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अंशू का मुंडन संस्कार

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24 जून 2026 आज का दिन अंशू  के जीवन के प्रथम संस्कारों में से एक—उसके मुंडन संस्कार —का पावन अवसर था। घर में कई दिनों से इसकी तैयारी थी और आज वह शुभ घड़ी भी आ गई। हम सब प्रातः ही मैहर देवी माँ के दर्शन और अंशू के संस्कार के लिए निकल पड़े। आशा दी, गुड़िया दीदी, भाभी, रिंकू और आयुष, पवन जीजा, प्रमोद, उनकी मम्मी (भाभी) तथा जर्मई वाली भाभी—सभी साथ थे। इतने अपने एक साथ हों तो यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहती, वह अपनेपन का चलता-फिरता उत्सव बन जाती है। किन्तु इस उल्लास के बीच कुछ रिक्त स्थान भी थे, जो बार-बार मन को छू जाते थे। पापा और मम्मी इस यात्रा में साथ नहीं आ सके। पापा की ओपन हार्ट सर्जरी के बाद अब भी लंबी यात्राएँ उनके लिए कष्टदायक हो जाती हैं, और मम्मी को यात्रा में उल्टियों की इतनी समस्या होती है कि पहुँचते-पहुँचते ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। मन बार-बार चाहता था कि वे भी अंशू के इस प्रथम संस्कार के साक्षी बनते, पर जीवन में हर इच्छा तत्काल पूर्ण हो जाए, ऐसा कहाँ होता है? गुड्डू भइया का न आ पाना भी भीतर कहीं खलता रहा। मन में आशा थी कि यदि संजय भइया की जमानत हो जाती तो वे...

एक काली चिड़िया और मेरे भीतर का द्वंद्व

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रात के लगभग आठ बजे का समय था। घर में एक शांत-सा सन्नाटा पसरा हुआ था। दिन का शोर थम चुका था और रात की स्थिरता धीरे-धीरे कमरे में उतर रही थी। तभी अचानक एक छोटी-सी चिड़िया मेरे कमरे में आ गई। आकार में वह गौरैया जैसी थी, पर उसका रंग काला था—जैसे वह उजाले से नहीं, किसी छाया से बनी हो। वह घबराई हुई थी। कभी पंख फड़फड़ाती, कभी दीवार की ओर उड़ती, कभी खिड़की के पास आकर ठहर जाती। ऐसा लग रहा था मानो वह कमरे में नहीं, किसी अनजाने डर में भटक रही हो। पहले ही क्षण मेरे भीतर करुणा जागी। लगा—यह कोई बेचारी प्राणी है जो गलती से मेरे संसार में आ गई है और अब बाहर जाने का रास्ता खोज रही है। मैंने उसके सामने थोड़ा-सा फल रखा, एक कटोरी में पानी भी रख दिया। लेकिन उसी समय मेरे छोटे से बेटे का ख्याल मन में आया। वह अभी इतना नन्हा है कि किसी भी डर को समझ नहीं सकता। इसलिए मैंने उसे धीरे से दूसरे कमरे में कर दिया—जैसे पहले उसके भय को सुरक्षित कर दूँ और फिर उस चिड़िया के लिए कुछ क्षण छोड़ दूँ। कुछ देर तक मैं चुपचाप खड़ा रहा। चिड़िया सामने रखे फल और पानी को देखती रही, पर शायद वह इतनी घबराई हुई थी कि वह कुछ भी ग्रहण ...

रफ़्ता रफ़्ता वो मिरी हस्ती का सामाँ हो गए... डायरी l

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                                                        इस डायरी के लिए डायरी का कवर पृष्ठ इस डायरी में, कुछ स्मृतियाँ संजोकर रखना चाहता हूँ अंशुल के लिए, ताकि जब वो बड़ा हो और उसे स्वयं को जानने की अभीप्सा हो तो अपने अतीत की ओर मुड़ सके और अतीत को शब्दों में जीते हुए अपने वर्तमान को सुनिश्चित कर सके । स्वयं को पहचान कर अपना मार्ग प्रशस्त कर सके । दिनाँक : 27 नवंबर,2021 अंशू ननिहाल में हैं । आज अंशु से वीडियो कॉल में बात हुई तो मुझे देख कर रोने लगा। । मेरे पास आना चाह रहा था, क्योंकि इधर उसका विशेष स्नेह हो गया है मुझसे । इसका कारण यह है की उसे मैं गोद में लेके घुमाता हूं । उसे घूमना, तरह तरह की चीजें देखना पसंद है । मेरे साथ वह थोड़ी शरारत भी कर सकता था जैसे फ्रिज कवर को खींचना, जाली से प्लेट, कटोरी अपने से लेले लेना आदि.. उस दिन जब मैं किचेन में प्यूरी बना रहा था उसके लिए तब, पहली बार अंशू क्रॉलिंग करते हुए रूम से किचेन तक का सफर स्वयं...

विदा छिन्दवाड़ा!

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विदा, छिंदवाड़ा! छिंदवाड़ा मुझे अकस्मात मिला । कोई उम्मीद नहीं थी कि मैं कभी छिंदवाड़ा जाऊॅंगा, पर मिलना था सो मिले । यह जून 2023 था जब मैं यहाँ पहुँचा । पहले पहल उत्सुकता और अनभिज्ञता हर नए शहर में होती है सो हुई, किंतु जब रहने पहुँचा तो शहर ने आकंठ भर लिया । छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश का दक्षिणी जिला है जो नागपुर से ठीक उत्तर अवस्थित है । इसका शहरी क्षेत्रफल कम ही है किन्तु है शानदार शहर! यहाॅं का मौसम, स्वच्छता, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता यहाॅं की सौंदर्यमणियाॅं हैं । इसे प्रकृति ने अपनी छत्र-छाया में रखा है, ठीक जैसे पचमढ़ी को । यद्यपि यहाँ कोई नदी का तटीय क्षेत्र नहीं है, फिर भी स्वाभाविक खुलापन है इस शहर में, जिसके कारण मन आनंदित रहता है । वस्तुत यह खुलापन इस शहर में ही व्याप्त है, इसके मोहल्लों में, सड़कों में, सब्जी मंडी में हर जगह । इस शहर का मौसम यहाॅं का कीर्तिस्तंभ है, ग्रीष्म में भी तापमान  38 से 40° सेल्सियस पहुॅंचते ही उमड़ पड़ते हैं बादल और फिर लुढ़का देते हैं तापमान को नीचे । यहाॅं कॉफ़ी हाउस का डोसे, श्री राधे टावर के पास वीआईपी रोड की तंदूरी चाय, हरे माधव की फुल्की क...

डायरी 16 अगस्त 2024 - संकल्प स्वातंत्र्य की सीमितता ।

जब भाग्य में नहीं होता तो मिली वस्तु नहीं मिलती ।यह बात चरितार्थ हुई सुनीता के साथ । उसे वैढ़न से रीवा आने के लिए मैने  फ्लाइट बुक किया था । उसके पास पहली बार फ्लाइट चढ़ने का अवसर था लेकिन भाग्य में नहीं लिखा तो क्योंकर आए? भाग्य में तो कार से ही आना लिखा था वो भी सोई हुई आधी रात में! भाग्य ऐसे ही काम करता है, जब जो नियत है वही होगा । यही बातें नियति को मान कर चलने में विश्वास दृढ़ करती हैं । अगर कोई यह कहे की यह भाग्य नहीं उसके चुनने की स्वतंत्रता या संकल्प स्वातंत्र्य था तो आखिर उसने वही क्यों चुना ? यदि इस प्रश्न पर गौर किया जाए तो फिर वही बात आ जाती है और जो प्रकट होता है वह यही कि परिस्थितियाँ ही ऐसी बनी । उसी दिन उसका ‘नेउरी नमय’ का व्रत फंसना, उसकी रक्षाबंधन तक रुकने की इच्छा बलवती होना आदि.. परंतु रक्षाबंधन मायके में मानना कहां लिखा था वो तो लिखा था गाँव में, सो BMO का आदेश आ गया और आना पड़ा । यहीं मानव का संकल्प स्वातंत्र्य की सीमितता का बोध होता है । विनय 16 अगस्त 2024

डायरी : 11 मार्च 2024

मैं अभी वरदान हॉस्पिटल रीवा में हूॅं यहाॅं एक परिवार में अभी-अभी बालक का जन्म हुआ है । सब खुश हैं, बच्चे का चाचा जो कि अभी लगभग 20 वर्ष का होगा, उसका नाम किसन है । वो अभी अपनी माॅं को फोन में बता रहा था की लल्ला हुआ! बड़ी उमंग से बता रहा था! वो बहुत प्रसन्न है । मैंने कहा - चाचा बन गए, बधाई हो! कहने लगा, सबको मिठाई खिलाऊॅंगा, आपको तो ढूॅंढ़ कर खिलाऊॅंगा!  भारतीय जनमानस में यही खास बात है जो हमें अपरिचित होते हुए भी जोड़े रखती है ।  - विनय शंकर तिवारी   11 मार्च, 2024   वरदान हॉस्पिटल, रीवा

छिंदवाड़ा डायरी - 25 जनवरी 2024

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छिंदवाड़ा डायरी - 25 जनवरी 2024                         चित्र: प्रतीकात्मक आज पौष मास के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा की रात्रि चंद्रमा इतना प्रोज्ज्वल था की बिना किसी अन्य प्रकाश के इस धरित्री और नभ के इस शीतयुक्त सौंदर्य को आँखभर निहारा जा सकता था। इस समय मैं दक्षिणी मध्य प्रदेश में हूॅं इसीलिए इस सुख से लाभान्वित हो पा रहा हूं क्योंकि उत्तरी मध्य प्रदेश सहित समूचा उत्तरी भारत इस समय भीषण शीत और कोहरे से ढंका हुआ है । वहाँ तो इस सौंदर्य का स्वादन करना अभी कहाँ संभव है ? वहाँ ऐसा आनंद ग्रीष्म में ही मिलता है जब चांदनी रातें फाल्गुन से ज्येष्ठ तक निरंतर प्रोज्जवल होती चली जाती है । चंद्र का यह नव प्रकाश धरित्री को धवल चंद्र प्रभा से विभोर कर देती है । यह सुख तो आत्मविभोर करने वाला है ही किन्तु शीत में चंद्र प्रभा का सौंदर्य देखना उत्तर भारत में बहुधा कम ही होता है । यह चाॅंदनी चाहे शिशिर ऋतु की हो या ग्रीष्म ऋतु की, होती बड़ी मनमोहक है और साथ रहता है विकीर्ण एकान्त । अमृतलाल वेगड़ जी यूँ ही नहीं कहते कि चन्द्रमा के पास ऐस...

लोकमानस के राम

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ये लेख सच्चिदानंद मिश्र जी का है जो फिलोसॉफी के प्रोफ़ेसर और विद्वान हैं। पढ़िए शानदार लेख है.. । #लोकमानस_के_राम कौन से राम को मैं पसन्द करता हूं? अचानक एक मित्र का प्रश्न मुखपुस्तक (फेसबुक) पर तैरता हुआ दिख गया कि वे कौन से राम हैं जिनको आप पसन्द करते हैं? तुलसी के, कबीर के, गांधी के या एक दल विशेष के?  सोचता हूं कि क्या राम कई एक हैं? या एक ही राम को अलग अलग लोगों ने अलग अलग रूपों में देखा? वह कौन सा रूप है राम का जिस राम को मैं पसन्द करता हूं ? राम को तुलसी ने भी देखा है तो कबीर ने भी। राम वाल्मीकि के भी हैं तो कालिदास के भी। गांधी के भी हैं और लोहिया के भी। इतना ही नहीं वे राम अल्लामा इकबाल के भी हैं जो उनकी उर्दू कविता में प्रकट होते हैं। राम को कम्बन ने भी देखा है और जैन व बौद्ध कवियों ने भी। एक राम वह भी हैं जो राम की शक्तिपूजा में प्राणवान होते हैं। जो रावण के पराक्रम से पार नहीं पाते तो भयभीत हो जाते हैं और शक्ति प्राप्त करने के लिए शक्ति की आराधना करते हैं। राम के भिन्न भिन्न रूपों को तुलसी ने भी रेखांकित किया यह कहते हुए कि "नाना भांति राम अवतारा।  रामा...

शिशिर ऋतु की चांदनी रात में आकाश में उड़ता हुआ वायुयान..

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शिशिर ऋतु की चांदनी रात के आकाश में उड़ता हुआ वायुयान और विज्ञान के इस चमत्कार में उड़ते हुए लोग । वायुयान विज्ञान का चमत्कार ही तो है! भला इस धरती से मीलों दूर ऊपर उसका उड़ते चले जाना । एक रात जब मैं शिशिर ऋतु में छत पर टहल रहा था तभी तो देखा था उस वायुयान को चांदनी रात में उत्तर से दक्षिण की ओर चंद्रमा के ठीक मध्य से जाते हुए ठीक रात्रि के बारह बजे । जब वायुयान चंद्र के ठीक बीच में से जा रहा था तब सहसा मुझे लगा कि जैसे: किसी के अपने कहीं दूर जा रहे होंगे अपने किसी सपने के लिए । एक ओर उत्साह नए भविष्य के लिए, वहीं दूसरी ओर विरह, किसी अपने का दूर हो जाना । जब हम किसी के साथ जीवन जीते हैं तो उसे अपनी आदत बना लेते हैं इसीलिए जब वह दूर जाता है तो अपना एक अंश छूटता हुआ महसूस होता है । चाहे माता-पिता का पुत्र के लिए हो या पति का पत्नी के लिए हो या अन्य कोई । बहुधा माता का पुत्र के लिए या पत्नी का पति के लिए विरह ‘भावनात्मक’ होता है और यही भावात्मकता ही उसका सौंदर्य है । जैसे विरह था माता कौशल्या का पुत्र श्री राम के लिए या उर्मिला का लक्ष्मण के लिए या फिर यशोधरा का सिद्धार्थ के ...

माँ चामुंडेश्वरी देवी मंदिर, मोहाड़ी, भंडारा, महाराष्ट्र ।

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माँ चामुंडेश्वरी देवी मंदिर, मोहाड़ी, भंडारा, महाराष्ट्र । ___________________________________________ जब कोई मन्दिर किसी नदी के तट पर स्थित होता है तो उसमें एक स्वाभाविक खुलापन होता है जो उसके सौन्दर्य में अनायास ही वृद्धि करता है और दर्शक का मन खुले प्रांगण को देख कर आल्हादित होने लगता है । ऐसे स्थान हमेशा मेरी पसंद रहे हैं जो किसी नदी या समुद्र किनारे होते हैं जिनमें एक खुलापन होता है ।                            माँ चामुंडेश्वरी देवी मन्दिर  महाराष्ट्र के भंडारा जिले में मोहड़ी ग्राम पंचायत में अवस्थित यह मंदिर शक्ति पूजन मंदिर है जो कि समर्पित है माँ चामुंडा  को ।  यहाॅं पहुॅंचने के लिए ‘भंडारा रोड’ रेलवे स्टेशन से ऑटो मिल जाते हैं । स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 10 कि. मी. गोंदिया की तरफ होगी । यह मंदिर एक स्थानीय नदी के तट पर है । यह नदी गाॅंव से सटी हुई पश्चिम दिशा में दक्षिण वाहिनी हो कर बहती हैं । नदी के पूर्व में ग्रामीणों के घर और पश्चिम में ग्राम वासियों के खेत हैं जहाँ वो अपनी ब...

पुनर्नवा- एक कहानी

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  हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की रचनाएँ अपने आप में श्रेष्ठ रचनाएँ हैं । बात चाहे शब्दों की समृद्धि की हो! या कहानी के आकर्षण की! या फिर पात्रों के शब्दाभिराम वर्णन की! यह कहानी शुरू ही होती है कला के चर्मोत्कर्ष से, कला के परम् साध्य से । जिस प्रकार एक नृत्यांगना का साधन तो नृत्य है, किन्तु साध्य हैं सतचिदानंद नजराज! और नृत्य की विशेषता है कि नृत्य नर्तन/नृत्यांगना के साथ ही समाप्त हो जाता है, जबकि कहानियाँ, गीत रह जाते हैं कहानीकार के बिना भी, लोगों की संवाद पर जनश्रुति बन कर । भला नृत्य कहाँ रहता है नर्तक के बिना? फिर प्रेम के हर रूप दिखते हैं- जहाँ एक ओर चंद्रमौलि का व्यक्ति-चेतना से समष्टि-चेतना का प्रेम है जिससे बन जाता है वह शिव की तरह ‛अवतांगिदास’ । दूसरे देवरात का प्रेम, चंद्रा का प्रेम, मृणालमंजरी का प्रेम ।मृणालमंजरी, जिसका प्रेम सर्वोच्च के निकटतम प्रतिष्ठित है ।जिसमें त्याग का उत्कर्ष है । जिसके प्रेम में वात्सल्य रस का भंडार है । यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी सुंदरता है और सबसे बड़ी विशेषता ही यही है, कि इसमें प्रेम के कई आयाम दिखाए गए हैं । किन्तु हाय! इस कहानी का उपसंहार उत...

ब्रह्मचिन्ता

  ब्रह्मचिन्ता - योग का एक अलभ्य ग्रन्थ ।____________________________________  योग का वह ग्रन्थ, जिसके बारे में केवल पता चलता है पॉल ब्रन्टन की पुस्तक ‛गुप्त भारत के रहस्य' से । बनारस में एक बड़े ज्योतिषी हुए थे सुधी बाबू । ऐसे ज्योतिषी जिनके पास एक आध्यात्मिक शक्ति भी थी, समाधि भी । सुधी बाबू यानि श्री सुधीर रंजन । पॉल ब्रंटन के अनुसार, सुधी बाबू बताते हैं कि ‛ब्रह्मचिन्ता’ का अस्तित्व गुप्त रखा गया । इस ग्रन्थ को तिब्बत में पाया गया था । वहाँ इसे पवित्र समझा गया और इसका अध्ययन केवल उस वक्त केवल गिने चुने लोग ही करते थे ।  ऐसा कहा जाता है कि भृगु महराज ने हजारों वर्ष पूर्व इस महाग्रंथ की रचना की थी । भृगु ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे । ये एक महान ज्योतिषी थे जिन्होंने ‛भृगुसंहिता’ की रचना की जो आज भी उपलब्ध है । तथा इसकी पांडुलिपि नेपाल में उपलब्ध है । इन्हीं भृगु जी के प्रपौत्र भगवान परशुराम थे । इन्हीं भृगु  जी ने ‛ब्रह्मचिन्ता’ की भी रचना की । सुधी बाबू के अनुसार, उनके समय में भी यह योगमार्ग अत्यंत विलक्षण और अलभ्य होने के कारण नवीन भी माना जाता था। ब्रह्मचिन्ता का...

अरे यायावर! रहेगा याद!

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                                                    दिनाँक 07 मार्च 2020 मे रे अतिप्रिय कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‛अज्ञेय’ जी का जन्म आज ही तो हुआ था । ‛एक बूँद सहसा उछली, अरे यायावर रहेगा याद?, शेखर-एक जीवनी जैसी अनेकेन रचनाओं का उद्भव अज्ञेय रूपी हिमालय से ही तो हुआ है । बहुरंगी और अद्भुत व्यक्तित्व-जिसके अंदर एक घुमक्कड़, कवि, दार्शनिक, अपने शब्दों से चित्र बनाने की अद्भुत कला के स्वामी विद्यमान थे, जिनकी रचनाओं में दार्शनिक विचारशीलता, समीक्षा, संस्कृति की छाप को समेटे अभी भी चल रही हैं । अज्ञेय जी की रचना- अरे यायावर! रहेगा याद? केवल यात्रा विवरण नहीं है, वरन वह तो भारत के हर भौगोलिक क्षेत्र का सांस्कृतिक, और दार्शनिक विवेचना है, जिसका हर भारतीय को अध्ययन करना चाहिए । इसीलिए अज्ञेय मुझे प्रिय हैं, क्योंकि उनके माध्यम से आप केवल भौगोलिक यात्रा नहीं करते, बल्कि समूची संस्कृतियों की बहुरंगीयता को जीते हुए चलते हैं, फिर चाहे पूर्वोत्तर भारत का वर्ण...

जब रात्रि बिखेरती है दूब की नोक पर मोती

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ओ स की बूँद मुझे सबसे प्रिय लगती है, दूब की नोक पर । तिस पर मध्य रात्रि में पूर्णिमा की चाँदनी, जिसका प्रकाश ओस की बूँदों पर पड़ते ही प्रकीर्णित होता है, और बिखेर जाता है मोतियों सी चमक । मैंने तो जब घास पर ओस की बूँदों को देखा.., तो अनायास ही कह उठा  ‛मोतियों का गाँव!’ जैसे नैसर्ग ने दूब की नोक पर सजाई हो ओस के दीपों की वर्णमाला । जिसे कोई प्रकृति खोजी, कवि या दार्शनिक ही पढ़ सकता है, और बुन सकता है इस वर्णमाला से अनन्त किताबें । वो किताबें जो अक्षर से विहीन हों, क्योंकि भाषा की सीमा तो इस संसार तक सीमित है । इसके ऊपर की सत्ताओं को ‛अनुभव’ किया जा सकता है मात्र । ये दीपक प्रकृति का सौंदर्य है,श्रृंगार है धरित्री का । जिसे मात्र अपने अन्वेषियों के लिए ही सजाती हैं वसुंधरा । जैसे ललनाएँ सजती हैं, अपने सौंदर्य के अन्वेषी के लिए, अपने प्रियतम के लिए, या जैसे मूर्तियाँ अपने शिल्पकार के लिए, जो उकेरता है उनका सौंदर्य । कोई छैनी से, तो कोई शब्दों से । इसी में इनकी विराटता है, इसी में इनकी श्रेष्ठता है, इसी में इनका सौंदर्य है । -- विनय एस तिवारी

स्नेह और वैराग्य की सीमा रेखा उतनी ही पतली है जितनी आकर्षण और प्रेम की या जितनी क्रूरता और यातना की

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                            [ तस्वीर : नृत्य में मग्न बौद्ध भिक्षु ]              " स् नेह और वैराग्य की सीमा रेखा उतनी ही पतली है जितनी आकर्षण और प्रेम की या जितनी क्रूरता और यातना की ।" ...क्योंकि स्नेह से तटस्थ (ऑब्जेक्टिव) हो जाना ही तो वैराग्य है । स्नेह तो वासना से लगभग मुक्त होता है लेकिन फिर भी मोह व्याप्त तो रहता ही है और जब मोह भी विदा हो जाता है तब वैराग्य का जन्म होता है ।  वैराग्य संसार से भागना कदाचित भी नहीं है, जैसा कि कृष्ण कहते हैं, आचार्य रजनीश कहते हैं, बुद्ध कहते हैं । वैराग्य तो कर्म के लिए कर्म करना है, कर्ता भाव से मुक्त होना है । जैसे भक्ति और प्रपत्ति में, भक्ति में भक्त समर्पित रहता है किंतु उसमें परमात्मा से एक आनंद की चाह बनी रहती है किंतु वह चाह समाप्त हो जाती है तब वो अवस्था कहलाती है प्रपत्ति । ठीक ऐसे प्रेम और स्नेह में,  प्रेम वासनाओं के व्याप्ति की अवस्था है किंतु स्नेह, जब प्रेम में वासनाएँ क्षीण हो जाएं । और जब वासनाएँ शून्य हो...

माँ गङ्गा, प्रोज्जवल चाँदनी और अज्ञेय की पुस्तक

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प्रयागराज में मेरे द्वारा खींची तस्वीर में माँ गङ्गा, चाँद और चाँदनी आह! सौंदर्य...। बाहर खुली चाँदनी छिटकी थी, इतनी प्रोज्जवल कि निरभ्र आकाश में भी तारा एक-आध ही दिखता था । झील चमक रही थी । रंगों का वह खेल- केवल एक रंग, श्वेत का खेल- बल्कि केवल मात्र आकाश का और उसी की अनुपस्थिति का वह खेल देखकर शेखर स्तब्ध रह गया । झिलमिलाती हुई झील पर धुँधले श्यामल पहाड़, और दूर पर कोहरे सी मधुर स्निग्ध ज्योतिर्मयी हिम-श्रेणी.. उस विस्तीर्ण, अत्यंत निस्तब्ध रात में इस दृश्य को देखते हुए बोध की लहरें-सी उसके शरीर में दौड़ने लगीं; मानो वह इस जीवन के स्वप्न से उद्बुद्ध होकर, किसी ऊँची यथार्थता के लोक में चला जा रहा है.. उसे रोमांच हो आया । उसने आँखें मूँद लीं, मानो आंखें मूँद कर ही वह इस दृश्य को बनाए रख सकता है, खुली आँखों के आगे वह छिन्न हो जाएगा..। #शेखर_एक_जीवनी, भाग दो । - अज्ञेय

फाफामऊ- दो संस्कृतियों का मिश्रण

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तस्वीर: फाफामऊ पुल से माँ गङ्गा और उनसे विदा लेता सूर्य फा फामऊ, एक मध्यवर्ती कस्बा है । मध्यवर्ती, ग्रामीण और शहरी संस्कृति का । ग्रामीण संस्कृति जहाँ लोग ज्यादा प्राकृतिक रवैये को अपनाते हैं, वहीं, शहरी बनावटी नयनाभिराम जीवन । दोनों में ठीक उतना ही अंतर है, जितना वन और उद्यान में है, जितना हिमालय, विंध्याचल या सतपुड़ा के वनों और राष्ट्रपति भवन के उद्यान में है । एक प्राकृतिक दूसरा मानवीय शिल्पता से युक्त । दरअसल इसमें समायोजन है, दो जीवन निर्वाह करने के रास्तों का, यह मिलाप बिंदु है इन दोनों जीवननिर्वाह के तरीकों का । जैसे संध्या, (समय में) दिन और रात के बीच की स्थिति है, इसमें दिन का उजाला भी है और रात का अँधेरा भी । फाफामऊ और प्रयागराज को जोड़ता लॉर्ड कर्जन पुल फाफामऊ, गँगा पार करने के बाद पहला बाज़ारीय कस्बा है,जहाँ दूर गाँव से भी और शहर से भी लोग आते हैं अपने आवश्यता की वस्तुएँ खरीदने साथ ही साथ ग्रामीण आते हैं अपनी उत्पादित सामग्रियों को समर्पित करने जनकल्याण के लिए । पाल-पोष कर उत्पादित करके समर्पित कर जाते हैं ये कृषक और ले जाते हैं इसके स्थान पर नई जीवन निर्वाह की सामग्रियाँ । ठ...

#फरवरी

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【तस्वीर: दोपहर, माँ गङ्गा और चाँदी जैसा सूर्य और रश्मियाँ 】 इ स समय, सूर्य के प्रकाश का रंग पिलछौंह् से श्वेत की ओर निरंतर अग्रसर है, यानी सूर्य देव उत्तरायण होने की ओर अग्रसर हैं, इस समय ठण्ड के विदा लेने और ग्रीष्म के स्वागत की उत्सुकता निरंतर बलवती हो रही है । मुझमें शुष्क और अलसाई साँझ को नग्न आंखों से देखने का कौतूहल बढ़ता जा रहा है । फरवरी मुझे प्रिय है । इसलिए नहीं, कि यह बसन्त का मौसम है । बल्कि इसलिए क्योंकि फरवरी एक ऐसा माह है- जिसमें सूर्य की हम दो छटाएँ देख सकते हैं, एक धूप दूसरा घाम। हम देख सकते हैं, सूर्य द्वारा अस्ताचल की अवस्थित को दक्षिण से पश्चिम की ओर खिसकाते हुए । मैं देख सकता हूँ अपनी आँखों से सूर्य को विदा ले कर जाते हुए, दूर क्षितिज तक । क्योंकि विदा ही तो अंतिम सत्य है । हम सभी मिलते हैं और एक वक्त बाद विदा हो जाते हैं । इसलिए विदा प्रिय है मुझे, क्योंकि किसी के चले जाने से जो व्यक्ति में एक खालीपन उभरता है, वह वास्तविक होता है, बनावटी नहीं । यह धूप से घाम होने की कथा है, विवरण है । धूप, सूर्य का वह प्रकाश है जो कोमल है । जिसके स्नेह-लेप के लिए शीत ऋतु में जाने क...

द मोंक हू सोल्ड हिज फेरारी

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【 तस्वीर: मेरी दो प्रिय वस्तु, एक तो किताब दूसरी चॉकलेटी चाय !!】 ये किताब उनके लिए नहीं है जिनमें पतवार के सहारे सागर पार करने का हुनर है, ये उनके लिए भी नहीं है जिन्हें रास आती हैं नक्काशियों से सुसज्जित दीवारें, ये उनके लिए भी नहीं है, जिन्हें भाते हैं क्यारियों में सुसज्जित एक तहजीब से लगे पुष्प-दरख़्त, उनके लिए तो कतई नहीं है जो नहीं भाँप सकते 'दो इतिहास खंडों' के बीच की लुप्त कड़ी, उनके बीच के जीवन-स्तर और जीवंतता में अंतर । ये उनके लिए है जो स्वीकार करते हैं सागर की मौज, जो पतवार चला कर दरकिनार नहीं करते हैं यात्रा का आनंद वरन छोड़ देते हैं नाव को पाल के सहारे फिर हवा ले चलती है नाव को अपने लक्ष्य पर , और वो उठाते हैं यात्रा का आनंद या फिर गोते लगाते हैं समुद्र की दुनियाँ में और सीखते हैं समुद्र की भाषा । यह उनके लिए है जो स्वीकार करते हैं भाग्य की अवधारणा! नहीं नहीं, दिनकर जी वाली नहीं ( सनद रहे भाग्य की अवधारणा बहुत ही गलत प्रस्तुत की गई है हमारे सामने, किन्तु उस पर बात फिर कभी) वह भाग्य की अवधारणा जिससे वास्तव में काम करती है नियति । यह उनके लिए है जिन्हें खुश होने के लिए...

जब भी कोई किताब पढ़ता हूँ..

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य कीन करो, मैं जब भी कोई किताब पढ़ता हूँ । कोई किताब ! जिसे पढ़ते-पढ़ते ''वायु-अक्षरों'' में उकेरा किन्हीं दुष्यंत-शकुंतला के प्रेम का एक-एक चित्र खिंचता चला जाता है । '' वायु-अक्षर '' इसलिए क्योंकि मात्र महसूस किया जा सकता है उस भाव को जिसके प्रतीक बनाए गए हैं ये शब्द । शब्द, प्रतीक ही तो हैं विचारों के । और विचार उत्पाद हैं भाव के। इसीलिए तो बहुधा जब भावनाओं को व्यक्त करना होता है तो शब्द कम पड़ने लगते हैं, महसूस होने लगता है कि शब्दों की पहुँच भावनाओं तक कतई नहीं है । वास्तव में भाव, शून्य के या मौन के निकटवर्ती हैं, उसकी परिधि के अंतर्गत आते हैं इसीलिए भावनाओं को संवेदनाओं को शून्यता में समझा जाता है । तो, जैसे-जैसे शब्द घुलते जाते हैं, मैं महसूस करता हूँ खुद को और तुम्हें वहाँ, जहाँ मिलते हैं समंदर और आकाश । फिर तुम्हारी गिरती लटों को पहुँचाता हूँ उनके गंतव्य तक , और तब तुम्हारी उठती आँखें जो चाहत का पश्मीना बुनती हैं मेरे लिए , यकीन करो ! वो लिबास सुन्दरतम लिबास है मेरी ख़ातिर । और वो लिबास मुझे दुनियाँ के श्रेष्ठतम व्यक्तियों में से एक बना देता है । क्...