटने का समय मिल जाएगा।

चालाकियाँ सीख रहा है, बच्चा! 😀

कभी-कभी उसकी ऐसी छोटी-छोटी तरकीबें देखकर लगता है कि अंशू धीरे-धीरे बड़ा ही नहीं हो रहा, बल्कि अपनी छोटी-सी बुद्धि से हमें भी खूब समझने लगा है।

बचपन की यही छोटी-छोटी बातें तो बाद में सबसे बड़ी यादें बनती हैं। ❤️

- विनय शंकर तिवारी
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09 अगस्त 2026

अंशू और आटे की बारिश 😂

आज अंशू ने थाली से आटा उठाकर फेंकना शुरू कर दिया है। 😂

आटे की बारिश कर रहे हैं अंशू!

पता नहीं आजकल अंशू को क्या-क्या नए प्रयोग सूझ रहे हैं। कभी काजल से हॉफ पांडा बन जाते हैं, तो कभी आटे से पूरा कमरा रंगने की तैयारी! 😂

थाली में रखा आटा अंशू के हाथ लगा और फिर क्या था—उठाया और फेंका… फिर उठाया और फेंका…

बस, अंशू की अपनी ही आटा-वर्षा चल रही थी। 😄

मैं देख रहा था और सोच रहा था कि बच्चे को खेलने के लिए खिलौने चाहिए या घर में रखा सामान ही पर्याप्त है! 😂

अंशू के लिए तो हर चीज़ एक नया खेल है।
और हमारे लिए… हर खेल के बाद एक नया सफाई अभियान! 😂❤️


- विनय शंकर तिवारी 


13 अगस्त 2026 | 09:15 PM

आज जब सुनीता रसोई में रोटी बना रही थी। मैं और अंशु पानी पीने के लिए रसोई में गए।

अंशु ने RO का नल चलाया और गिलास में पानी भरकर एक घूँट पिया। तभी उसकी नजर पास रखे मटके पर पड़ी। मटके को देखकर बड़े सहज भाव से बोला—

“मटक है!!” 😂

हम दोनों हँस पड़े। हमें हँसता देखकर अंशु भी हँसने लगा। उसकी वह मासूम-सी हँसी देखकर हमारी हँसी और बढ़ गई।

फिर मैंने उसे बताया—

“मटक नहीं, मटका।”

मैंने पूछा—
“आ... आ से?”

अंशु ने तुरंत कहा—

“आम!” 😂

बस, इतनी-सी बात थी।

लेकिन बचपन शायद ऐसी ही छोटी-छोटी बातों से बनता है—अधूरे शब्द, अपनी बनाई हुई भाषा, और उन शब्दों पर पूरे घर की हँसी।

आज अंशु ने “मटका” को “मटक” कहा और “आ” से “आम” बताया।
शायद कुछ वर्षों बाद उसे यह बात याद भी न रहे।
इसलिए लिख रहा हूँ—ताकि जब वह बड़ा होकर ‘मेरे आत्मज’ पढ़े, तो अपने उस छोटे-से रूप को इन पन्नों में फिर से पा सके।

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15 अगस्त 2026, शनिवार | 06:00 AM | श्री श्याम छाया भवन, रीवा


कल से अंशु को जुकाम हो गया है।

शायद मौसम के बदलने के कारण हुआ हो, या फिर शाम को फ्रिज से निकला नींबू चाटने के कारण। कल शाम से ही लग रहा था कि अंशु को जुकाम होने वाला है। इसलिए रात में उसे हल्दी वाला दूध भी पिलाया था, लेकिन जुकाम ने आखिर अपना असर दिखा ही दिया।

रात करीब 4 बजे अंशु अचानक उठकर रोने लगे। देखा तो हल्का बुखार भी था। उसे बुखार की दवा दी। नाक भी बंद थी, इसलिए नाक में ड्रॉप डाली। वह ड्रॉप नाक तो खोल देती है, लेकिन डालने के बाद काफी देर तक अंदर जलन भी करती है।

फिर उसके माथे पर, नाक के पास, गले पर, छाती पर और हाथ-पैर के तलवों पर विक्स लगाया। उसके बाद अंशु को गोद में लेकर काफी देर तक थपकाते हुए टहलता रहा। काफी देर बाद जाकर अंशु फिर सो पाया और फिर सुबह 9 बजे तक सोता रहा।

सुबह करीब साढ़े चार बजे से बारिश भी शुरू हो गई थी। अंशु तो मेरे पास सो गया, लेकिन मेरी नींद फिर नहीं आई। सुनीता ने अंशु को सुलाने के साथ थोड़ी-बहुत झपकी ले ली थी, क्योंकि सुबह उसे स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में हॉस्पिटल भी जाना है । लेकिन मेरी आँखों से नींद जैसे दूर ही हो गई थी। देखते-देखते सुबह हो गई।

अंशु को जुकाम-बुखार तो है, लेकिन उसे गोद में लेकर सुला देने के बाद जब वह चैन से सोता है, तो लगता है जैसे रात की सारी थकान उसी क्षण थोड़ी कम हो गई ।

विनय शंकर तिवारी



नागपंचमी | 17 अगस्त 2026 | 10:27 PM 


आज नागपंचमी है। 

लोग इस दिन नाग देवता के दर्शन को शुभ मानते हैं। नागपंचमी पर सपेरे भी सर्पों को लेकर गली-गली, मोहल्लों-मोहल्लों में घूमते हैं।

आज एक सपेरा हमारी कॉलोनी में भी आया। उसने बीन बजाकर लोगों को इकट्ठा किया। मैं और अंशु भी सर्प को देखने चले गए।

अंशु ने सर्प को देखते ही उसे पहचान लिया और तुरंत बोला—

“स्नेक!”

मैं मुस्कुरा दिया। 😊


हम दोनों काफी देर तक वहाँ खड़े रहे। सपेरे की बीन की आवाज और बीच-बीच में सर्प की फुफकार सुनते रहे। अंशु बड़े ध्यान से उसे देखता रहा।

कुछ देर बाद हम वापस आ गए।

लेकिन लौटते समय मन में एक बात रह गई। सपेरे ने बताया कि उन्होंने सर्प के विषदंत तोड़ दिए हैं। यह सुनकर मुझे उस सर्प के लिए दुख हुआ।

सोचा—उस पर क्या गुजरी होगी?

सपेरे अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा करते होंगे, यह बात समझ में आती है। लेकिन उस सर्प की सुरक्षा का क्या?

सपेरे ने बताया कि कल वे इसे जंगल में छोड़ देंगे।

अच्छी बात है कि कम-से-कम उसे जंगल में छोड़ने की बात तो कही।

लेकिन मन में एक प्रश्न फिर भी रह गया—

विषदंतों के बिना उस कोबरा का जीवन कैसा होगा?

आज अंशु ने बस एक साँप देखा और कहा—“स्नेक।”

लेकिन मेरे लिए आज का वह साँप एक और प्रश्न छोड़ गया—

क्या मनुष्य की सुरक्षा के लिए किसी दूसरे जीव की स्वाभाविक शक्ति छीन लेना उचित है?


नागपंचमी के दिन सपेरा और सर्प को देखते अंशु का वीडियो



                फ़न फैलाए सर्प और बैठा सपेरा ।




18 अगस्त 2022 | रीवा | 08:54 PM 

आज संजय भइया को बेल मिल गई!

उस परम प्रभु, सच्चिदानंद स्वरूप के आशीर्वाद का ही फल है। मन अत्यंत प्रसन्न है, आह्लादित हूँ।
चार वर्षों बाद भइया हमारे साथ होंगे, हमारे बीच होंगे।

अंशू पहली बार अपने बड़े पापा से मिलेगा।
और उससे भी अधिक—भइया पहली बार अंशू को देखेंगे, उसके तीसरे वर्ष में।

पापा भी बहुत प्रसन्न हुए। उनका मन भी आज आनंदित होगा।

मम्मा की तो जैसे आँखें ही तरस रही थीं कि कब आएँ—संजय!

बड़े भइया तो प्रसन्न हैं ही।
उन्होंने ही कोर्ट का पूरा काम संभाला है—वकील से मिलना-जुलना और बाकी आवश्यक कार्य भी।

हम तीनों भी बहुत प्रसन्न हैं।
हालाँकि अंशू को इस बात की पूरी समझ नहीं है।

मैंने उसे बताया कि “बड़े पापा कल आएँगे”, तो वह इस बात से ही प्रसन्न है कि बड़े पापा आ रहे हैं।

अब वह बड़े पापा के रूप में बड़े भइया को सोच रहा है,
या उसे वीडियो कॉल वाले बड़े पापा याद आ गए हैं—

ये तो वही जाने! 😊

लेकिन कल जब सचमुच बड़े पापा उसके सामने होंगे, तब शायद अंशू की आँखों में भी उस रिश्ते की पहचान धीरे-धीरे उतरने लगेगी।

चार वर्षों की दूरी के बाद घर में एक अपना फिर लौट रहा है।

आज मन सचमुच बहुत प्रसन्न है। ❤️


24 अगस्त 2026 | रीवा | 1:05 रात्रि (25 अगस्त)

संजय भइया को देखने हम उनके आने के दूसरे दिन ही गए।

उनके आने के दिन, यानी 19 अगस्त की शाम से ही पूरी रात और अगले दिन दोपहर तक पुरजोर बारिश होती रही। पूरा रीवा शहर तो जलमग्न था ही—हाँ, कहीं कम, कहीं ज्यादा। आसपास के जिले भी इस बारिश में डूब चुके थे। नदियाँ उफान पर थीं, सड़कें डूबी हुई थीं और खेतों में उगी धान तथा अन्य फसलें भी पानी में डूब चुकी थीं।

बारिश लगभग 1 बजे दोपहर में जाकर रुकी।

हम 3 बजे की बस से निकले और लगभग 6:30 बजे शाम तक घर पहुँच गए। बड़े भइया हमें लेने सड़क तक आए थे। हम बस से अतरैला तक ही आए, वहाँ से ऑटो लिया और घर पहुँचे।

अंशु के पहुँचते ही घर जैसे गुलज़ार हो उठा।

इनकी चहल-कदमियों से घर जैसे फिर भर गया।

संजय भइया से भी अंशु ने तुरंत ही पहचान बना ली। बड़े भइया को तो अंशु अपना मानते ही हैं।

एक दिन अंशु सीढ़ी से गिर गए। बहुत साफ बच गए, ज्यादा चोट नहीं लगी।

जैसे ही गिरकर उठे, अपने आप ही बोल पड़े—

“बच गया...”

सब हँसने लगे।

सबको हँसता देखकर अंशु भी हँसने लगे। 😂

बच्चे शायद ऐसे ही होते हैं—अपनी छोटी-सी घटना में भी पूरे घर के लिए हँसी छोड़ जाते हैं।

रविवार की शाम जब वापस आने लगे तो सबका मन भारी था। अंशु की उपस्थिति ने इन कुछ दिनों में सबको जैसे मोह लिया था। जाते-जाते सबके पैर छुए और सबसे विदाई ली। दादी ने 500 रुपये दिए, बड़ी मम्मी ने 100 और बड़े भइया ने 500 रुपये।

जब गाड़ी में बैठने लगे तो घर के लगभग सभी लोग बाहर खड़े थे—विदा करने के लिए।

मन सबका ही भरा हुआ था।

तभी अंशु ने हाथ हिलाते हुए कहा—

“ सबको बाय !” 😂

और सब हँस दिए।

शायद उसे क्या पता था कि जिस क्षण सबकी आँखों में विदाई का भाव था, उसके एक छोटे-से “बाय सबको” ने उस भारी मन में फिर से मुस्कान भर दी।

हम लोग चल दिए—पुनः अपनी कर्मस्थली की ओर।

पीछे रह गया एक भरा-पूरा घर, कुछ दिनों की हँसी, और अंशु की चहल-कदमियों से जीवंत हुई ढेर सारी स्मृतियाँ।


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15 सितंबर 2026                  10 :15 AM 

कैमा रेलवे स्टेशन 

आज अंशु के लिए ट्रेन में एक प्रोजेक्टर कैमरा खरीदा।

दरअसल मैं दिल्ली से वापस आ रहा था। मानिकपुर में ट्रेन में एक खिलौने बेचने वाला आया। उसके पास यह कैमरा देखा तो मुझे अंशु के लिए पसंद आ गया।

बंद लाइट में इस कैमरे से दीवार या फर्श पर जानवरों के चित्र दिखाई देते हैं। इसमें कई तरह की तस्वीरें हैं और बटन दबाने पर एक-एक करके तस्वीरें बदलती रहती हैं।

सोचा, अंशु को अच्छा लगेगा।

अब देखते हैं, जब उसे दूँगा तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी रहती है।

कल अंशु प्रमोद के यहाँ गए थे। वहाँ बड़े भइया से भी मुलाकात हुई। फिर अंशु बाइक पर घूमे होंगे, चॉकलेट वगैरह भी खाई ही होगी। बब्बू भइया की लाइसेंस वाली बंदूक लेकर तरह-तरह के पोज में फोटो भी खिंचवाई ।

रात करीब 9 बजे घर वापस आए।

और घर आने की वजह?

पॉटी! 😂

सुनीता बता रही थी कि प्रमोद के यहाँ अंशु ने पॉटी की ही नहीं। जब पॉटी आई तो बोला—

“अपने घर चलो!” 😂

अंशु को शायद अपना घर ही सबसे सुरक्षित और सुविधाजनक जगह लगता है—यहाँ तक कि पॉटी के लिए भी!


                   अंशू की बंदूक के साथ की तस्वीरें 

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28 सितंबर 2026, 11: 55 PM, रीवा

अंशु में अब छोटी-छोटी अलग-अलग चीजों को जोड़कर उनसे कोई नई चीज बना लेने की उनकी समझ धीरे-धीरे विकसित हो रही है।

अब अंशु अपने खिलौने इधर-उधर से उठाते हैं—कभी कोई छोटा खिलौना, कभी एबीसीडी का अक्षर, कभी 1, 2, 3, 5 का अंक—और सबको एक-दूसरे के पीछे लगाते चले जाते हैं।

थोड़ी देर बाद जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो उनकी बनाई हुई चीज ट्रेन होती है।

उनके लिए एबीसीडी का कोई अक्षर, कोई नंबर या कोई खिलौना अब सिर्फ अपने-अपने रूप में नहीं रह गया है। वे उन्हें जोड़कर अपने मन में एक नया रूप बना लेते हैं।

कभी ट्रेन लंबी होती जाती है, कभी उसमें कोई डिब्बा आगे-पीछे हो जाता है, फिर अंशु उसे ठीक करते हैं और अपनी बनाई हुई ट्रेन को बड़े ध्यान से देखते हैं।

मुझे यह सब देखकर लगता है कि उनके खेल में अब केवल खिलौनों से खेलना नहीं है, बल्कि चीजों को जोड़कर कुछ नया बनाने की कल्पना भी आकार लेने लगी है।

और सबसे मजेदार यह कि उनकी इस ट्रेन में यह जरूरी नहीं कि डिब्बे एक जैसे हों—एक डिब्बा खिलौना हो सकता है, दूसरा कोई अक्षर, तीसरा कोई नंबर और चौथा कुछ और। 😊
अंशु की अपनी ट्रेन है, उनके अपने डिब्बे हैं और शायद उनकी अपनी ही दुनिया भी।

अंशु के खेल में इन दिनों एक और सुंदर परिवर्तन दिखाई दे रहा है। अब वे अपने टेडी बियर को केवल खिलौना नहीं मानते, बल्कि उसके साथ ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे वह सचमुच कोई जीवित बच्चा हो। उसे खाना खिलाते हैं, दवाई पिलाते हैं, सुसु करवाते हैं और उसकी देखभाल करते हैं।

बाल-मनोविज्ञान की भाषा में इसे मुख्यतः Symbolic Play या Pretend Play (प्रतीकात्मक/काल्पनिक खेल) कहा जाता है। अंशु अपने मन में टेडी को एक जीवित पात्र का रूप दे देते हैं और फिर उसके साथ उसी भूमिका के अनुसार व्यवहार करते हैं।

इसमें Role Play भी दिखाई देता है—टेडी बच्चा है और अंशु उसकी देखभाल करने वाले बन जाते हैं।

इसके साथ इसमें Animistic Thinking (जीवात्मवादी चिंतन) का भी सुंदर उदाहरण दिखाई देता है। Piaget के अनुसार प्रारंभिक बाल्यावस्था में बच्चे निर्जीव वस्तुओं को जीवित प्राणी जैसी विशेषताएँ दे देते हैं। अंशु का टेडी को भूख लगना, दवाई की जरूरत होना या सुसु करना जैसी आवश्यकताओं वाला मानना इसी प्रवृत्ति से जुड़ा हुआ है।

अंशु की उम्र में यह बिल्कुल स्वाभाविक विकास का हिस्सा है। वास्तव में, इस तरह के खेल में उनकी कल्पना, प्रतीकात्मक सोच, सामाजिक भूमिकाओं की समझ और देखभाल की भावना—कई चीजें एक साथ खेल के माध्यम से व्यक्त हो रही हैं।

अंशु की भाषा में भी अब धीरे-धीरे विस्तार आ रहा है। पहले जहाँ छोटे-छोटे शब्दों में अपनी बात कहते थे, अब कुछ बड़े वाक्य भी बोलने लगे हैं । जैसे—

“बड़े पापा, जल्दी आइए...”

उनके सामाजिक संबंधों में भी विस्तार हो रहा है।

इधर अंशु का अपने छोटे-बड़े पापा, यानी संजय भइया, से भी इंटरेक्शन बढ़ता जा रहा है। अब अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियाँ उन्हें भी दिखाना चाहते हैं ।

जब अंशु ब्लॉक्स से कोई बिल्डिंग बनाते हैं और मैं उनसे कहता हूँ—

“यह तो शानदार हाउस बनाया है अंशु ने!”

तो वह उसे केवल मेरे साथ साझा करके संतुष्ट नहीं होते । वह छोटे-बड़े पापा को वीडियो कॉल करवाते हैं और उन्हें भी दिखाते हैं—

“सेट कर दिया!”

शायद अंशु के लिए अपनी बनाई हुई चीज़ को दिखाना भी खुशी का हिस्सा बन गया है।

अब दादी से, बाबा से, उधर नानी और नाना से भी अंशु बातें करने लगे हैं। धीरे-धीरे उनका अपना संसार और बड़ा होता जा रहा है।

लेकिन इन सबके बीच बड़े पापा और देवकेश का स्थान अभी भी अंशु के लिए कुछ अलग और विशिष्ट है। 😊

रिश्ते शायद बच्चों के लिए किसी परिभाषा से नहीं बनते। वे साथ बिताए समय, अपनापन और छोटी-छोटी स्मृतियों से बनते जाते हैं।

अंशु की दुनिया भी अब धीरे-धीरे बड़ी हो रही है—खिलौनों से कल्पना तक, शब्दों से वाक्यों तक और अपने छोटे-से संसार से रिश्तों की एक बड़ी दुनिया तक।

              अंशु के ब्लॉक्स से बनी बिल्डिंग्स और अंशु

                                                                                                                         फोटो -    अंशु की ट्रेन 

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03 अक्टूबर ,2026. 11:08 PM 
रीवा

आज अंशु को रोटी-जैम दे रहा था तो अनायास ही रसखान जी की ये पंक्तियाँ याद आ गईं—

धूरि भरे अति सोभित श्यामजू तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनी बाजति पीरी कछोटी॥

वा छवि को रसखानि बिलोकत वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि-हाथ सों लै गयौ माखन-रोटी॥

कितना मनोहर चित्रण है!

अंशु को रोटी खाते देखते-देखते मन सीधे उस बाल-कृष्ण की छवि तक पहुँच गया—आँगन में खेलते, खाते, पैरों में पैंजनियाँ बजाते हुए नन्हे कृष्ण।

सोचता हूँ, इस दृश्य की कल्पना करने वाले रसखान के मन में वह बाल-कृष्ण कितना सजीव और कितना विह्वल करने वाला रहा होगा! उन्होंने केवल एक बालक को खाते हुए नहीं देखा होगा, बल्कि उस दृश्य को भीतर तक महसूस किया होगा। तभी तो सदियों बाद भी उनकी कल्पना हमारे सामने उसी बाल-कृष्ण को जीवित कर देती है।

आज अंशु को रोटी-जैम खिलाते हुए जाने क्यों लगा कि बच्चों का बचपन शायद समय बदलने पर भी अपनी मूल सुंदरता में बहुत नहीं बदलता। तब कृष्ण के हाथ में माखन-रोटी थी, आज अंशु के हाथ में रोटी-जैम।

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अंशु कल से पेंसिल पकड़कर लिखने में भी रुचि लेने लगे हैं।

पहले पेंसिल पकड़ने का एक छोटा-सा ‘पायलट प्रोग्राम’ किया था। तब उन्हें पेंसिल पकड़ना और उससे कुछ बनाना सिखाया था। शायद उसी का थोड़ा-सा प्रतिफल अब दिखाई दे रहा है—अब स्वयं पेंसिल उठाने और उससे कुछ करने में उनकी रुचि जगने लगी है।

आज उन्होंने Scribbling करते हुए पहले ओवल शेप फिर गोलाकार आकृतियाँ बनाईं और उन्हें बनाकर बहुत प्रसन्न हुए।

फिर मेरे साथ मिलकर स्टार, कार, बस और हेलीकॉप्टर भी बनाए।

उनके लिए अभी ये आकृतियाँ शायद केवल रेखाएँ और आकार हैं, लेकिन मेरे लिए इनमें अंशु की एक नई दुनिया का आरंभ दिखाई दे रहा है।

कल तक जो हाथ केवल खिलौने पकड़ते थे, अब वही हाथ पेंसिल पकड़कर रेखाओं को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की कोशिश कर रहे हैं।

शायद लिखने से पहले बच्चे ऐसे ही रेखाएँ खींचते हैं—और उन रेखाओं में धीरे-धीरे उनकी कल्पना अपना आकार लेने लगती है।

-- विनय शंकर तिवारी 

                                                                                फोटो; स्क्रिबलिंग करते हुए अंशु
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दिनांक: 25 अक्टूबर 2026

आजकल अंशु ऊपर बिट्टू के यहाँ खेलने चले जाते थे। वहाँ उनके पास टेंट हाउस है, जिसमें अंशु को खेलना बहुत अच्छा लगता है। लेकिन मुझे इस बात की चिंता रहती थी कि वे अकेले सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर जाते हैं। अंशु रेलिंग पकड़कर सीढ़ियाँ चढ़ते हैं, फिर भी गिरने का डर बना रहता है। बिट्टू भी अभी बच्ची ही है, इसलिए उसके साथ होने पर भी मैं निश्चिंत नहीं हो पाता था।

तीन-चार दिनों तक मैंने अंशु को समझाया और डाँटा भी कि अकेले ऊपर नहीं जाना है, लेकिन वे मानते नहीं थे। एक दिन जब अंशु ऊपर से लौटकर आए, तब मैंने घर का मुख्य गेट अंदर से बंद कर दिया। अंशु बाहर ही रह गए और मैं अंदर था। वे बाहर से बोलने लगे—“पापा... पापा गेट खोल... गेट खोलिये पापा...”। जब गेट नहीं खुला तो वे रोने लगे।

ज्योति दीदी ने मुझे बताया और अंशु को दूसरे गेट से अंदर ले आईं जिस गेट से अंशु दीदी के कमरे होते हुए बीतती के यहाँ गए हैं । उस समय मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने अंशु को थोड़ा झकझोर दिया और एक थप्पड़ भी मार दिया। फिर उन्हें डाँटते हुए समझाया कि पापा या मम्मी के बिना अकेले सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर नहीं जाना है। उसके बाद मैं उन्हें लेकर इधर-उधर घुमाने लगा, चॉकलेट दी और अपने पास रखा। कुछ देर बाद वे शांत हो गए और फिर से खुश हो गए।

बिट्टू की मम्मी ने बताया कि अंशु उनके यहाँ टेंट हाउस में खेलने के लिए ही जाते हैं। यह सुनकर मैंने अंशु के लिए भी एक टेंट हाउस मँगवा दिया। फ्लिपकार्ट से मँगाया हुआ यह टेंट हाउस 20 अक्टूबर को आ गया था। अब अंशु अपने टेंट हाउस में खेलते हैं और अकेले ऊपर जाने की जिद भी छोड़ दी है।

टेंट हाउस पर सप्ताह के दिनों के नाम भी लिखे हुए हैं। मैंने अंशु को वे नाम पढ़ाना शुरू किया। अभी उन्हें रविवार से बुधवार तक के नाम याद हो गए हैं। आगे के दिन अभी याद नहीं हुए हैं। दो-चार बार और दोहराने पर शायद वे उन्हें भी याद कर लेंगे।

अंशु अब अपनी नीली कार को ड्रिफ्ट करने लगे हैं। कार चलाने और उसे नियंत्रित करने की समझ तो उनमें पहले से ही है, लेकिन अब वे उसे घुमाकर ड्रिफ्ट भी करते हैं।

आज सुनीता ने अपने मायके के गाँव की एक बहुत दुखद घटना सुनाई। वहाँ एक व्यक्ति धान की फसल काट रहा था। उसके पास हाथ से पकड़कर फसल काटने वाली मशीन थी। खेत में कुछ बच्चे भी खेल रहे थे। उस व्यक्ति ने बच्चों को वहाँ से हट जाने के लिए कहा। बाकी बच्चे तो वहाँ से चले गए, लेकिन उसका अपना लगभग तीन-चार वर्ष का बच्चा वहीं रह गया। धान की फसल के बीच छिप जाने के कारण वह व्यक्ति उसे देख नहीं पाया।

बाकी बच्चों ने उसे बताने की कोशिश भी की, लेकिन मशीन की आवाज इतनी तेज थी कि वह उनकी बात सुन नहीं पाया। इसी बीच उसका अपना बच्चा मशीन की चपेट में आ गया और बुरी तरह घायल हो गया। उसे बीएचयू ले जाया गया, लेकिन बहुत अधिक खून बह जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

बताया गया कि उस बच्चे ने अपने पिता से कहा था—“पापा मेरे दोनों पैर काट दिए, अब मैं मर जाऊंगा।”

यह सुनकर मन भीतर तक काँप उठता है। एक छोटा-सा बच्चा, जिसे यह भी ठीक से मालूम नहीं कि उसके साथ क्या हो रहा है, अपने पिता से कह रहा है कि उसके पैर कट गए हैं और वह मर जाएगा। उस समय वह कितना दर्द सह रहा होगा, कितना भयभीत रहा होगा—इसकी कल्पना करके ही मन विचलित हो जाता है।

लेकिन इस घटना का सबसे दुखद पक्ष उस अभागे पिता की स्थिति है। बच्चे की मृत्यु के बाद वह घर नहीं गया। वह खेत में ही बैठा रहा। उसके अपने शब्द थे—

“किस मुँह से जाऊँ घर? अपनी पत्नी, माँ-बाप सबको क्या मुँह दिखाऊँ अपना!”

इन शब्दों में उस पिता का दुःख और पश्चात्ताप कितना गहरा है! जिस बच्चे को उसने जन्म दिया, जिसे पाल-पोसकर बड़ा करना था, उसी बच्चे की मृत्यु उसकी आँखों के सामने हो गई। वह अपने घरवालों का सामना कैसे करता होगा? पत्नी को क्या कहता होगा? अपने माँ-बाप के सामने कैसे जाता होगा? और सबसे बड़ी बात, अपने मन को कैसे समझाता होगा?

मैं उस पिता की मनःस्थिति की कल्पना करता हूँ तो आँखों से आँसू निकल आते हैं। एक क्षण की असावधानी किसी परिवार की पूरी दुनिया उजाड़ सकती है। खेत में काम करते समय बच्चों की सुरक्षा को लेकर कितनी अधिक सावधानी की आवश्यकता होती है, यह घटना इसका बहुत दुखद उदाहरण है। बच्चे खेलते हुए खतरे को नहीं समझ पाते; इसलिए उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी बड़ों पर ही होती है।

उस घटना के बारे में मन में कई तरह के विचार आते हैं, लेकिन वास्तविकता क्या थी, यह मैं निश्चित रूप से नहीं जानता। इतना अवश्य है कि उस पिता ने अपना बच्चा खो दिया और उसके बाद उसके मन पर जो बीती होगी, उसका अनुमान लगाना भी कठिन है।

आज शरद पूर्णिमा भी है। इसी भाव में कुछ पंक्तियाँ लिखीं—

शशि-दीप्ति धरा पर उतर पड़ी, छा गया रजत-वर्णी प्रकाश।
दृष्टि जहाँ-जिस ओर पड़ी, केवल शीतल उज्ज्वल प्रकाश।

मही स्वयं को जितनी शीतल उन रातों में पाती है,
जिन रातों में पूर्ण चंद्र की उज्ज्वलता छा जाती है।

शरद पूर्णिमा उन रातों की मुकुट-मणि है, हे शुभगे!
राज्याभिषेक है आज चन्द्र का—
ज्योतिर्मणि है, हे शुभगे!

रात्रि के लगभग 11:55 बजे हैं। अब सोने जा रहा हूँ। मन में बार-बार एक शांति-पाठ गूँज रहा है—

ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु।
मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

— तैत्तिरीयोपनिषद्, शान्तिपाठ।

आज का दिन मन में कई तरह के भाव छोड़कर जा रहा है। अंशु की छोटी-छोटी गतिविधियों से मिलने वाली खुशी, उनकी सुरक्षा को लेकर मेरी चिंता, एक पिता के अपने बच्चे को खो देने का असहनीय दुःख और शरद पूर्णिमा की उज्ज्वलता—सब कुछ एक साथ मन में उपस्थित है।

इन्हीं विचारों के साथ आज की डायरी यहीं समाप्त करता हूँ।

शुभ रात्रि!

- विनय शंकर तिवारी 
                अंशु का टेंट हाउस 

Sunday, 8 September 2024

विदा छिन्दवाड़ा!

विदा, छिंदवाड़ा!

छिंदवाड़ा मुझे अकस्मात मिला । कोई उम्मीद नहीं थी कि मैं कभी छिंदवाड़ा जाऊॅंगा, पर मिलना था सो मिले । यह जून 2023 था जब मैं यहाँ पहुँचा । पहले पहल उत्सुकता और अनभिज्ञता हर नए शहर में होती है सो हुई, किंतु जब रहने पहुँचा तो शहर ने आकंठ भर लिया ।

छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश का दक्षिणी जिला है जो नागपुर से ठीक उत्तर अवस्थित है । इसका शहरी क्षेत्रफल कम ही है किन्तु है शानदार शहर!
यहाॅं का मौसम, स्वच्छता, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता यहाॅं की सौंदर्यमणियाॅं हैं । इसे प्रकृति ने अपनी छत्र-छाया में रखा है, ठीक जैसे पचमढ़ी को ।
यद्यपि यहाँ कोई नदी का तटीय क्षेत्र नहीं है, फिर भी स्वाभाविक खुलापन है इस शहर में, जिसके कारण मन आनंदित रहता है । वस्तुत यह खुलापन इस शहर में ही व्याप्त है, इसके मोहल्लों में, सड़कों में, सब्जी मंडी में हर जगह ।

इस शहर का मौसम यहाॅं का कीर्तिस्तंभ है, ग्रीष्म में भी तापमान  38 से 40° सेल्सियस पहुॅंचते ही उमड़ पड़ते हैं बादल और फिर लुढ़का देते हैं तापमान को नीचे ।
यहाॅं कॉफ़ी हाउस का डोसे, श्री राधे टावर के पास वीआईपी रोड की तंदूरी चाय, हरे माधव की फुल्की का स्वाद लाजवाब लगा मुझे । लेकिन हरे माधव का चाट मुझे पसन्द नहीं आया ।
 अनार, किसमिस ,काजू भी भला कोई चाट में डालने की चीज है?
वो लोग जिन्हे खट्टा और तीखा चाट (जैसा चाट बहुधा मिलता है) पसंद है उन्हे ये चाट बेसुआदी ही लगेगा । हाँ...वो लोग जो मीठा खाना खूब पसंद करते हैं उन्हें पसंद होना स्वाभाविक है ।

स्वतंत्रता दिवस के दिन पुलिस ग्राउंड में स्कूली बच्चों ने क्या खूब कार्यक्रम प्रस्तुत किया ! कई कार्यक्रमों में तो दर्शक भाव विभोर हो गए थे । अनुभववादी दार्शनिक कहते हैं कि बच्चों का मन एक कोरा कागज़ ( टेबुला रासा) होता है हम उन्हें जो भी दृष्टि देना चाहें दे सकते हैं, बात सही लगती है ।

हम सिमरिया के हनुमान मंदिर भी गए और नए बन रहे शिव लोक भी ।
किंतु, मैं नहीं जा सका जाम सांवली मंदिर, नहीं देख पाया तामिया की सुन्दर पहाड़ियों की छटा, उनका निभृत एकांत ।
नहीं देख पाया पातालकोट की घाटियों में पुरातन संस्कृतियों, सभ्यताओं का जीता जागता उदाहरण ।
शायद इस यात्रा रूपी जीवन में अकस्मात फिर मिलन हो और तब देख सकूं अनदेखे पहलुओं को । यही बात मुझे जीवन के प्रति निष्ठावान और कौतूहल से भरे रखती है ।
विदा छिंदवाड़ा, तुम भी क्या खूब मिले!
मेरे जीवन में अकस्मात आने के लिए शुक्रिया ।

                      सिमरिया हनुमान जी का मंदिर


Friday, 16 August 2024

डायरी 16 अगस्त 2024 - संकल्प स्वातंत्र्य की सीमितता ।

जब भाग्य में नहीं होता तो मिली वस्तु नहीं मिलती ।यह बात चरितार्थ हुई सुनीता के साथ । उसे वैढ़न से रीवा आने के लिए मैने  फ्लाइट बुक किया था । उसके पास पहली बार फ्लाइट चढ़ने का अवसर था लेकिन भाग्य में नहीं लिखा तो क्योंकर आए?
भाग्य में तो कार से ही आना लिखा था वो भी सोई हुई आधी रात में! भाग्य ऐसे ही काम करता है, जब जो नियत है वही होगा । यही बातें नियति को मान कर चलने में विश्वास दृढ़ करती हैं ।
अगर कोई यह कहे की यह भाग्य नहीं उसके चुनने की स्वतंत्रता या संकल्प स्वातंत्र्य था तो आखिर उसने वही क्यों चुना ? यदि इस प्रश्न पर गौर किया जाए तो फिर वही बात आ जाती है और जो प्रकट होता है वह यही कि परिस्थितियाँ ही ऐसी बनी । उसी दिन उसका ‘नेउरी नमय’ का व्रत फंसना, उसकी रक्षाबंधन तक रुकने की इच्छा बलवती होना आदि.. परंतु रक्षाबंधन मायके में मानना कहां लिखा था वो तो लिखा था गाँव में, सो BMO का आदेश आ गया और आना पड़ा । यहीं मानव का संकल्प स्वातंत्र्य की सीमितता का बोध होता है ।

विनय
16 अगस्त 2024

Monday, 11 March 2024

डायरी : 11 मार्च 2024

मैं अभी वरदान हॉस्पिटल रीवा में हूॅं यहाॅं एक परिवार में अभी-अभी बालक का जन्म हुआ है ।
सब खुश हैं, बच्चे का चाचा जो कि अभी लगभग 20 वर्ष का होगा, उसका नाम किसन है । वो अभी अपनी माॅं को फोन में बता रहा था की लल्ला हुआ!
बड़ी उमंग से बता रहा था!
वो बहुत प्रसन्न है ।
मैंने कहा - चाचा बन गए, बधाई हो! कहने लगा, सबको मिठाई खिलाऊॅंगा, आपको तो ढूॅंढ़ कर खिलाऊॅंगा! 
भारतीय जनमानस में यही खास बात है जो हमें अपरिचित होते हुए भी जोड़े रखती है । 


- विनय शंकर तिवारी
  11 मार्च, 2024
  वरदान हॉस्पिटल, रीवा

Friday, 26 January 2024

छिंदवाड़ा डायरी - 25 जनवरी 2024

छिंदवाड़ा डायरी - 25 जनवरी 2024

                        चित्र: प्रतीकात्मक


आज पौष मास के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा की रात्रि चंद्रमा इतना प्रोज्ज्वल था की बिना किसी अन्य प्रकाश के इस धरित्री और नभ के इस शीतयुक्त सौंदर्य को आँखभर निहारा जा सकता था। इस समय मैं दक्षिणी मध्य प्रदेश में हूॅं इसीलिए इस सुख से लाभान्वित हो पा रहा हूं क्योंकि उत्तरी मध्य प्रदेश सहित समूचा उत्तरी भारत इस समय भीषण शीत और कोहरे से ढंका हुआ है । वहाँ तो इस सौंदर्य का स्वादन करना अभी कहाँ संभव है ? वहाँ ऐसा आनंद ग्रीष्म में ही मिलता है जब चांदनी रातें फाल्गुन से ज्येष्ठ तक निरंतर प्रोज्जवल होती चली जाती है । चंद्र का यह नव प्रकाश धरित्री को धवल चंद्र प्रभा से विभोर कर देती है । यह सुख तो आत्मविभोर करने वाला है ही किन्तु शीत में चंद्र प्रभा का सौंदर्य देखना उत्तर भारत में बहुधा कम ही होता है । यह चाॅंदनी चाहे शिशिर ऋतु की हो या ग्रीष्म ऋतु की, होती बड़ी मनमोहक है और साथ रहता है विकीर्ण एकान्त ।

अमृतलाल वेगड़ जी यूँ ही नहीं कहते कि चन्द्रमा के पास ऐसा जामन है जो कि सूर्य के तेज और तापयुक्त प्रकाश को शीतल और कोमल बना देता है किंतु बेचारा सूर्य! उसके पास ऐसा कोई जामन नहीं ।

यहाँ रात्रि के आकाश पर बहुधा कोई धवल या स्याह बादल नहीं दीखते इसीलिए चंद्रमा का रात्रि में प्रोज्जवल दिखना मुझे आसानी से दिख जाता है, रात में चंद्र के चारों ओर से घेरे हुए प्रकाश का आवरण था मानो चंद्र की शोभा बढ़ाती हुई उसकी आभा हो! मेरी आंखें प्रकृति के इस विलक्षण सौंदर्य को देखकर मुग्ध होती रहीं ।

मैं चंद्र में खोया प्रार्थना करता रहा, हे राम! मुझे भी कोई ऐसा जामन दो जिससे मैं भी विपत्तियों, दुखों व जीवन के सुखमय क्षणों में भी बना सकूॅं स्वयं को निर्मल, कोमल, प्रेममय और शान्ताकार ।

विनय शंकर तिवारी 

Sunday, 21 January 2024

लोकमानस के राम

ये लेख सच्चिदानंद मिश्र जी का है जो फिलोसॉफी के प्रोफ़ेसर और विद्वान हैं।
पढ़िए शानदार लेख है.. ।



#लोकमानस_के_राम

कौन से राम को मैं पसन्द करता हूं?
अचानक एक मित्र का प्रश्न मुखपुस्तक (फेसबुक) पर तैरता हुआ दिख गया कि वे कौन से राम हैं जिनको आप पसन्द करते हैं? तुलसी के, कबीर के, गांधी के या एक दल विशेष के? 
सोचता हूं कि क्या राम कई एक हैं? या एक ही राम को अलग अलग लोगों ने अलग अलग रूपों में देखा? वह कौन सा रूप है राम का जिस राम को मैं पसन्द करता हूं ? राम को तुलसी ने भी देखा है तो कबीर ने भी। राम वाल्मीकि के भी हैं तो कालिदास के भी। गांधी के भी हैं और लोहिया के भी। इतना ही नहीं वे राम अल्लामा इकबाल के भी हैं जो उनकी उर्दू कविता में प्रकट होते हैं। राम को कम्बन ने भी देखा है और जैन व बौद्ध कवियों ने भी। एक राम वह भी हैं जो राम की शक्तिपूजा में प्राणवान होते हैं। जो रावण के पराक्रम से पार नहीं पाते तो भयभीत हो जाते हैं और शक्ति प्राप्त करने के लिए शक्ति की आराधना करते हैं। राम के भिन्न भिन्न रूपों को तुलसी ने भी रेखांकित किया यह कहते हुए कि
"नाना भांति राम अवतारा। 
रामायण शत कोटि अपारा।।" 
जब प्रश्न हो कि आप किस राम को पसन्द करते हैं? तो यह प्रश्न सचमुच में यह रूप ले लेता है कि लोकमानस में कौन से राम हैं? वह कौन से राम हैं जिनसे लोकमानस प्रेरणा ग्रहण करता है? वह कौन से राम हैं जिनके चरित्र को जीने के लिए लोकमानस लालायित रहता है? 
वस्तुतः वाल्मीकि रामायण इसी प्रकार के प्रश्न से प्रारम्भ होता है? तपस्या और स्वाध्याय में रत नारद मुनि से वाल्मीकि पूछते हैं? कौन सा मनुष्य इस संसार में अभी ऐसा है जो गुणवान है, वीर्यवान है, धर्म को जाननेवाला है? कृतज्ञ है? सत्य वचन में दृढ़व्रत है? चरित्रवान है? सभी प्राणियों का कौन हित करनेवाला है? आत्मवान है? क्रोध को जिसने जीत लिया है? तेजस्वी है? ईर्ष्या करने वाला नहीं है? किसके क्रोधित हो जाने पर देवता भी भयभीत हो जाते हैं? ऐसे मनुष्य को वाल्मीकि जानना चाहते हैं।
देवर्षि नारद इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए राम के बारे में बताना प्रारम्भ करते हैं। ये वही राम हैं जो वस्तुतः लोकमानस के राम हैं? 
जो राम लोकमानस में हैं वो पूरी तरह से तुलसी के नहीं हैं वे कबीर के भी पूरी तरह नहीं हैं, वे वाल्मीकि के राम भी नहीं हैं। तुलसी के राम ईश्वर हैं तो सीता उस राम की माया है और रामायण की पूरी परिघटना ईश्वर की एक लीला के रूप में अभिव्यक्त होती है। कबीर के लिए राम निर्गुण ब्रह्म हैं। वाल्मीकि के राम एक आदर्श मनुष्य हैं। उनको परम्परा ने मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित किया। वाल्मीकि के राम कई एक मर्यादाएं स्थापित कर रहे होते हैं। समर्थ होते हुए भी सत्यवचनपालन की मर्यादा, माता पिता की प्रतिज्ञा के पालन की मर्यादा, यद्यपि अनेक स्त्रियों से विवाह शास्त्रीय दृष्टि से तथा लौकिक दृष्टि से उस समय अनुमन्य था तथापि एक पत्नीव्रत धर्मपालन की मर्यादा, राजा के लिए प्रजानुरंजन की मर्यादा। पहले आत्मशासन फिर प्रजा का शासन यानी अनुशासन। अनुशासन का अर्थ ही है पहले अपना शासन उसके बाद दूसरे का शासन। ये वही राम हैं जो बड़ी से बड़ी चुनौती स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हैं। आज के नारीवादी चिंतक सीतापरित्याग की बात उठाकर राम की आलोचना करते दिख जाते हैं लेकिन वाल्मीकि रामायण के ये वही राम हैं जो सीता के अतिरिक्त दूसरी किसी स्त्री को अपनी पत्नी का दर्जा नहीं देते, अश्वमेध यज्ञ में सीता ही उनकी पत्नी होती हैं। लोकमानस के राम ईश्वर भी हैं और मनुष्य भी। उस राम में हर पिता को एक आदर्श पुत्र दिखता है तो हर भाई को एक आदर्श भाई। उनमें सुशासन का आदर्श दिखता है तो राम के राजतंत्र में भी सर्वोच्च लोकतान्त्रिक मूल्य दिखते हैं। राम के जीवन त्याग और तपस्या का उच्च मानक दिखता है, तो शबरी के जूठे बेर खाते हुए राम में एक आदर्श समतावादी मनुष्य दिख जाता है। अहल्या का उद्धार करने वाले राम में मानवीय ऐंद्रिक भूलों को क्षमा करने का आदर्श दिखता है, तो राजा राम में ऐसा न्यायप्रिय राजा दिखता है जो केवल मनुष्यों के साथ नहीं बल्कि अन्य प्राणियों के साथ भी न्याय करता है। राम सामने त्रैलोक्यविजयी रावण जैसे अत्याचारी के रहने पर उससे भी जूझने का साहस देते हैं। वैसे भी राम ने सीता को वाल्मीकि के आश्रम में रखा अवश्य था परन्तु वह परित्याग नहीं था। परन्तु लोकमानस के राम तो कभी सीता का परित्याग नहीं करते। राम को ईश्वर मानते हुए भी मनुष्य मान कर चलता है लोकमन। इसीलिए राम के बहुतेरे कार्यों के नैतिक संगत होने पर भी प्रश्न उठाता है और उसका समाधान भी देता है। इसी राम को लोकमानस पसन्द करता है। इसलिए यह प्रश्न बौद्धिक दृष्टिकोण से भले ही अकादमिक महत्त्व का हो परन्तु लोकमानस के लिए निरर्थक, बेमानी और व्यर्थ की जुगाली लगता है।

Friday, 19 January 2024

शिशिर ऋतु की चांदनी रात में आकाश में उड़ता हुआ वायुयान..


शिशिर ऋतु की चांदनी रात के आकाश में उड़ता हुआ वायुयान और विज्ञान के इस चमत्कार में उड़ते हुए लोग । वायुयान विज्ञान का चमत्कार ही तो है! भला इस धरती से मीलों दूर ऊपर उसका उड़ते चले जाना ।
एक रात जब मैं शिशिर ऋतु में छत पर टहल रहा था तभी तो देखा था उस वायुयान को चांदनी रात में उत्तर से दक्षिण की ओर चंद्रमा के ठीक मध्य से जाते हुए ठीक रात्रि के बारह बजे । जब वायुयान चंद्र के ठीक बीच में से जा रहा था तब सहसा मुझे लगा कि जैसे: किसी के अपने कहीं दूर जा रहे होंगे अपने किसी सपने के लिए ।
एक ओर उत्साह नए भविष्य के लिए, वहीं दूसरी ओर विरह, किसी अपने का दूर हो जाना । जब हम किसी के साथ जीवन जीते हैं तो उसे अपनी आदत बना लेते हैं इसीलिए जब वह दूर जाता है तो अपना एक अंश छूटता हुआ महसूस होता है । चाहे माता-पिता का पुत्र के लिए हो या पति का पत्नी के लिए हो या अन्य कोई ।
बहुधा माता का पुत्र के लिए या पत्नी का पति के लिए विरह ‘भावनात्मक’ होता है और यही भावात्मकता ही उसका सौंदर्य है । जैसे विरह था माता कौशल्या का पुत्र श्री राम के लिए या उर्मिला का लक्ष्मण के लिए या फिर यशोधरा का सिद्धार्थ के लिए । 
मैंने जाते हुए वायुयान के यात्रियों को शुभकामनाएँ दिया उनके गंतव्य की सफलता के लिए और अज्ञेय की कुछ पंक्ति* गुनगुनाते हुए कहा -‘विदा’ अपरिचित यात्रियों ! 

* [..मैं ने आँख भर देखा।
दिया मन को दिलासा-पुन: मिलूॅंगा ।
(भले ही बरस-दिन-अनगिन युगों के बाद!)
क्षितिज ने पलक-सी खोली,
तमक कर दामिनी बोली-
'अरे यायावर! रहेगा याद?’ ]

- विनय शंकर तिवारी

Wednesday, 22 November 2023

माँ चामुंडेश्वरी देवी मंदिर, मोहाड़ी, भंडारा, महाराष्ट्र ।

माँ चामुंडेश्वरी देवी मंदिर, मोहाड़ी, भंडारा, महाराष्ट्र ।
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जब कोई मन्दिर किसी नदी के तट पर स्थित होता है तो उसमें एक स्वाभाविक खुलापन होता है जो उसके सौन्दर्य में अनायास ही वृद्धि करता है और दर्शक का मन खुले प्रांगण को देख कर आल्हादित होने लगता है । ऐसे स्थान हमेशा मेरी पसंद रहे हैं जो किसी नदी या समुद्र किनारे होते हैं जिनमें एक खुलापन होता है ।

                          माँ चामुंडेश्वरी देवी मन्दिर 

महाराष्ट्र के भंडारा जिले में मोहड़ी ग्राम पंचायत में अवस्थित यह मंदिर शक्ति पूजन मंदिर है जो कि समर्पित है माँ चामुंडा  को ।  यहाॅं पहुॅंचने के लिए ‘भंडारा रोड’ रेलवे स्टेशन से ऑटो मिल जाते हैं । स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 10 कि. मी. गोंदिया की तरफ होगी ।

यह मंदिर एक स्थानीय नदी के तट पर है । यह नदी गाॅंव से सटी हुई पश्चिम दिशा में दक्षिण वाहिनी हो कर बहती हैं । नदी के पूर्व में ग्रामीणों के घर और पश्चिम में ग्राम वासियों के खेत हैं जहाँ वो अपनी बैल गाड़ी से जाते हैं  यानी नदी के इस पार जन्मभूमि और नदी के उस पार कर्मभूमि । बैलों एवम् अन्य पशुओं के लिए घास आदि के परिवहन का साधन यहाॅं बैलगाड़ी ही है । 

                    गांव की नदी में एकत्रित तरुणियाॅं व नारियाॅं

मैं मानता हूॅं, खेती अगर बहुत ज्यादा मात्रा में नहीं है तो उससे लाभ तभी प्राप्त हो सकता है जब हम पारम्परिक साधनों का ज्यादा प्रयोग कर सकें, जिससे लागत में कमी आएगी और लाभ ज्यादा प्राप्त हो सकेगा, इस गाॅंव के लोग इस सिद्धांत को बखूबी समझते हैं । न केवल इस गाॅंव के बल्कि जहाॅं तक मुझे पता है कम से कम उत्तरी पूर्वी महाराष्ट्र और दक्षिणी मध्यप्रदेश में तो है ही । ये इन पशुओं से प्रेम भी उतना ही करते हैं, जिसकी बानगी हैं इनके त्योहार । इन्होंने बैल पूजन का त्योहार ‘पोला’ भी अभी हाल ही में मनाया है । मुझे रंग- बिरंगे सजे- धजे कई बैलगाडियों में जुते हुए बैल मिले जिनका सौंदर्य मनमोहक था । 

                               ‘गौरी’ पूजन हेतु ।

मैंने यूट्यूब पर कई भारतीयों को अन्य देशों के गाॅंव दिखाते देखा है किंतु हमारे गाॅंव उनसे कमतर कहीं नहीं हैं बल्कि उन गाँवो में व्यक्ति आत्मकेंद्रित ज्यादा दिखते हैं जबकि हमारे यहाॅं समाज केंद्रीतता या कहूँ कि आत्म और बाह्य केंद्रीतता का साम्य बना रहता है । यह जीवन शैली ज्यादा सुन्दर, ज्यादा परिपक्व है । लोग उल्लास से भरे और सहयोगात्मक प्रवृत्ति रखते हैं, यह उसी प्रवृत्ति का बिम्ब है जो हम सब में दिखता है । 

आज हरतालिका तीज के अवसर पर नारियाँ व कन्याएँ गौरी पूजन हेतु नदी तट में एकत्रित थीं जो नदी पूजनोपरांत माँ चामुण्डा से अपने सुहाग और सौभाग्य के मङ्गलकामना की अभिलाषा लेकर पूजन करेंगी और माँ उसी तरह उनकी पूर्ति करेंगी जैसे माता सीता की पूर्ण हुई थी अभिलाषा ।

इत्यलम् ।
सितम्बर 18, 2023

- विनय एस तिवारी

Wednesday, 17 March 2021

पुनर्नवा- एक कहानी


 




हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की रचनाएँ अपने आप में श्रेष्ठ रचनाएँ हैं । बात चाहे शब्दों की समृद्धि की हो! या कहानी के आकर्षण की! या फिर पात्रों के शब्दाभिराम वर्णन की!


यह कहानी शुरू ही होती है कला के चर्मोत्कर्ष से, कला के परम् साध्य से । जिस प्रकार एक नृत्यांगना का साधन तो नृत्य है, किन्तु साध्य हैं सतचिदानंद नजराज!

और नृत्य की विशेषता है कि नृत्य नर्तन/नृत्यांगना के साथ ही समाप्त हो जाता है, जबकि कहानियाँ, गीत रह जाते हैं कहानीकार के बिना भी, लोगों की संवाद पर जनश्रुति बन कर । भला नृत्य कहाँ रहता है नर्तक के बिना?


फिर प्रेम के हर रूप दिखते हैं- जहाँ एक ओर चंद्रमौलि का व्यक्ति-चेतना से समष्टि-चेतना का प्रेम है जिससे बन जाता है वह शिव की तरह ‛अवतांगिदास’ ।

दूसरे देवरात का प्रेम, चंद्रा का प्रेम, मृणालमंजरी का प्रेम ।मृणालमंजरी, जिसका प्रेम सर्वोच्च के निकटतम प्रतिष्ठित है ।जिसमें त्याग का उत्कर्ष है । जिसके प्रेम में वात्सल्य रस का भंडार है ।


यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी सुंदरता है और सबसे बड़ी विशेषता ही यही है, कि इसमें प्रेम के कई आयाम दिखाए गए हैं ।


किन्तु हाय! इस कहानी का उपसंहार उतना रोचक नहीं लगा! वो इसलिए भी क्योंकि बहुधा पात्रों का मिलाप कहानी से मन में उठी रिक्तिता को पूर्ण करता है ।

किन्तु जिस प्रकार कौतूहल अंत तक बना था वह पूर्ण नहीं हो सका! हो सकता है यह मेरा व्यक्तिगत स्वाद भी कहें! तो मुझे वियोग भी पसंद है, परन्तु उसमें मन मान लेता है कि मिलन होगा ही नहीं । 

मुझे नहीं पता! कि इसका कोई दूसरा भाग भी है कि नहीं? पर जब मिलन हो और कुल इकट्ठा न हो तो एक कसक रह जाती है मन में! पूर्ण न होने की कसक ।


यदि इसे हम छोड़ दें तो यह एक ऐसी शानदार पुस्तक है जो आपको रोचकता के साथ, आनंद के साथ, तीव्र आतुरता के साथ, एक जीवन जीने का दृष्टिकोण भी प्रदान करती है ।

वाकई, पाठक को अंत तक यह कहानी बांध के रखती है ।


अंत में पुस्तकान्त की तरह ‛पुनर्नवा की जय’ ।


- विनय एस तिवारी


Monday, 7 December 2020

ब्रह्मचिन्ता

ब्रह्मचिन्ता - योग का एक अलभ्य ग्रन्थ


योग का वह ग्रन्थ, जिसके बारे में केवल पता चलता है पॉल ब्रन्टन की पुस्तक ‛गुप्त भारत के रहस्य' से ।
बनारस में एक बड़े ज्योतिषी हुए थे सुधी बाबू । ऐसे ज्योतिषी जिनके पास एक आध्यात्मिक शक्ति भी थी, समाधि भी ।
सुधी बाबू यानि श्री सुधीर रंजन ।
पॉल ब्रंटन के अनुसार, सुधी बाबू बताते हैं कि ‛ब्रह्मचिन्ता’ का अस्तित्व गुप्त रखा गया तथा इस ग्रन्थ का आविर्भाव तिब्बत में हुआ ।
वहाँ इसे पवित्र समझा गया और इसका अध्ययन उस वक्त केवल गिने चुने लोग ही करते थे ।
ऐसा कहा जाता है कि भृगु महराज ने हजारों वर्ष पूर्व इस महाग्रंथ की रचना की थी । 
भृगु, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे । 
ये एक महान ज्योतिषी थे जिन्होंने ‛भृगुसंहिता’ की रचना की जो आज भी लभ्य है तथा इसकी पांडुलिपि नेपाल में उपलब्ध है । 
..तो इन्हीं भृगु जी के प्रपौत्र भगवान परशुराम थे और इन्हीं भृगु जी ने ‛ब्रह्मचिन्ता’ की भी रचना की ।
सुधी बाबू के अनुसार, उनके समय में भी यह योगमार्ग अत्यंत विलक्षण और अलभ्य होने के कारण नवीन भी माना जाता था।

ब्रह्मचिन्ता का अभिप्राय है ब्रह्म के बारे में चिन्तन करना, मनन करना यानी ब्रह्म जिज्ञासा ।
कहते हैं ‛ब्रह्मचिन्ता’ में बताए मार्ग का अनुसरण करने से गुरु तक की आवश्यकता नहीं रह जाती, स्वयं आत्मा पथ प्रशस्त करती है ।
पॉल ब्रन्टन के अनुसार, सुधी बाबू ने उन्हें इस मार्ग की दीक्षा दी थी।
ब्रन्टन बताते हैं कि इस मार्ग में कई किस्म की योग पद्धतियाँ हैं जिनका उद्देश्य ‛आत्मभाव’ की दशा पैदा करना है। इसमें सबसे मुख्य मार्ग पर आरूढ़ होने पर दस प्रमुख सोपानों (सीढ़ियों) को पार करना होगा, तब जाकर मिलेगा ‛सच्चिदानन्द’ का अमर रस । जिसे ही तो ‘रसो वै सः’ कहा गया है ।
काश! ऐसे अनेक महाग्रंथों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ होता तो हमारे जीवन स्तर बहुत ऊपर उठ गए होते! आज भी हम इनके प्रति कब इच्छुक होंगे, कब प्रयासरत होंगे, कौन जाने?
..

Wednesday, 12 August 2020

अरे यायावर! रहेगा याद!

 

                                                  दिनाँक 07 मार्च 2020




मेरे अतिप्रिय कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‛अज्ञेय’ जी का जन्म आज ही तो हुआ था ।

‛एक बूँद सहसा उछली, अरे यायावर रहेगा याद?, शेखर-एक जीवनी जैसी अनेकेन रचनाओं का उद्भव अज्ञेय रूपी हिमालय से ही तो हुआ है ।

बहुरंगी और अद्भुत व्यक्तित्व-जिसके अंदर एक घुमक्कड़, कवि, दार्शनिक, अपने शब्दों से चित्र बनाने की अद्भुत कला के स्वामी विद्यमान थे, जिनकी रचनाओं में दार्शनिक विचारशीलता, समीक्षा, संस्कृति की छाप को समेटे अभी भी चल रही हैं ।


अज्ञेय जी की रचना- अरे यायावर! रहेगा याद? केवल यात्रा विवरण नहीं है, वरन वह तो भारत के हर भौगोलिक क्षेत्र का सांस्कृतिक, और दार्शनिक विवेचना है, जिसका हर भारतीय को अध्ययन करना चाहिए । इसीलिए अज्ञेय मुझे प्रिय हैं, क्योंकि उनके माध्यम से आप केवल भौगोलिक यात्रा नहीं करते, बल्कि समूची संस्कृतियों की बहुरंगीयता को जीते हुए चलते हैं, फिर चाहे पूर्वोत्तर भारत का वर्णन हो, दक्षिण भारत का या फिर यूरोप का ।

अज्ञेय की रचनाओं और व्यक्तिगत जीवन में काफी तारतम्य था,

यही कारण है कि विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि शेखर-एक जीवनी अज्ञेय की आत्मकथा भी है ।

मैंने भी दोनों में कम से कम तारतम्यता तो महसूस किया ही है ।


‛शेखर-एक जीवनी’ में ऐसे किरदारों के सृजन किया गया है, जो उस समय सामयिक होने साथ शाश्वत भी हैं ।

जिसमें दो किरदार शेखर और शशि इस उपन्यास के प्राण हैं ।


सच है, एक स्त्री तब पूर्णता को प्राप्त करती है जब वह एक साथ, एक माँ, बहन, पत्नी और प्रेमिका होती है । स्यात इसीलिए ऋग्वेद में इस आशीर्वाद का उल्लेख है कि ‛ तुम्हारे दस पुत्र हों और ग्यारवां तुम्हारा पति हो! ग्यारवां पति? आखिर वेद भला ऐसा क्यों कहा? निश्चय ही वेद का अप्रच्छन्नतः तात्पर्य यह है कि, कोई स्त्री जब प्रेम को पार कर स्नेह के स्तर पर कदम रखती है, तो वह एक साथ कई व्यक्तित्व धारण कर लेती है, यही तो स्त्री की समग्रता है, पूर्णता है।




एक बार ये रचनांश पढ़िए-


“बैठो, रहो, पुकारो-गाओ, मेरा वैसा धर्म नहीं है;

मैं हारिल हूँ, बैठे रहना मेरे कुल का कर्म नहीं है।

तुम प्रिय की अनुकंपा माँगो, मैं माँगूँ अपना समकक्षी

साथ-साथ उड़ सकने वाला एकमात्र वह कंचन-पक्षी!'

यों कहता उड़ जाता हारिल ले कर निज भुज-बल का संबल

किंतु अंत संध्या आती है- आखिर भुज-बल है कितना बल?

चातक हैं, केकी हैं, संध्या को निराश हो सो जाते हैं,

हारिल हैं- उड़ते-उड़ते ही अंत गगन में खो जाते हैं।”


अज्ञेय, हिन्दी साहित्य के वो रत्न हैं जो नैसर्ग की तरह अल्हड़ तो है उनमें अरण्य जैसी अनियमितता भी है, किंतु एक अभिनवपन है, एक सुगंध है, जो व्यक्ति को अनायास खींचती है अपनी ओर ।

- विनय एस तिवारी



Thursday, 30 July 2020

जब रात्रि बिखेरती है दूब की नोक पर मोती





ओस की बूँद मुझे सबसे प्रिय लगती है, दूब की नोक पर । तिस पर मध्य रात्रि में पूर्णिमा की चाँदनी, जिसका प्रकाश ओस की बूँदों पर पड़ते ही प्रकीर्णित होता है, और बिखेर जाता है मोतियों सी चमक । मैंने तो जब घास पर ओस की बूँदों को देखा.., तो अनायास ही कह उठा  ‛मोतियों का गाँव!’

जैसे नैसर्ग ने दूब की नोक पर सजाई हो ओस के दीपों की वर्णमाला । जिसे कोई प्रकृति खोजी, कवि या दार्शनिक ही पढ़ सकता है, और बुन सकता है इस वर्णमाला से अनन्त किताबें । वो किताबें जो अक्षर से विहीन हों, क्योंकि भाषा की सीमा तो इस संसार तक सीमित है । इसके ऊपर की सत्ताओं को ‛अनुभव’ किया जा सकता है मात्र ।

ये दीपक प्रकृति का सौंदर्य है,श्रृंगार है धरित्री का । जिसे मात्र अपने अन्वेषियों के लिए ही सजाती हैं वसुंधरा । जैसे ललनाएँ सजती हैं, अपने सौंदर्य के अन्वेषी के लिए, अपने प्रियतम के लिए,
या जैसे मूर्तियाँ अपने शिल्पकार के लिए, जो उकेरता है उनका सौंदर्य । कोई छैनी से, तो कोई शब्दों से ।
इसी में इनकी विराटता है, इसी में इनकी श्रेष्ठता है, इसी में इनका सौंदर्य है ।

-- विनय एस तिवारी




Saturday, 11 July 2020

स्नेह और वैराग्य की सीमा रेखा उतनी ही पतली है जितनी आकर्षण और प्रेम की या जितनी क्रूरता और यातना की





        
                   [ तस्वीर : नृत्य में मग्न बौद्ध भिक्षु ]
            

" स्नेह और वैराग्य की सीमा रेखा उतनी ही पतली है जितनी आकर्षण और प्रेम की या जितनी क्रूरता और यातना की ।"

...क्योंकि स्नेह से तटस्थ (ऑब्जेक्टिव) हो जाना ही तो वैराग्य है । स्नेह तो वासना से लगभग मुक्त होता है लेकिन फिर भी मोह व्याप्त तो रहता ही है और जब मोह भी विदा हो जाता है तब वैराग्य का जन्म होता है । 
वैराग्य संसार से भागना कदाचित भी नहीं है, जैसा कि कृष्ण कहते हैं, आचार्य रजनीश कहते हैं, बुद्ध कहते हैं ।
वैराग्य तो कर्म के लिए कर्म करना है, कर्ता भाव से मुक्त होना है ।

जैसे भक्ति और प्रपत्ति में,
भक्ति में भक्त समर्पित रहता है किंतु उसमें परमात्मा से एक आनंद की चाह बनी रहती है किंतु वह चाह समाप्त हो जाती है तब वो अवस्था कहलाती है प्रपत्ति ।
ठीक ऐसे प्रेम और स्नेह में,  प्रेम वासनाओं के व्याप्ति की अवस्था है किंतु स्नेह, जब प्रेम में वासनाएँ क्षीण हो जाएं ।
और जब वासनाएँ शून्य हो जाएँ, तब उत्पन्न होता है वैराग्य ।

वहीं दूसरी ओर, क्रूरता और यातना में भी ऐसा ही फ़र्क़ है, 
क्रूरता अन्तरागत है, कोई क्रूर होता है, किन्तु यातनाएँ तो मानवीय गुण हैं ।
जब क्रूरता में वासना समाहित हो जाती है, तब यातना का उद्भव होता है, यह एक अंध-विद्रोह की अवस्था है, विद्रोह एक पवित्र भाव है, जो समाज के, जाति के, राज्य के विरुद्ध होता है, किन्तु वह एक बदलाव चाहता है, जो उसकी प्रवित्ति में शामिल रहता है किन्तु, अंध-विद्रोह मात्र बिना तार्किक दृष्टिकोण के विरोध है, जिसका कोई स्वास्थ्य साध्य नहीं परिलक्षित होता ।

वैराग्य एक जागरण है, सांसारिक तादात्म्य से ।
एक तटस्थ जीवन का आरंभ है वैराग्य ।
ऐसा नहीं है कि जिसमे वैराग्य भाव जागृत हो गया वह संबंध तोड़ लेता है, वरन यह तो प्रेम की पराकाष्ठा है, उसकी सर्वोच्चता है ।
आप खजुराहो का मंदिर देखिए, वह समूचा प्रेम मंदिर है ।
जिसमें इसके सभी चरणों का दृश्यांकन किया गया है, बाहिरी भित्ति पर ‛वासनायुक्त अनुराग', फिर थोड़ा अन्दर जाने पर ‛प्रेम', और आगे स्नेह,और गर्भगृह पर वैराग्य ।
जिसमें वैराग्य पैदा हो गया है वह संसार में रहता है किन्तु संसार उसके अंदर नहीं ।
और यहीं से यात्रा शुरू होती है स्वयं से साक्षात्कार की ।

- विनय एस तिवारी



इत्यलम् (मेरी डायरी)

13 सितंबर 2026 प्रसंग : एक Facebook पोस्ट से शुरू हुई स्मृति, AI और वास्तविकता पर छोटी-सी परिचर्चा आज Facebook पर मेरे एक Phil...